हिमालय की तलहटी साल भर ठंडी रहती है, पर दुनिया की छत कहे जाने वाला तिब्बत मार्च 1959 में उबल रहा था. चीनी सेना बौद्धों को कुचल जो रही थी. बौद्धों की नाल हिंदुस्तान से जुड़ी है लिहाज़ा उसकी तपिश हिंदुस्तान तक आना लाज़मी था. आख़िर जब चोट लगती है तो बच्चा क्या, बूढा भी अपनी मां को ही पुकारता है.

‘मां-बेटे’ की दास्तां बेहद दर्द भरी है. मां चाहकर भी कुछ ख़ास कर न पाई. अपने बेटे को उसकी छिनी हुई ज़मीन न दिला पायी. पर उसने यह जरूर किया कि उसका बेटा, जो तिब्बत का चौदहवां धर्मगुरु और राजा होता है, आज भी उसकी शरण में महफूज़ है. हम बात दलाई लामा के हिंदुस्तान आकर शरण लेने की कर रहे हैं. यह 1959 की बात है.

कुछ दिनों पहले ख़बर आई थी कि चीनी सरकार 60 बौद्धों को ट्रेनिंग देकर तिब्बत में दलाई लामा के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रही है. पिछले दस सालों से चीन बौद्धों की अपना धार्मिक गुरु चुनने के प्रक्रिया पर लगाम कस रहा है. चीन चाहता है कि यह अधिकार भी उसके पास हो.

हिंदुस्तान में बैठे दलाई लामा परेशान हैं. आख़िर क्या करें? 31 मार्च, 1959 को बड़े नाटकीय ढंग से जब वे मैकमोहन रेखा पार कर हिंदुस्तान में दाख़िल हुए थे तो उन्होंने सपने में भी सोचा नहीं होगा कि वे अब तिब्बत वापस नहीं जा पाएंगे. 14 दिनों का तिब्बत से तवांग तक का उनका सफ़र किसी चमत्कार से कम नहीं था.

इतिहास बताता है कि तिब्बत हमेशा से ही आक्रांताओं का मारा रहा है.पहले मंचू, फिर मंगोल, उसके बाद गोरखा और फिर चीनी. जब-जब चीन मज़बूत हुआ, उसने सेना भेजकर तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया. जब कमज़ोर पड़ा, तो तिब्ब्बतियों ने चीनी सैनिक पीछे खदेड़ दिए. तब ये दोनों अलग देश हुआ करते थे. 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप के देश दुनिया फ़तेह कर रहे थे. रूसी ज़ार चीन की तरफ बढ़ रहे थे. ख़तरे को देखते हुए, हिंदुस्तान पर कब्जा जमाए अंग्रेजों ने सेना की टुकड़ी भेजकर तिब्बत की राजधानी ल्हासा पर कब्ज़ा कर लिया था. रूस और अंग्रेज़ों ने संधि कर ली. इसका मजमून यह था कि दोनों मे से कोई तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा. दोनों इस पर राजी थे कि तिब्बत एशिया में उनके उपनिवेशों के बीच एक बफ़र स्टेट की तरह होगा. तिब्बत क्या चाहता है, किसी ने नहीं पूछा.

तिब्बत चाहता भी तो क्या उसकी सुनी जाती? अमेरिका और यूरोप के लिए वह रूसी ज़मीन के सामने खड़े होने के लिए दुनिया की सबसे ऊंची छत था.

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दलाई लामा के भारत आगमन का दुर्लभ वीडियो

1950 में जब चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा किया तो उसके बाद से दक्षिण-एशिया में राजनैतिक हालात हमेशा के लिए बदल गए. जापान से लेकर इंडोनेशिया और श्रीलंका तक इलाके के तमाम मुल्कि चीन से खफा हो गए. सारे देश अब हिंदुस्तान की तरफ देख रहे थे. जवाहरलाल नेहरू इस कदम की निंदा करें ऐसी उन सबकी चाह थी. जवाहरलाल नेहरू पशोपेश में थे. वे और उनके सलाहकार, वीके कृष्ण मेनन और उधर चीन में भारत के राजदूत केएम पणिक्कर चीनी नेता माओ त्से तुंग और चाऊ एन लाई से खासे प्रभावित थे.

1956 में जब चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई हिंदुस्तान आये थे तो उनके साथ दलाई लामा भी आये. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से तिब्बत की आजादी की बात छेड़ी. जवाहरलाल नेहरू सतर्क थे. वे चीन को रणनैतिक दोस्त की तरह देख रहे थे. उन्होंने दलाई लामा को समझाया कि वे संपूर्ण आजादी की मांग छोड़ें और स्वायत्तता की चाह रखें.

