प्रणब मुखर्जी आज 82 साल के हो गए हैं. कुछ समय पहले राष्ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल पूरा होने के बाद चर्चित नेता मणिशंकर अय्यर ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. इस लेख का सार यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने प्रणब मुखर्जी को दूसरा कार्यकाल नहीं देकर कांग्रेस पार्टी पर बड़ा उपकार किया है. अय्यर ने प्रणब मुखर्जी के राजनीतिक अनुभव और राष्ट्रपति बनने के पहले की राजनीतिक सक्रियता का हवाला देते हुए यह इच्छा जताई कि उन्हें फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहिए.

मणिशंकर अय्यर ने सीधे तो नहीं लेकिन जो लिखा उसमें यह संकेत भी छिपा है कि वे अब भी प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं. उन्होंने एक तरफ तो यह लिखा कि अब वे कभी प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद पर नहीं देख सकते, लेकिन अगर कोई चमत्कार हो जाए तो ऐसा हो भी सकता है. उन्होंने इसके बाद तुरंत यह भी कहा कि राजनीति में चमत्कार होते रहते हैं. हालांकि, राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अब पार्टी में शायद ही कोई होगा जो राहुल के अलावा किसी और कांग्रेसी को जीत मिलने की स्थिति में प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहे.

मणिशंकर अय्यर ने सीधे तो नहीं लेकिन जो लिखा उसमें यह संकेत भी छिपा है कि वे अब भी प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं  

लेकिन यह सवाल बरकरार है कि क्या प्रणब मुखर्जी को फिर से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो जाना चाहिए. इस सवाल के जवाब में जाने से पहले यह जान लें कि प्रणब मुखर्जी भले ही 2012 में राष्ट्रपति बने, लेकिन इसके पहले के तकरीबन 30 सालों में उनके राजनीतिक जीवन में कुछ ऐसे मौके आए जब यह लगा कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहद नजदीक पहुंच गए हैं. पहला मौका तो 1984 में तब आया जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई. उस वक्त माना जा रहा था कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बन जाएंगे. लेकिन जिस तरह से राजीव गांधी का प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण कराया गया उससे नाराज होकर प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बना ली. उस घटना ने साफ कर दिया कि प्रणब मुखर्जी के मन में प्रधानमंत्री बनने की लेकर इच्छा कोई दबी-छिपी नहीं थी. हालांकि, बाद में वे फिर से कांग्रेस में आ गए.

प्रणब मुखर्जी के सामने एक ऐसा ही दूसरा मौका तकरीबन 20 साल बाद आया. 2004 में तमाम अनुमानों को धता बताते हुए सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को हरा दिया. लगा कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन जाएंगी. लेकिन ऐन मौके पर जब सोनिया गांधी ने ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया तो चर्चा चलने लगी कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन उस वक्त सोनिया ने मनमोहन सिंह पर यकीन करना उचित समझा.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब लगातार मनमोहन सिंह सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे तब भी पार्टी में सुगबुगाहट चली थी कि मनमोहन सिंह को हटाकर प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए. तब कहा जा रहा था कि पार्टी को राजनीतिक संकटों से और सरकार को प्रशासनिक संकटों से निकालने का काम प्रणब मुखर्जी ही कर रहे हैं. कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि 2012 में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने का जो निर्णय सोनिया गांधी ने लिया उसके पीछे एक वजह यह भी थी. क्योंकि धीरे-धीरे पार्टी के भीतर मनमोहन के नेतृत्व से मोहभंग होता चला जा रहा था और संभव था कि 2014 के चुनावों के पहले नेतृत्व परिवर्तन की मांग और मुखर होकर उठती!

जो लोग राजनीति को समझते हैं, उनका मानना है कि हाल के सालों में कांग्रेस के पराभव की दो आंतरिक वजहें रही हैं. इनमें पहला है सोनिया गांधी का लगातार बीमार रहना और इस वजह से पार्टी के अंदर उनका कम सक्रिय होना. दूसरी वजह रही है कि प्रणब मुखर्जी जैसे संकटमोचक को राष्ट्रपति भवन में बैठा देना. कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस के इन दो नेताओं की वजह से जो जगह पार्टी के अंदर खाली हुई, उसे भरने में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नाकाम रहे.

 प्रणब मुखर्जी जैसे नेता की कांग्रेस में कोई भूमिका बचती है? इस सवाल के जवाब में जाने से पहले उस धारणा के बारे में जानें कि क्या कोई राष्ट्रपति पद से हटने के बाद राजनीति में सक्रिय हो सकता है या फिर से प्रधानमंत्री बन सकता है.  

अब सवाल यह उठता है कि यहां से आगे कांग्रेस के लिए क्या रास्ता है. सोनिया गांधी की सेहत को उनकी लगातार कम होती सक्रियता से जोड़कर देखा जाता है. उनकी सेहत का किसी को ठीक से नहीं पता, लेकिन यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि वे राजनीति में पहले की तरह सक्रिय नहीं हैं. राहुल गांधी एक नए तेवर में गुजरात विधानसभा चुनावों में दिखे जरूर, लेकिन खुद को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर पेश करने में कम से कम अभी वे कामयाब नहीं दिख रहे. तो ऐसे में क्या प्रणब मुखर्जी जैसे आजमाए हुए अनुभवी राजनेता की कांग्रेस में कोई भूमिका बचती है?

