यदि मेनका गांधी पर यकीन करें तो इंदिरा गांधी केवल दो इंसानों पर ही भरोसा करती थीं. एक संजय और दूसरी सोनिया गांधी. मेनका तो यहां तक कहती हैं कि जब कभी खाने की मेज पर इंदिरा जी को संजय से राजनीति पर बातचीत करनी होती थी तो वे राजीव को वहां से चले जाने को कह देती थीं. हकीकत यही है कि मां अपने छोटे बेटे संजय को ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में तराश रही थीं. संजय की जब मौत हुई तब राजीव इटली के एक समुद्र तट पर छुट्टियां बिता रहे थे. रोम के भारतीय दूतावास के जिस अधिकारी ने उन तक यह खबर पहुंचायी, उनके अनुसार राजीव तब भी संजय की जगह लेने को उत्सुक नहीं थे. बाद में श्रीमती गांधी ने कई नए और पुराने कांग्रेसी नेताओं की मदद लेकर राजीव को राजनीति में आने के लिए तैयार किया.

राजीव के बजाय संजय का व्यक्तित्व अपनी मां से ज्यादा मिलता था

अब इस पर तो सिर्फ अटकलबाजी ही की जा सकती है कि श्रीमती गांधी ने राजीव के बजाय पहले संजय को राजनीति में लाने की बात क्यों सोची. उन्होंने कभी इसका कारण नहीं बताया. शायद एक वजह यह हो सकती है कि वे संजय को कुछ ज्यादा ही ‘जिम्मेदार’ व्यक्ति मानती थीं. संजय गांधी को उनकी मां कितना महत्वपूर्ण मानती थीं, यह जताने के लिए मेनका गांधी ने इंदिरा गांधी के कई पत्र कुछ लोगों को दिखाए थे. इन पत्रों से यह बात उजागर होती थी कि श्रीमती गांधी यह मानने लग गई थीं कि संजय में जिंदगी का उतार-चढ़ाव और सुख-दुख झेलने का काफी माद्दा आ गया था. दूसरी ओर उनके बड़े बेटे राजीव को तब भी देखभाल की जरूरत थी.

संजय गांधी को राजनीति में लाने की मुख्य वजह या हालात शायद खुद इंदिरा गांधी और उनके काम करने के ​तरीकों में निहित थी. वे किसी काम को एक खास तरीके से करने में यकीन रखती थीं. उनका रवैया कठोर था जबकि उनकी राजनीति मूल्यहीन. जयप्रकाश नारायण ने 22 जुलाई, 1975 को अपनी जेल डायरी में लिखा था, ‘मेरा हमेशा से यह विश्वास रहा है कि लोकतंत्र में श्रीमती गांधी की कतई आस्था नहीं है. उनकी प्रवृत्ति और धारणा तानाशाह जैसी है.’ इंदिरा गांधी की नजर में सरकारी मशीनरी उनकी पार्टी और उनके निजी हितों को साधने का जरिया मात्र थी. संजय इस मायने में उनकी योग्यता की कसौटी पर खरे उतरे, क्योंकि वे बखूबी जानते थे कि कौन-सा काम किससे और कैसे कराया जा सकता है. दूसरी ओर राजीव इस मामले में ‘काम के आदमी’ नहीं थे, क्योंकि वे नियम के विरुद्ध कोई काम करना नहीं चाहते थे.

राजीव गांधी और संजय गांधी के शुरुआती करियर भी दोनों के अलग स्वभाव का संकेत देते हैं

संजय के काम करने के तरीके का सबसे बढ़िया उदाहरण था उनकी मारुति कार परियोजना. उन्होंने 1970-71 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल से जमीन का जुगाड़ करवाया और वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी से इस परियोजना का लाइसेंस ले लिया. रुपया उन्होंने सरकारी बैंकों से जुटा लिया. जब मारुति की कहानी जगजाहिर हो गई तो श्रीमती गांधी ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री सिद्धार्थ शंकर रे को बुलाकर उनसे इस परियोजना की पड़ताल करने को कहा. श्री रे ने उनसे साफ-साफ कह दिया कि यह मामला पूरी तरह से जालसाजी का है, लेकिन इंदिरा गांधी को तौर-तरीकों से कोई लेना-देना नहीं था. उनकी पूरी कोशिश मारुति परियोजना को कानूनी शक्ल देने की रही और उन्होंने ऐसा किया भी. हालांकि जनता पार्टी की सरकार द्वारा गठित ‘मारुति जांच आयोग’ ने हर चीज की पड़ताल के बाद उन्हें अपने बेटे के हितों के लिए अपने अधिकारों के दुरुपयोग करने का दोषी पाया.