इसी बीच हिंदुस्तान और चीन के बीच मैकमोहन सीमा रेखा को लेकर विवाद छिड़ने लगे थे. दरअसल, सरदार पटेल और जनरल केएस थिमैय्या के बाद कोई नहीं था जो चीन का असली चेहरा जवाहरलाल नेहरू को दिखता. मेनन तो पाकिस्तान को ही अपना ‘दुश्मन नंबर वन’ कहते थे. हद तो तब हो गयी जब 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया और चीन में रहते हुए भी पणिक्कर को यह खबर रेडियो से मिली.

1957 के एक रोज़ चीनी अखबार कुंग मिन-जिह-पाओ ने ख़बर छापी कि ‘दुनिया का सबसे ऊंचा राजमार्ग सिनकियांग–तिब्बत हाईवे’ बनकर तैयार हो गया है. इसमें लिखा था कि 20 भारी ट्रक साज़ो-सामान के साथ इसके परीक्षण के लिए तिब्बत की तरफ दौड़े चले जा रहे हैं. भारतीय ख़ुफ़िया तंत्र बिलकुल सुस्त पड़ा था. तत्कालीन गृह मंत्री गोविन्द वल्लभ पंत भी कुछ हद तक इसके ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं.

अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था. यहां बनी सड़क का मतलब था कि चीन अब हिंदुस्तान के इलाके में से होकर तिब्बत तक जा सकता था. जब तक भारत सरकार जागती, देर हो चुकी थी. चीनी सेना ने किलेबंदी कर ली थी. नेहरू ने तब भी कोई विशेष विरोध नहीं जताया. बस जम्मू-कश्मीर के कुछ नक़्शे चीन को भेजकर अपनी दावेदारी पेश की. पर उसके बाद दोनों देश में ख़तों का आदान-प्रदान शुरू हो गया.

जवाहरलाल नेहरू ने हर कदम पर मैकमोहन रेखा की दुहाई देकर अपनी बात रखी. चीन, जो एक समय पर इस रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने लग गया था, अब इससे साफ़ इंकार करने लगा. अक्सर जवाहरलाल नेहरू के ख़तों के जवाब में चीनी नेता बस ‘जवाब’ ही देते थे. जवाबदेही नदारद थी.

22 मार्च, 1959 को जवाहरलाल नेहरु ने एक और ख़त लिखा कि उन्हें बड़ा आश्चर्य है कि चीन भारत और तिब्बत के बीच सीमा को ही मानने से इंकार कर रहा है. उन्होंने बड़े विस्तार से पुराने हवाले दिए जैसे कि नक़्शे, संधियां और यहां तक कि दोनों मुल्कों के बीच प्राकृतिक सीमा रेखा जो पहाड़ों और नदियों से बनाई गयी थी. इसके पहले चाऊ एन लाई कोई जवाब देते दलाई लामा हिंदुस्तान आ चुके थे. ऐसा इसलिए कि ल्हासा में हालात बिगड़ते जा रहे थे. चीनी सेना से ज्यादतियां शुरू कर दी थीं. विरोध में तिब्बत की खाम्बा जन जाति उठ खडी हुई. चीनी सरकार ने दलाई लामा से कहा कि वे अपने सैनिकों को खाम्बा विद्रोहियों को कुचलने का हुक्म दें. दलाई लामा ने बुद्ध का हवाला देते हुए विद्रोहियों को हिंसा त्यागने के लिए तो कहा, पर अपने सैनिक उनके सामने नहीं उतारे. चीन मतलब समझ गया था. अब उसने अलग तरकीब सोची.

दलाई लामा को चीनी सरकार ने पेकिंग (बीजिंग) में आकर मिलने के लिए कहा. साथ में सलाह दी कि वे सैनिक न लेकर आयें. दलाई लामा के एक ऑस्ट्रेलियाई दोस्त और सलाहकार हेंरिच्क हर्रेर ने चीन की चाल भांप ली और उनसे कहा कि अगर वे अगर बीजिंग गए तो हमेशा के लिए धर लिए जायेंगे. दलाई लामा की मां ल्हासा में भारतीय दूतावास के सामने जाकर रो पड़ीं और बीच-बचाव करने की बात की.