इसमें जाने से पहले उस धारणा के बारे में जानें कि क्या कोई राष्ट्रपति पद से हटने के बाद राजनीति में सक्रिय हो सकता है या फिर से प्रधानमंत्री बन सकता है. संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पूर्व राष्ट्रपति को राजनीति में सक्रिय होने से या फिर प्रधानमंत्री बनने से रोके. लेकिन यह परंपरा का हिस्सा जरूर रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोबारा दलगत राजनीति में नहीं आते रहे हैं. हां, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने और इसमें हारने के बाद राजनीति में सक्रिय रहने वालों की लंबी फेहरिस्त है.

यह परंपरा राज्यपालों के बारे में भी रही है. लेकिन संवैधानिक बाध्यता इस मामले में भी नहीं है. पिछले कुछ सालों में यह परंपरा टूटी भी है. सुशील कुमार शिंदे राज्यपाल रहने के बाद दोबारा सक्रिय राजनीति में आए और मनमोहन सिंह सरकार में पहले ऊर्जा मंत्री और बाद में गृह मंत्री बने. सुशील कुमार शिंदे 2002 का उपराष्ट्रपति चुनाव भी राजग उम्मीदवार भैरो सिंह शेखावत के खिलाफ लड़े थे. केरल के राज्यपाल रहे निखिल कुमार बिहार के औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से इस्तीफा देकर आए थे. उनके बाद केरल की राज्यपाल बनाई गईं शीला दीक्षित भी इस पद से हटने के बाद दोबारा कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुईं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन होने से पहले पार्टी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था.

राष्ट्रपति के मामले में ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं है. राष्ट्रपति का पद तो भारत में 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के साथ अस्तित्व में आया है. इसके पहले राष्ट्रपति के समकक्ष गवर्नर जनरल का पद था. आजादी के तुरंत बाद अस्तित्व में आए इस पद पर रहने वाले एकमात्र व्यक्ति थे चक्रवर्ती राज गोपालाचारी. लेकिन जब वे राष्ट्रपति नहीं बने और राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बन गए तो उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी सरकार में मंत्री बनाया. कुछ दिनों तक वे बगैर किसी मंत्रालय के मंत्री रहे और सरदार पटेल के निधन के बाद गृह मंत्री बने. इसके बाद 1952 में वे मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री बने. उस वक्त आंध्र प्रदेश भी मद्रास का ही हिस्सा था. 1953 में इस राज्य से अलग होकर आंध्र प्रदेश बना और मद्रास प्रांत का नाम तमिलनाडु कर दिया गया. राजगोपालाचारी का उदाहरण यह बताता है कि जिसे आम तौर पर उलटी गंगा बहाना कहा जाता है, वैसी घटना भारत के इतिहास में पहले भी हुई है.

तो क्या प्रणब मुखर्जी राजगोपालाचारी की राह चलेंगे? अय्यर ने लिखा है कि उन्होंने एक बार राजगोपालाचारी का उदाहरण प्रणब मुखर्जी के सामने रखा लेकिन वे इतने नीतिपरक हैं कि उन्होंने इस प्रस्ताव पर मौखिक तो क्या हाव-भाव से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. लेकिन इसके साथ ही अय्यर ने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी को उनके मार्गदर्शन की अभी जितनी जरूरत है उतनी कभी नहीं थी लेकिन आने वाला वक्त ही बताएगा कि उनका झुकाव किस ओर रहता है.

अभी कांग्रेस की जो स्थिति है उसमें वह प्रणब मुखर्जी को कोई निर्देश देने की स्थिति में नहीं है. लेकिन अगर कांग्रेस या पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें सक्रिय मार्गदर्शक बनने के लिए भी मना लें तो पार्टी को इससे भी काफी फायदा मिल सकता है. अगर वे पूरी तरह से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय होते हैं तो कांग्रेस को एक झटके में ऐसा नेता मिल जाएगा जिसकी पूरे देश में अपनी विश्वसनीय पहचान है. जिसे अलग-अलग राजनीति दलों और विचारों वाले नेताओं को एक साथ लेकर चलने का पर्याप्त अनुभव है. क्योंकि नीतीश कुमार के कांग्रेस के पाले से छिटकने के बाद से यह सवाल भी उठ रहा है कि कांग्रेस गठबंधन चला पाने में भी सक्षम नहीं है.

लेकिन क्या सोनिया गांधी और राहुल गांधी प्रणब मुखर्जी को दोबारा सक्रिय करने की पहल करेंगे? अगर यह पहल होती भी है तो क्या प्रणब मुखर्जी मानेंगे? ये दोनों सवाल ऐसे हैं जिनसे पार पाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुश्किल है लेकिन राहुल की अगुवाई वाली कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर पेश करना है तो इन सवालों से पार पाना एक तरह से पार्टी की जरूरत भी है और मजबूरी भी.