दूसरी ओर राजीव गांधी ने विमान चालक का करियर चुना और इस क्षेत्र में छोटे विमान से शुरू करके बड़े-बड़े बोइंग विमान तक उड़ाए. उन्हें नौकरी देने में पक्षपात बरते जाने का मैं खंडन नहीं करता, लेकिन यह जरूर है कि उनके मामले में बहुत कम पक्षपात हुआ होगा. आखिर वे इंडियन एयरलाइंस के अध्यक्ष तो नहीं बन गए या उन्होंने अपनी कोई निजी विमान कंपनी तो नहीं खोल ली. जबकि उनकी जगह यदि संजय होते तो ऐसा हो सकता था. दोनों भाइयों में यही अंतर था. एक बेटा जहां अपनी मां की ममताभरी निगाहों तले घोटाले पर घोटाला करता रहा, वहीं दूसरे ने अपने आपको इन कृत्यों से पूरी तरह अलग रखा.

आपातकाल में संजय की संलिप्तता और राजीव की दूरी

आपातकाल और उसके ठीक पहले के हालात बखूबी बताते हैं कि राजीव और संजय में क्या फर्क था. 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को 1971 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्ट तरीके इस्तेमाल करने का दोषी पाते हुए उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी. उस समय राजीव अपनी मां के साथ ही थे, पर उन्हें नहीं मालूम था कि अब क्या करना चाहिए. उस वक्त संजय मारुति कारखाने में थे. तनाव के उन क्षणों में किसी को इसकी सूचना संजय गांधी को देने का ख्याल ही नहीं आया. हालांकि वे तब तक कम्युनिस्टों से अपनी मां की ‘रक्षा’ करने के लिए राजनीति में सक्रिय हो गए थे. 28 साल पूरा कर चुके संजय कम्युनिस्टों से खासी नफरत करते थे.

उस दिन दोपहर को जब संजय अपनी आयातित कार से घर आए, तो देखा कि घर के बाहर काफी भीड़ लगी है. वे समझ गए कि माजरा क्या है. वे सीधे मां के पास चले गए, लेकिन उन्हें देखकर कुछ बोले नहीं. उधर उन्हें देखते ही श्रीमती गांधी के बुझे हुए चेहरे पर चमक आ गई, क्योंकि वे जानती थीं कि सही सलाह देने में संजय अब परिपक्व हो चुके हैं. श्रीमती गांधी ने आगे क्या करना चाहिए, यह तय करने के लिए तुरंत अपने घर के एक बंद कमरे में पारिवारिक बैठक की. उनके दोनों बेटे हालांकि इस बात पर एकमत थे कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए. लेकिन संजय इस मामले में कहीं ज्यादा उग्र थे. उन्होंने अपनी मां से कहा कि क्या वे नहीं जानतीं कि उन्हें विपक्ष से भी कहीं ज्यादा खतरा खुद अपने ही दल के महत्वाकांक्षी लोगों से है.

इसके बाद श्रीमती गांधी अपने घर के भंडारगह में चली गईं. जब कभी उनके सामने कोई संकट आता था, वे इसी कमरे में अकेले आ बैठती थीं. यह उनकी पनाहगाह थी. हालांकि उनका सबसे बड़ा सहारा था - संजय. उन्हें पूरा यकीन था कि जरूरत की इस घड़ी में संजय ही उनकी मदद कर सकते हैं. 1971 के लोकसभा चुनाव जिताने वाला नारा संजय गांधी ने ही दिया था - ‘वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, लेकिन मैं कहती हूं गरीबी हटाओ.’ लेकिन उस समय नारा गढ़ने से भी कहीं ज्यादा कठिन काम करना था.

संजय गांधी को पता था कि उनकी मां आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं. हालांकि उस वक्त के हालात हार मानने जैसे बन गए थे और संजय नहीं चाहते थे कि ऐसा हो. तब उन्होंने सोचा कि उन्हें अपनी मां के लिए जनसमर्थन जुटाना चाहिए. इससे न केवल मां को सहारा मिलेगा बल्कि उनके विरोधियों के भी हौसले पस्त होंगे. उस वक्त उनके बड़े भाई राजीव सीन में कहीं नहीं थे. उस समय क्या वे तो संजय की मौत तक इन मामलों में कहीं नहीं थे.

