हार्वी वाइनस्टीन का एक और कच्चा-चिट्ठा सलमा हायेक ने खोला है. वही कहकर जो हॉलीवुड की अनेक अभिनेत्रियां कह रही हैं - कि हार्वी वाइनस्टीन उनके लिए भी एक राक्षस था और उसे ना सुनने की आदत नहीं थी. सलमा हायेक का नाम उन चंद मैक्सिकन अभिनेत्रियों में गिना जाता है जिन्होंने तमाम मुश्किलों से पार पाकर हॉलीवुड में आशातीत सफलता हासिल की थी. लेकिन आज पता लग रहा है कि जिस फिल्म ‘फ्रीडा’ (2002) से ऐसा होना शुरू हुआ था, उसे बनने से रोकने में वाइनस्टीन ने ऐड़ी-चोटी का दम लगा दिया था.

सिर्फ इसलिए कि सलमा हायेक ने उसे, यानी कि अपनी ही फिल्म के निर्माता को, ना कहा था. वो भी कई बार.बार-बार. न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखी अपनी आपबीती में सलमा हायेक सिलसिलेवार बताती हैं कि ताकत के मद में चूर होकर हार्वी वाइनस्टीन ने उनसे वही सब ‘फेवर्स’ मांगे जो वो हॉलीवुड में नाम कमाने की चाह रखने वाली बाकी युवा अभिनेत्रियों से मांगता था. लेकिन जब सलमा हायेक उसकी नाजायज मांगों के आगे झुकी नहीं तो उसने उनका उस फिल्म के बहाने उत्पीड़न किया जोकि सलमा हायेक का पैशन प्रोजेक्ट था. यानी फ्रीडा काहलो, मैक्सिको की वह अद्भुत चित्रकार जिनका दर्द और जीवन के संघर्ष सलमा हायेक परदे पर जीवंत करना चाहती थीं. और अपनी जन्मभूमि मैक्सिको की वह छवि गढ़ना चाहती थीं जो कि स्टीरियोटाइप से दूर हो.

ऐसा करने के लिए सलमा हायेक ने अपनी छवि से उल्टा एक गंभीर किरदार बनने का रिस्क तक लिया लेकिन गलती यह कर दी कि खुद जाकर मीरामैक्स नामक निर्माण कंपनी के प्रमुख वाइनस्टीन से इस फिल्म का निर्माण करने का आग्रह किया. क्योंकि दुनिया, और उनकी नजरों में भी, वाइनस्टीन नयी धारा के सिनेमा को आमजन तक पहुंचाने वाला एक सिनेमा-प्रेमी निर्माता था.

बाद में चलकर लेकिन, जब सलमा हायेक ने शारीरिक संबंध बनाने का उसका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, तब वाइनस्टीन ने वही किया जो इस तरह के बीमार आदमी अक्सर करते हैं. उसने खेल खेले और सलमा हायेक का मानसिक उत्पीड़न करना शुरू कर दिया. सलमा को जान से मारने तक की धमकी दी और उनकी सालों की रिसर्च और स्क्रिप्ट को किसी दूसरी अभिनेत्री को ऑफर करने की बात कही. जब कानून और वकील की सलमा ने सहायता ली – ताकि वे यह फिल्म बना सकें – तो हार्वी ने कई असंभव सी शर्ते रख दीं.

अपनी मेहनत और दोस्तों के दम पर सलमा ने इन शर्तों को पूरा भी किया (स्क्रिप्ट में बदलाव, दस मिलियन डॉलर का फाइनेंस, मशहूर निर्देशक को प्रोजेक्ट से जोड़ना वगैरह) लेकिन वाइनस्टीन का गुस्सा शांत नहीं हुआ. एक तो उसे उस फिल्म का निर्माण करना पड़ रहा था जिसकी नायिका उस जैसे ताकतवर इंसान को कई बार ना बोल चुकी थी और ऊपर से फिल्म में वह सेक्स अपील भी नहीं थी जिसके लिए सलमा हायेक प्रसिद्ध थीं. यही वजह देकर उसने हायेक को धमकाया भी कि वो फिल्मांकन बीच में ही रोक देगा क्योंकि कोई ऐसी फिल्म देखने नहीं आएगा जिसमें सलमा हायेक सेक्सी न लगें.

