दुष्यंत कुमार सत्याग्रह का हिस्सा हैं और दिल्ली में रहते हैं.


कोई 20-22 साल पहले की बात है. गर्मी की छुट्टियों के दिन थे. हम मां के साथ नानी के घर गए हुए थे. मुझे याद है मां ने कह दिया था कि ‘मैं बच्चों को लेकर आराम से 15-20 दिन बाद आऊंगी.’ इस दौराम पापा घर और दफ़्तर अकेले देख रहे थे. नानी के घर में मस्ती करते हुए हमने सात-आठ दिन ही बिताए थे कि एक दिन देर शाम को मां को ग़ुस्से में अपनेआप से ही कुछ कहते हुए सुना. मां वापस घर निकलने के लिए जल्दी-जल्दी तैयार होते हुए बड़बड़ाती जा रही थीं, ‘पहले तो बोल रहे थे जाओ और ख़ूब दिन रहकर आओ. मेरी चिंता मत करना...’ मां ने हमसे भी जल्दी तैयार होने को कहा और इतना बोलीं कि अभी निकलना है, पापा ने वापस आने को कहा है. हमें कुछ समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है. तीनों बहन-भाई बस मां के साथ घर के लिए निकल गए.

हम संयुक्त परिवार में रहते थे. दादा-दादी, उनके छह बेटे और बहुएं, उन सबके भी तीन-चार बच्चे और उनमें से भी कुछ के बच्चे. इसके अलावा घर में किराएदारों की भरमार थी. घर क्या था, मोहल्ला था जो हमारे पहुंचने तक नीचे वाले फ़्लोर में पहले ही इकट्ठा हो चुका था, बाहर भी भीड़ थी. हमारे घर पहुंचने तक मां का ग़ुस्से वाला चेहरा घबराया हुआ सा हो गया था, आते ही उन्होंने पूछा, ‘क्या हुआ उन्हें.’ उस समय मां को बताया गया कि पापा के दफ़्तर में आग लग गई और उसमें वे थोड़ा जल गए थे. जानकारी दी गई कि उंगलियां थोड़ी जल गई हैं. हमें परिवार के दूसरे सदस्यों की देखरेख में छोड़कर मां उसी समय अस्पताल निकल गईं.

घर पर हम तीनों को कोई कुछ नहीं बता रहा था लेकिन घरवालों की आपस में हो रही बातचीत हम सुन ही रहे थे. उन बातों में सिर्फ उंगलियां जलने की बात नहीं थी. हमने लोगों को यह बात बार-बार कहते सुना कि शरीर का ऊपरी हिस्सा आग की लपेट में आया है. चेहरा और दोनों हाथ बुरी तरह जल चुके हैं. बाद में, किसी ने बताया कि हमारे एक बड़े कज़िन ब्रदर पापा का चेहरा देखकर अस्पताल में बेहोश होकर गिर पड़े थे! इन सब बातों से हम तीनों समझ चुके थे कि पापा के साथ कोई बड़ा हादसा हुआ है.

अगले 15-20 दिनों तक पापा अस्पताल में भर्ती रहे. मां पूरा दिन वहीं रहती थीं और रात में घर का कोई और पुरुष सदस्य रुकता था. यहां यह बात ज़रूर कहूंगा कि संयुक्त परिवार के बिना अस्पताल और घर दोनों देखना मां के लिए कभी मुमकिन नहीं होता. जीवन में ऐसे और भी कई मौके आए जब हमारे परिवार के सदस्यों ने आपस के सब मतभेद भुलाकर एक-दूसरे का साथ दिया है.

ख़ैर, करीब 20 दिन बाद दादी हमें अस्पताल लेकर गई थीं. पहले या दूसरे फ़्लोर पर बाईं तरफ़ आख़िरी कमरा था जहां पापा को बेड दिया गया था. उस गलियारे से गुज़रते हुए हर कमरे में जले हुए लोग चीख़ते-चिल्लाते नज़र आ रहे थे, वहां एक अजीब सी गंध फैली हुई थी. पापा के कमरे के क़रीब आते-आते मन भारी होता जा रहा था. उसका दरवाज़ा खोलते ही सामने एक ख़ाली बेड दिखा और उसके ठीक सामने वाले बेड पर पापा दिखाई दिए. उनके चेहरे पर केवल आंखें जलने से बची थीं जो हमें देख रही थीं. दोनो हाथों में पट्टियों के बंडल लिपटे हुए थे. हम तीनों एक पल के लिए बाहर ही अटक से गए. दादी ने हमें कमरे के अंदर किया. वहां मां पहले से थीं. पापा को देखकर मेरे तीनों भाई-बहन रोने लगे. मैं सामने वाले ख़ाली बेड पर चुपचाप बैठा रहा. पापा को अस्पताल में देखकर हम दुखी थे, लेकिन वहां यह बताए जाने के बाद कि वे ठीक हो जाएंगे और जल्दी ही घर लौटने वाले हैं, हम ख़ुश थे.