भारत अब भी ख़ामोश था. उसकी अपनी दुविधाएं थीं पर लामाओं और खाम्बाओं के सामने अब कोई दुविधा नहीं थी. उन्होंने फ़ैसला कर लिया था- चाहे जो हो जाए, वे जिएं या मरें, उनके भगवान दलाई लामा को चीनी हाथ भी नहीं लगा पाएंगे! हेंरिच्क हर्रेर ने दलाई लामा को सलाह दी कि उन्हें ल्हासा छोड़ देना चाहिए और जहां से बौद्ध धर्म की नाल जुड़ी है, वहां चले जाना चाहिए. बेटे को मां की एक बार फिर याद आ गयी.

मार्च 17, 1959. तिब्बत उबल रहा था. दलाई लामा और उनका परिवार- मां, एक बहन और दो भाई- अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ भेस बदलकर चल दिए. 19 मार्च को तिब्बत जल उठा. चीनियों ने दलाई लामा को गिरफ़्तार करने के लिए तिब्बत रौंद डाला.

दुनिया भर में चीन की निंदा की जा रही थी. एशिया भारत की तरफ देख रहा था और जवाहरलाल नेहरू को कुछ समझ नहीं आ रहा था. करते भी क्या? एक तरफ़ वे सीमा पर चीन की सीनाज़ोरी झेल रहे थे. दूसरी तरफ़, पंचशील से बंधे हुए थे और तीसरी तरफ, पाकिस्तान और अमेरिका की बढ़ती हुई दोस्ती के सामने अकेले थे. नेहरू महाभारत के अर्जुन की तरह संशय में घिरे हुए थे.

इस सब के बीच दलाई लामा हिंदुस्तान की तरफ बढ़ रहे थे. वे दिन में चीनी सैनिकों से बचने के लिए तिब्बती गांवों में छुपकर रहते और रात में सफ़र करते. उनके भाग जाने के बाद से उनकी कोई ख़बर नहीं आई थी. दुनिया को एकबारगी तो यकीन हो गया कि दलाई लामा लड़ाई में मारे गए हैं. शायद चीनी सैनिक और सरकार भी अब उनकी लाश ही खोज रहे थे और यहीं उन्होंने ग़लती कर दी.

ब्रह्मपुत्र अब सामने नज़र आने लगी थी. लामा परिवार थक चुका था. गोलियों और धमाकों की आवाजें पीछे, बहुत पीछे रह गयी थीं. नदी के पाट की चौड़ाई साढ़े चार सौ मीटर के आसपास थी. ‘केवट’ उन्हें पार कराने के लिए तैयार था. एक पैर नाव में रखकर दलाई लामा ने पीछे मुड़कर देखा. तिब्बत नज़र नहीं आ रहा था. आंखों में हताशा भर गयी. उन्होंने दूसरा पैर भी नाव में रख दिया. नाव चल दी. सब कुछ पीछे छूट गया. कुछ देर बाद असम की बोमडीला हवाई पट्टी नज़र आने लग गयी. भारतीय सैनिकों ने उन्हें देखा तो झूम उठे. दलाई लामा हिंदुस्तान में दाख़िल हो चुके हैं, यह खबर अगले दिन दुनिया भर में फैल गयी. बेटा मां के पास पहुंच गया. बुद्ध मुस्कुरा उठे थे.

चलते-चलते

हिंदुस्तान ने भी इसका खामियाज़ा भुगता. 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. दुनिया को नैवेल मैक्सवेल ने अपनी किताब ‘इंडियास वॉर विद इंडिया’ के ज़रिये यही समझा दिया कि जवाहरलाल नेहर की नीतियों की वजह से चीन आहत हुआ और उसने जंग छेड़ी. देश ने कभी जवाहरलाल नेहरू को माफ़ नहीं किया. अब जाकर स्वीडन के पत्रकार बेर्टिल लिंटर ने उस किताब के जवाब में एक नई किताब लिखी है ‘चाइनास वार विद इंडिया’ इसमें उन्होंने समझाया है कि भारत नहीं, बल्कि चीन इस युद्ध के लिए जिम्मेदार था. माओ त्से तुंग की उस वक़्त ख़राब हालत थी. चीनी सरकार नीतियों के वजह से वहां अकाल पड़ गया था और तकरीबन तीन से चार करोड़ लोग मारे गए थे. बेर्टिल लिंटर के मुताबिक इन सब हालात से चीनियों का ध्यान भटकाने के लिए माओ त्से तुंग ने एक बाहरी दुश्मन खोजा और उस पर चढ़ाई कर दी. दूसरा कारण जो लिंटर लिखते हैं वह था दलाई लामा को भारत में शरण मिलना. इस वजह से भी चीन भारत को सबक सिखाना चाहता था.