आखिर में फिर यह हुआ, कि वाइनस्टीन तभी माना जब उसकी यह शर्त मानी गई कि फिल्म में सलमा हायेक का ऐशली जड के साथ एक लेस्बियन सेक्स सीन होगा. जिसके फिल्मांकन में खुद वह मौजूद होगा. लेख में आगे सलमा हायेक बताती हैं, और पढ़ते हुए हमारे पेट में मरोड़े पड़ती हैं, कि इस सीन की शूटिंग के दौरान उन्हें जिंदगी का पहला और आखिरी नर्वस ब्रेकडाउन हुआ. सांसें फूली, कंपकपी छूटी, रोना बंद नहीं हुआ और कई बार उल्टी हुई.

लेकिन उन्हें हार्वी वाइनस्टीन नामक विक्षिप्त आदमी के लिए निर्वस्त्र होकर वह सेक्स सीन शूट करना ही पड़ा. ताकि फ्रीडा पूरी बनकर रिलीज हो सके और जिस फ्रीडा काहलो की कहानी ने उन्हें अपनी पसंद का करियर चुनने की हिम्मत दी थी, उसकी वही कहानी वे दुनिया की नजर कर सकें.

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हमारे अपने बॉलीवुड में भी ऐसे कई ऐबदार वाइनस्टीन मौजूद हैं जिनका जिक्र कोई नहीं करता. उन्हें आशिक मिजाज कह दिया जाता है और ‘नाड़ा थोड़ा ढीला है बस उसका’ जैसे अलंकारों से सुशोभित करके केवल हंसी-हंसी में शोषण की दास्तानों को समेट दिया जाता है. फिल्मों से जुड़े लोगों के पास वक्त-बेवक्त गॉसिप के नाम पर ऐसी घटनाएं पहुंचती रहती हैं और इन्हें चटखारे लेकर कभी-कभार टेबेलॉइट्स में ब्लाइंड-आइटम कहकर भी छापा जाता है. लेकिन कोई फिल्मी हस्ती, और फिल्म पत्रकार भी, इस नाजुक मसले पर बोलता नहीं है.

अक्टूबर में हार्वी वाइनस्टीन प्रकरण के सामने आने के बाद प्रियंका चोपड़ा के अलावा ऋचा चड्ढा भी कह चुकी हैं कि ‘हम लोग कई सारे वाइनस्टीनों को बर्दाश्त कर रहे हैं’. हाल के दिनों में तो ऋचा ने यहा तक कहा है कि अगर बॉलीवुड ने यौन उत्पीड़न पर राज खोलने शुरू कर दिए तो हमारे कई सारे हीरो मटियामेट हो जाएंगे, बॉलीवुड का पूरा पावर-स्ट्रक्टर चरमरा जाएगा और फेमिनिस्ट फिल्में बनाने वाले कई लोगों की असलियत दुनिया के सामने आ जाएगी. कंगना रनोट ‘आई हेव अ वजाइना रे’ नामक गाने से इंडस्ट्री के तौर-तरीकों पर व्यंग्य करने के अलावा फिल्मकारों की मानसिकता पर भी कुठाराघात कर चुकी हैं. स्वरा भास्कर भी ऐसे ही एक देसी वाइनस्टीन के बारे में बता चुकी हैं कि जब वे इंडस्ट्री में नयी थीं तब एक डायरेक्टर उन्हें रात के समय अपने कमरे में सीन डिस्कस करने के लिए बुलाता था और जब वे वहां जातीं तो वो शराब के नशे में धुत मिलता था.

वक्त आ गया है कि इन देसी वाइनस्टीनों के नाम भी अब लेने शुरू कर दिए जाएं. कोई तो साहस दिखाए (सिर्फ अभिनेत्रियां नहीं, बल्कि साहसी कहे जाने वाले वे मर्द फिल्मकार भी जिन्हें ऐसी जानकारियां पूरी हैं मगर वे टेरेंटीनो की ही तरह खामोश हैं और वह चिंगारी पैदा हो जिससे लगी आग ठीक वैसे ही बॉलीवुड का शुद्धिकरण करे जैसे अभी हॉलीवुड का हो रहा है.

क्योंकि लोहा गर्म है, हथौड़ा मारने का इससे बेहतर समय शायद फिर न मिले!