1977 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद जब श्रीमती गांधी निर्वासित-सा जीवन बिता रही थीं, उस वक्त वे संजय के और करीब आ गई थीं. संजय ने दून स्कूल के अपने दोस्तों और आभिजात्य वर्ग के युवकों की एक टीम बनाई थी, जिसे ‘संजय ब्रिगेड’ भी कहा गया. उनकी इस ​ब्रिगेड ने ही अदालत की कार्रवाइयों में बाधाएं डालीं. उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखतीं थी कि ऐसा करने से उनकी बदनामी हो रही है. उनके लिए महत्वपूर्ण यही था कि उनके नाम तब अखबारों में आने लगे थे. इन लोगों ने अपने जीवन में शायद ही लोगों के बीच कोई अच्छा काम किया होगा. गुंडागर्दी उनका एकमात्र काम था. उनमें से कई यह ख्वाब भी देखने लगे थे कि यदि श्रीमती गांधी फिर सत्ता में आती हैं, तो उन्हें भी सत्ता में जगह मिल जाएगी.

वहीं राजीव ने अपने आपको इस सबसे अलग रखा. एक सरकारी विमान सेवा में पायलट की नौकरी कर रहा व्यक्ति इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकता था. फिर वे इंदिरा गांधी के घनिष्ठ सलाहकारों में भी नहीं थे. संजय की मौत के बाद अपनी सास का घर छोड़ते वक्त मेनका ने राजीव गांधी के बारे में कहा था कि जब दूसरे (राजीव का परिवार) साथ छोड़ जाने को तैयार थे, उस वक्त वे (मेनका) और संजय श्रीमती गांधी के साथ रहे.

मेनका ने यहां तक कहा था कि आपातकाल के दौरान राजीव और उनके परिवार ने तो इटली के एक उद्योगपति के दिल्ली स्थित घर में पनाह ले ली थी. यदि मेनका गांधी के आरोपों को गंभीरता से न भी लें तो भी यह तो लगता ही है कि संजय के विपरीत राजीव ने अपने आपको मां से दूर रखा. शायद यही वजह है कि आपातकाल के दौरान सत्ता के दुरुपयोग की जांच करने वाले किसी भी आयोग ने राजीव गांधी के नाम का जिक्र तक नहीं किया. यहां तक कि जब शाह आयोग ने बोइंग सौदे की जांच के बाद कहा - ‘इस सौदे का लेखा-जोखा ऐसे लोगों को दिखाया गया, जिनका इस मामले से कोई संबंध नहीं था’, तब भी राजीव गांधी का नाम नहीं आया. हां, इसमें संजय गांधी का नाम जरूर था.

शाह कमीशन ने इंदिरा और संजय गांधी दोनों पर आरोप लगाते हुए कहा था, ‘चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने के आरोप में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा श्रीमती गांधी के चुनाव को रद्द कर देने के बाद सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों में जो तेजी आई थी, वही आंतरिक आपातकाल लागू करने की प्रेरणा-शक्ति बनी.’ आयोग ने कहा कि बुलडोजर चलाने (दिल्ली में तुर्कमान गेट के पास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई) का काम संजय गांधी के हुक्म पर और उनकी सनक पूरा करने के लिए किया गया, जबकि संजय न तो किसी के प्रति जवाबदेह थे और न ही उनकी कोई प्रशासनिक हैसियत ही थी. आयोग ने संजय गांधी की कई और कारगुजारियों का पर्दाफाश किया. मकान ढहाने की कार्रवाई में संजय द्वारा किए गए कई कृत्यों की दर्दभरी दास्तानें सामने आईं. यह बात भी उजागर हुई कि किस तरह दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट और अन्य अधिकारियों पर दबाव डाला गया कि वे स्वीकार करें कि उन्होंने ही तुर्कमान गेट पर गोली चलाने का हुक्म दिया था. आयोग के सामने बयान देते हुए इन मजिस्ट्रेटों ने साफ कहा कि उन्होंने कभी गोली चलाने का हुक्म नहीं दिया था. आयोग की जानकारी में यह बात भी आई कि संजय के हुक्म पर ही सम्माननीय नागरिकों तक की गिरफ्तारियां हुईं.

