एक वामपंथी युवा नेता को कैमरों के सामने एक हिंदुत्ववादी प्रवक्ता ने ललकारा - स्टालिन को मानते हैं या लेनिन को. और उन्होंने कहा ‘स्टालिन मुर्दाबाद.’ लेकिन ‘लेनिन मुर्दाबाद’ कहकर ललकारने वाले को संतुष्ट नहीं किया. बताया जाता है कि उन्होंने जवाबी ललकार लगाई और प्रवक्ता को ‘गोडसे मुर्दाबाद’ कहने की चुनौती दी. लेकिन उस प्रवक्ता ने यह नारा लगाने से इंकार कर दिया.

उग्र और वाचाल प्रवक्ता के उकसावे में उस युवा नेता को क्यों आना चाहिए था?, यह सवाल उनके प्रशंसक उनसे कर रहे हैं. आखिर हाजिरजवाबी और वाग्मिता के मामले में उनके शत्रु भी उनका लोहा मानते हैं! फिर इस फेरे में पड़ना ही क्यों था?

युवा नेता के ज़्यादातर वामपंथी समर्थक इस कारण उनसे क्षुब्ध हैं कि उन्होंने ‘स्टालिन मुर्दाबाद’ कहा. कुछ उनसे अपनी विचारधारा के बारे में साफ़-साफ़ बात करने को कह रहे हैं. कुछ का कहना है कि आखिरकार उनका संशोधनवादी चेहरा बेनकाब हो गया है. इस घटना पर शुरू हुई बहस में स्तालिन के गुण गिनाए जा रहे हैं. दूसरी बड़ी जंग में उनकी भूमिका की याद दिलाई जा रही है. युवा नेता पर लानत भेजी जा रही है और उनको फिर से कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास पढ़ने को कहा जा रहा है.

हाजिरजवाबी हमेशा साथ नहीं देती. वरना नारा लगाने की जगह उस प्रवक्ता को कहा जा सकता था कि स्तालिन एक व्यक्ति का नाम तो है लकिन अब वह प्रवृत्ति का नाम भी है. या प्रतीक है. इसलिए उन्हें अपने पार्टी में झांक कर देखना चाहिए कि कहीं उसका स्तालिनीकरण तो नहीं हो रहा! आखिर स्तालिन ने पार्टी पर पकड़ मजबूत होते ही, या मजबूत करने के लिए ही, अपने पूर्ववर्ती नेता लेनिन के सारे सहकर्मियों को एक-एक करके या तो किनारे किया या ठिकाने लगा दिया था. हर मायने में! या वे दुनिया से ही विदा कर दिए गए या पहले मुल्क छोड़ने को मजबूर किए गए, बाद में उन्हें खत्म कर दिया गया – त्रात्स्की उनमें से एक है, कामेनेव दूसरा, लेनिन ने जिसे सुनहरे दिल का शख्स कहा था, वह बुखारिन भी इनमें शामिल था. सब मारे गए!

यह भयंकर रूप से दिलचस्प था कि स्टालिन के समय में जिन्हें मारा जाना होता था, वे खुद ही सार्वजनिक रूप से अपने अपराध स्वीकार करते थे और खुद ही मौत की सज़ा भी मांगते थे. बेचारे स्तालिन के पास उनकी ही इच्छा को ठुकराने की कठोरता कहां थी!

तो आज के भारत के शासक दल को, जो कम्युनिस्टों को मेकॉले और मुसलमानों के बाद सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, यह सुनकर हैरानी होगी कि उसका स्तालिनीकरण होता जा रहा है. वह इसलिए कि उस दल के जितने शीर्ष या असंतुष्ट नेता हैं वे आज हाथ मलते कहीं किनारे खड़े दिखलाई दे जाते हैं.

स्तालिन एक गुण में बदल गया है. जैसे हम बार बार हिटलर की वापसी का ख़तरा बताते हैं, वैसे ही स्तालिन के मौजूद होने का ख़तरा भी है, यह हमें समझने की ज़रूरत है.