घर लौटने के बाद हम पापा को ज़्यादा ठीक से देख पाए. उनके हाथों और चेहरे की हालत सबसे ज़्यादा ख़राब थी. रोज़ पट्टियां होती थीं और एक बार में बंडल के बंडल लग जाते थे. हमने उनके लिए अलग कमरा रखा था जिसे लगातार ठंडा रखने के लिए कूलर की अलग से व्यवस्था की गई थी. रात में अन्य रिश्तेदारों के अलावा मैं या मेरा भाई अक्सर उनके पलंग की बगल में सोते थे ताकि रात में उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो हम उसका इंतज़ाम करें. गर्मी का मौसम था और कूलर से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था. जलन से पापा अक्सर चिल्लाते थे. उस समय उन्हें देखना असहनीय था.

अब वह घटना बताता हूं जिसने पापा को इस हालत में पहुंचा दिया था. दरअसल पापा दिल्ली में मौजूद इंद्रप्रस्थ पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड में टेक्निकल असिस्टेंट रहे थे. 1996 के आसपास उनका विभाग बदल गया. अब वे बिजली बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा थे. नई जगह का काम सीख ही रहे थे. शिफ़्ट की नौकरी थी. घटना वाले दिन से पहले बीते दो दिनों से वे 16-16 घंटे काम कर रहे थे. हादसे वाले दिन जिस समय घटना घटी वह उनका रिलीविंग टाइम था. लेकिन अगले साथी के आने में देरी की वजह से उन्हें थोड़ा रुकना पड़ा.

इसी दौरान उन्हें ब्रेकर बॉक्स को चेक करने का आदेश दिया गया. बिजली पैदा होते वक़्त इन ब्रेकर बॉक्स में से गुज़रती है. इन्हें खोलते समय इनमें बिजली का प्रवाह नहीं होता, इस जानकारी को लेकर कोई ग़लतफहमी हो गई थी. पापा ने जैसे ही ब्रेकर खोला, 3300 वोल्ट की बिजली ने उनके शरीर के ऊपरी हिस्से और दोनों टांगों के कुछ हिस्सों को झुलसा दिया. तेज़ बिजली की चौंध से उन्हें थोड़ी देर तक कुछ नज़र नहीं आया. ऊपर से ब्रेकर के चारों तरफ़ जालियां लगी हुई थीं. ब्रेकर में किसी भी समय ब्लास्ट होने वाला था. उस समय पापा वहां अकेले थे. लेकिन असहनीय जलन और दर्द में भी वे घबराए नहीं. उन्होंने निकलने का रास्ता ढूंढा, और जैसे ही जाली से बाहर निकले ब्रेकर बॉक्स में ज़ोरदार धमाका हुआ. अगर पापा घबराहट में वहीं लेट जाते तो कुछ भी हो सकता था.

अचानक सामने आए उस जानलेवा संकट में भी पापा ने होश नहीं खोया और घबराए नहीं. हादसे के पलों के बारे में बताते हुए उनके ऑफ़िस के लोग कहते थे कि वे पापा की हालत और हिम्मत दोनों देखकर दंग थे. उन्होंने जली हालत में ही साथियों को हादसे के बारे में बताया. उनसे घर में फ़ोन करने को कहा. लैंडलाइन नंबर बताया और कहा कि घरवाले जल्दी अस्पताल पहुंचें.

कई दिनों तक हम दूसरों के मुंह से ये सब सुनते रहे. कुछ समय बाद जब पापा ठीक-ठाक बोलने की हालत में आए तो बताने लगे कि हुआ क्या था और वे कैसे और ज़्यादा जलने से बचे. ये सब वे मां को बताते रहते थे और हम तीनों कान लगाकर सुनते रहते थे. उन्होंने कभी उस क़िस्से को कुछ सिखाने के लिहाज़ से नहीं सुनाया. लेकिन उसमें सीख तो थी ही. एक यह कि समय और परिस्थिति कैसी भी हो ग़ैरज़रूरी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, और अगर कोई बड़ा संकट अचानक सामने आ जाए तो होश और हिम्मत नहीं खोने चाहिए. इस तरह एक हादसा जो हमसे पापा को छीन भी सकता था उसी ने उन्हें हमारे लिए साहस की मिसाल बना दिया.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.comपर भेज सकते हैं.)