बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए हुए पच्चीस साल हो गए. यह एक ऐसी वर्षगांठ है जिसे रजत जयंती शायद ही कोई कहना चाहे. क्योंकि इसमें रजत की कांति जैसा कुछ भी नहीं है. यह ऐसी वर्षगांठ नहीं जिसकी प्रतीक्षा उत्सुकता से की जाती है. यह एक ऐसा वाकया है जो हम सबको अपनी इंसानियत के वजूद पर शक करने को मजबूर कर सकता है.

ऐसे मौकों को नज़रंदाज करना आसान है, उनसे आंख मिलाना मुश्किल. फिर भी स्मृति का एक दायित्व होता है. वह वर्तमान और भविष्य के प्रति हमारे अपने नज़रिए को तय करती है. हम किसी घटना या व्यक्ति को कैसे याद करते हैं, इससे हमारे बारे में भी कुछ मालूम होता है.

हमने लंदन के मेयर सादिक खान की तारीफ़ की क्योंकि वे अमृतसर गए और उन्होंने वहां जालियांवाला बाग़ जाना तय किया. वहां जाकर उन्होंने तकरीबन सौ साल पहले उनके अपने राष्ट्र इंग्लैंड के प्रतिनिधि जनरल डायर के द्वारा किए गए हत्याकांड की याद की और कहा कि इंग्लैंड को इसके लिए बाकायदा माफी मांगनी चाहिए. ऐसा वे न करते तो किसी का ध्यान इस ओर न जाता. लेकिन अमृतसर आकर इंग्लैंड का एक राजनेता अगर सिर्फ स्वर्ण मंदिर जाता तो इसका मतलब होता कि वह अतीत के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है.

सादिक खान चाहते तो आसानी से कह सकते थे कि इस हत्याकांड को लेकर निजी तौर पर वे जवाबदेह नहीं हैं. आखिर उनके माता-पिता का मुल्क इस कत्लेआम के वक्त भारत ही था. फिर वे अंग्रेजों के जाने के बाद एक नए मुल्क पाकिस्तान गए और वहां से इंग्लैंड. खान की पैदाइश इंग्लैंड की ही है. चाहे तो इंग्लैंड में कोई कह सकता है कि खान ने ऐसा कहकर आखिर साबित कर दिया कि वे अपने पूर्वजों के देश से अधिक बंधे हैं. खान की स्थिति इसलिए भी नाजुक है कि वे मुसलमान हैं.

लेकिन उन्होंने अपनी नागरिकता के अधिकार से आश्वस्त एक व्यक्ति के तौर पर बिना हिचकिचाए कहा कि अब तक जो इंग्लैंड द्वारा जालियांवाला बाग कांड में मारे गए लोगों के परिवारों से बाकायदा माफी न मांगना गलत है. खान ने इससे आगे जाकर यह भी कहा, ‘मुझे कोई दुविधा नहीं कि खासकर अब जब इसको एक सदी होने जा रही है सरकार को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए. यह करके यहां जो हुआ उसे कायदे से स्वीकार किया जाएगा और भारत और अमृतसर के लोग इस माफी के जरिए इस पर पूर्ण विराम लगा सकेंगे.’

ऐसा खान कर पाए इसके लिए हम उनकी प्रशंसा करें लेकिन उनके देश की भी जिसने उन्हें इतना आत्मविश्वास दिया है. जब वे ऐसा कर रहे थे तो इंग्लैंड के बारे में यह भी कह रहे थे कि मेरा राष्ट्र एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने किए पर शर्मिंदा हो सकता है और अपने अतीत का जिम्मा ले सकता है. हालांकि इंगलैंड ने सरकारी तौर पर ऐसा कुछ भी करने की संभावना से इंकार कर दिया लेकिन यहां महत्वपूर्ण यह है कि उसके किसी मंत्री ने खान को राष्ट्रद्रोही नहीं कहा. किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि विदेशी ज़मीन पर खान अपने देश की आलोचना क्यों कर रहे थे?

खान भारत यात्रा के बाद पैदल सीमा पार करके पाकिस्तान गए. हालांकि ऐसा करने से उन्हें सरकारी तौर पर मना किया गया था क्योंकि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते नाजुक दौर में हैं. खान ऐसा क्यों कह पाए और क्यों वे बिना हिचकिचाए अमृतसर और पाकिस्तान जा सके? इसके लिए उन्हें कोई यह कहे कि आखिर वे पाकिस्तानी या भारतीय की औलाद हैं तो ऐसा कहना गलत भी न होगा. लेकिन फिर भी उनके देश में किसी ने भी उन्हें इस बात के लिए नहीं कोसा.

हम इसकी तुलना अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाले देश के लोगों के आचरण से करें. अभी एक इंटरव्यू में एक टीवी पत्रकार ने फारूक अब्दुल्लाह से पूछा कि क्या वे भारतीय हैं? राहुल गांधी को बाबरभक्त और खिलजी वंश का बताया जा रहा है. खिलजी यहीं का हो गया, यह न किसी को याद है न कोई याद करना चाहता है.

राहुल गांधी ने अमरीका में आज की सरकार की कुछ नीतियों की शालीनता के दायरे में आलोचना की तो यहां के समझदार लोगों की भी भौं तन गयी थी. यह जुर्रत वे कैसे कर सकते हैं?

क्यों इंग्लैंड में एक मुसलमान उसकी राजधानी का मेयर हो सकता है? क्यों वह विदेशी भूमि पर अपने देश की नीतियों की आलोचना कर सकता है? क्यों वह उस अतीत से खुद को जोड़ सकता है जिसमें उसके पूर्वज उसके आज के देश के दूसरी तरफ खड़े थे?

एक जवाबदेह स्मृति वह है जो आत्मालोचनात्मक हो, सुरक्षात्मक न हो, अप्रिय को देख पाए और अपने देखने को दिखाने से परहेज न करे.

बाबरी मस्जिद ध्वंस की पच्चीसवीं वर्षगांठ हमारी याद करने की कुव्वत का इम्तहान भी है. यह कम संतोष की बात नहीं कि अनेक लोग जो हिंदू समझे जाते हैं इस पर खुल कर बात कर रहे हैं, शर्मिंदगी जाहिर कर रहे हैं. भले सरकार ने माफी न मांगी हो, वे हिंदुओं की ओर से मुसलमानों से माफी मांग रहे हैं. इसका अर्थ यह है कि भारत में अभी भी संभावना बची हुई है.