और वे, जो स्तालिन के गुण गिना रहे हैं, उन्हें जानने की जरूरत है कि दूसरे विश्वयुद्ध में स्तालिन की महान वीरता के बरक्स दूसरी कई कहानियां और भी हैं. उनके प्रशंसक हिटलर से उनके समझौते को उनकी कूटनीतिक चतुराई मानते हैं लकिन यह पोलैंड से पूछना चाहिए कि वह इसे क्या मानता है?

कई बार ऐसा लगता है कि हिटलर ने जो किया उसकी प्रेरणा उसे स्तालिन के लेबर कैंप से ही मिली होगी. स्तालिन का लेबर कैंप सोवियत समाज का वैसा ही नायाब प्रयोग या आविष्कार क्यों न माना जाए जैसा हिटलर का कंसेंट्रेशन कैंप था. यहूदियों से हिटलर को घृणा थी लेकिन स्टालिन का व्यवहार उनके प्रति कोई मित्रतापूर्ण न था!

लेखकों, कलाकारों, बौद्धिकों के प्रति स्तालिन का रुख क्या था, क्या इसके बारे में कोई बहस है! मेयरहोल्ड, जो सोवियत संघ के अत्यंत प्रतिभाशाली रंगनिर्देशक थे, ने कहा कि समाजवादी यथार्थवाद उन्हें बकवास लगता है और फिर वे गायब ही हो गए. उनकी मौत या हत्या को लेकर कई तरह के किस्से हैं लेकिन इसे लेकर तो कोई मतभेद ही नहीं है कि उनकी मौत उस शासन के चलते हुई जो स्तालिन का था!

बहस में जीतने के लिए ब्रेख्त या मुक्तिबोध की स्तालिन की प्रशंसा में लिखी कविताएं उद्धृत की जा सकती हैं. लेकिन उनसे इन महान रचनाकारों की अपनी नैतिक दुविधा का ही पता चलता है, स्तालिन के अपराधों की सूची छोटी नहीं होती.

स्तालिन भी क्या किसी एक प्रवृत्ति का ही प्रतिनिधि नहीं था? बुखारिन जिस ‘मॉस शो ट्रायल’ की बाद मार डाले गए, लेनिन के जमाने वे भी ऐसे ही एक ‘मास शो ट्रायल’ के आयोजकों में शामिल थे. उन्हें समाजवादियों के साथ वह सलूक करने में कोई दिक्कत न थी जो बाद में स्तालिन ने उनके साथ किया.

अगर हिटलर की जर्मनी के सारे उम्दा दिमाग देश छोड़ने को मजबूर हुए तो स्तालिन के सोवियत संघ का रिकॉर्ड बेहतर नहीं. जलावतन किए गए या लेबर कैंपों में डाले गए या गायब कर दिए या मार डाले गए दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, लेखकों, कलाकारों की सूची असहनीय रूप से लंबी है.

जैसे जर्मनी में उत्पादन के आंकड़े और चिकनी सड़कों की फिसलती तेज रफ़्तार गाड़ियां उसे महान साबित नहीं कर सकतीं वैसे ही स्टालिन को महान कहने वालों को पहले अपनी नैतिक तुला की जांच कर लेनी होगी.

लेकिन स्तालिन या माओ या ख्मेर रूज़ को सामने रखकर अगर तथाकथित आज़ाद दुनिया यह कहे कि यह सब कुछ साम्यवाद की आतंरिक विकृति है तो उसे भी सिर्फ अमरीका के मककार्थी युग की याद दिलाना काफी होगा. और वह तो अमरीका का राष्ट्रपति भी न था! मात्र एक सीनेटर! लेकिन उस ज़माने की याद करके अमरीका के लेखकों, कलाकारों, बौद्धिकों को अभी भी सिहरन होती है!

तो ‘स्तालिन जिंदाबाद’ कैसे कहें!

लेकिन किसी की मृत्यु की कामना करना भी हमारी संस्कृति में नहीं. हमारी का मतलब मानवीय संस्कृति ही है. तो स्तालिन हो या गोडसे, मुर्दाबाद भी नहीं. किंतु मानवीयता के जिस तर्क से यह गलत है, उसके अपराधियों की सूची में इनका नाम तो रहेगा ही! लेकिन जिन्हें भी मुर्दाबाद का नारा लगाने का उत्साह है उन्हें भी एक बार आइने में खुद को देखना होगा!