भारतीय राजनीति में जो वफादार बने रहते है वे पनीर खाते हैं और पनीरसेवल्म कहलाते है. जो किन्ही वजहों से बेवफाई करते हैं उन मांझियों की नाव का कोई भरोसा नहीं होता. 
तोड़-मरोड़कर
तोड़-मरोड़कर
बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगुबुगाहट दिनोंदिन तेज हो रही है. जैसे गर्मी की चिलचिलाहट बढ़ती जा रही है वैसे दलों के बीच की तल्खियां भी. एक दिलचस्प नजारा पिछले दिनों मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री यानी नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बीच देखने को मिला. कभी एक धारा से साथ बहने वाले आज नदी के दो किनारे हो गए. पहले दोनों के बीच वहम आया. उसके बाद आया अहम. फिर रह गया हम. अब हाल यह है कि हम की मेहरबानी से आम-लीची भी आने लगे हैं.
बिहार में कानून-व्यवस्था की परेशानी नहीं है. राई भर भी नहीं. वहां के आमजन जरायम से सुरक्षित हैं. वरना सत्तारूढ़ सरकार इतने पुलिस अधिकारियों को फल की सुरक्षा में कैसे लगा सकती थी!
जीतन राम मांझी और उनका परिवार अभी मुख्यमंत्री आवास में ही रह रहा है. लेकिन उन्हें सरकारी बंगले में लगे फलों को तोड़ने की इजाजत नहीं है. इसके लिए बाकायदा 24 घंटे 24 पुलिस अधिकारियों और कर्मियों का पहरा बैठा दिया गया है. फलों की पहरेदारी की जिम्मेदारी बिहार पुलिस की विशेष शाखा के एसपी (सुरक्षा) की है. एसपी साहब भी क्या सोच कर पुलिस में भर्ती होकर अब क्या सोच रहे होंगे! वे आजकल टूटे हुए आम के फलों को जब्त कर रहे हैं. और उधर मांझी सब्र का फल खा रहे हैं. स्वाद कैसा लग रहा होगा वे ही बता सकते हैं.
इस घटना के कई निहितार्थ निकलते हैं. पहला, सरकारी फल खाने का अधिकार केवल सरकार को है. फिर भले ही उसे जनता ने चुना हो. दूसरा, बिहार में कानून-व्यवस्था की परेशानी नहीं है. राई भर भी नहीं. वहां के आमजन जरायम से सुरक्षित है. वरना सत्तारूढ़ सरकार इतने पुलिस अधिकारियों को फल की सुरक्षा में कैसे लगा सकती थी. लोकतंत्र की बगिया भी कैसी है कि यहां कोई आम चूसे तो कोई अंगूठा. सत्ता का चरित्र भी कैसा कि इसे पाते ही बछिया सांड बन जाती है और गंवाते ही चुहिया.
सामाजिक न्याय के सिपाही रहे नीतीश कुमार के इस न्याय पर सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता डॉक्टर अजय आलोक का कहना है कि मांझी स्तरहीन राजनीति कर रहे हैं. तौबा-तौबा मांझी को ऐसा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए. लेकिन डॉक्टर साब यह पता कैसे चले कि स्तरहीन राजनीति क्या होती है. क्योंकि बिहार ही नहीं देश भर की जनता भूल चुकी है कि यह होता किस चिड़िया का नाम है.
वैसे मामला सिर्फ सरकारी आम का नहीं है! देखिए न, आम लफ्ज आते ही अवाम लफ्ज की तुकबंदी स्वतः हो जाती है. यह घटना बताती है कि भारतीय राजनीति में अब अवाम से ज्यादा आम की चिंता होती है और सामाजिक न्याय की तुलना में निजी अहम पलता है. इस दुनिया में कहीं फल टूटने पर पहाड़ सर पर उठा लिया जाता है तो कही दुखों का पहाड़ टूटने की आवाज तक नहीं होती. हां एक बात और, भारतीय राजनीति में बेहयाई का फल हमेशा मीठा होता है, मगर बेवफाई का फल कभी-कभी नहीं फलता. अगर इसकी संदर्भ सहित व्याख्या करें तो जो वफादार बने रहते है वे पनीर खाते हैं और पनीरसेवल्म कहलाते है. जो सही-गलत वजहों से बेवफाई करते हैं उन मांझियों की नाव का कोई भरोसा नहीं होता.