इंदिरा और संजय को कभी आपातकाल का ‘मलाल’ नहीं रहा

लोग सोचते थे कि सत्ता से हटने के बाद इंदिरा गांधी ने जरूर गौर किया होगा कि उनसे ऐसी क्या गलतियां हुईं जिससे 1971 में दो-तिहाई बहुमत पाने वाली कांग्रेस पार्टी 1977 में महज 150 सीटें ला पाई. लोगों का यह खयाल भी था कि शायद श्रीमती गांधी को इस बात का भी एहसास हुआ होगा कि ‘गंभीर परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए’ (जैसा वह अक्सर कहती थीं) जो तरीके अपनाए गए, वे न केवल गलत थे बल्कि उल्टा परिणाम देने वाले थे. लेकिन जनता पार्टी की सरकार के समय श्रीमती गांधी के बयानों ने ये जाहिर कर दिया था कि वे जरा भी नहीं बदली थीं और न ही उन्होंने अपनी गलती से कोई सबक सीखा था. दूसरी ओर वे बार-बार कहती रहीं कि 1977 में उन्हें सिर्फ इसलिए हार का मुंह देखना पड़ा, क्योंकि उनके विरोधियों ने अपने गलत प्रचार से जनता को ‘मूर्ख’ बना दिया था. लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर वे अपने आपको भरमा क्यों रही हैं, जबकि उनके कुशासन की बात एक स्थापित तथ्य बन चुकी थी.

यह बात जगजाहिर है कि आपातकाल के दौरान निरंकुश ढंग से सरकार ने कार्रवाइयां कीं. गलत अभियोग लगाकर गिरफ्तारियां हुईं. ऐसी गिरफ्तारियां ज्यादातर पार्टी या निजी हितों को पूरा करने के लिए की गई थीं. यह सच है कि लोग ‘मूर्ख’ बनाए गए थे. लेकिन उन्हें मूर्ख श्रीमती गांधी के प्रचार तंत्र द्वारा नित उगले जा रहे झूठ ने बनाया था. उन्होंने कहा था कि आपातकाल के दौरान ‘कुछेक’ गिरफ्तारियां की गई थीं. लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन ‘कुछेक गिरफ्तारियों’ की संख्या एक लाख थी. उधर जब जनता सरकार के नेताओं के बीच तू-तू, मैं-मैं होने से सरकार का पतन हुआ तो जनता के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था.

सत्ता और राजनीति में ‘संजयवाद’ की स्थापना

1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं लेकिन बदले की भावना के साथ. संजय गांधी के दिमाग में भी यही भाव था और इस बार उनके साथ अजीबोगरीब भीड़ थी. इस बार युवकों को महत्व दिया गया जिन पर संजय की मुहर लगी थी. नए लोग ‘संजयवादी’ थे. जब राजीव ने सत्ता संभाली, तब भी न तो इन लोगों में कोई खास बदलाव आया और न ही पार्टी में इनके दखल में कोई कमी हुई. इनके भाषण देने का तरीका और पोशाक परंपरागत नेताओं से अलग थी. इनमें से शायद ही किसी ने कभी गांधी टोपी पहनी होगी. ये किसी का अभिवादन ‘नमस्कार’ के बजाय ‘हाय’ कह कर करते हैं. आप इनसे हिंदी में बात करें तो आपको जवाब अंग्रेजी में ही मिलता. इन्होंने न कभी खादी काती, न कभी जेल गए, न कभी कोई रचनात्मक कार्य किया और न ही राज-काज में विधिवत दीक्षित हुए. नम्रता और निष्ठा उनके स्वभाव में ही नहीं है. इनकी बोली और चीजों को आंकने का नजरिया ही अलग है. इनके लिए सफलता या परिणाम ही प्रगति का मानदंड है. इनके लिए साधन का कोई मायने नहीं है. इनकी सारी आस्था नेता पर होती है, विचारधारा पर नहीं. ये पूर्ण वफादार होते हैं और बदले में ऐसा ही चाहते हैं.

इंदिरा गांधी अपनी नीतियों को लागू करने के लिए ऐसे ही लोगों और साधनों का इस्तेमाल करती थीं और बाद में राजीव गांधी ने भी यही किया. राजीव को जब उन्होंने भविष्य के लिए तैयार करना शुरू किया तो वे अपनी मां के सांचे में उस तरह फिट नही बैठ रहे थे. लेकिन संजय गांधी की मौत के बाद श्रीमती गांधी के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था. वे दिल्ली की गद्दी पर अपने परिवार में से ही किसी को देखना चाहती थीं ताकि उनकी मौत के बाद कोई उन्हें बदनाम न कर सके. न ही कोई नेहरू वंश के सामने चुनौती बन सके. शायद वे सोचती थीं कि भारतीय जनता लंबे समय तक राजाओं के शासन की आदी रहने से नेहरू परिवार को भी आसानी से स्वीकार कर लेगी.