अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनर्स आयर्स में बीती 10 से लेकर 13 दिसंबर तक बीच विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का 11वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आयोजित हुआ. इस बैठक की ओर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुईं थीं. हालांकि, अमेरिका द्वारा सार्वजनिक खाद्य भंडारण के मुद्दे का स्थायी समाधान ढूंढने और सब्सिडी के मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटने की वजह से चार दिनों का यह सम्मेलन बिना किसी ठोस नतीजे के ही खत्म हो गया. इससे पहले दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (2015) में भी सदस्य देशों के बीच इन मुद्दों को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी. एक जनवरी, 1995 को गठित डब्ल्यूटीओ में कुल 164 सदस्य देश हैं और इसका मंत्रिस्तरीय सम्मेलन हर दूसरे साल बुलाया जाता है. यह डब्ल्यूटीओ का फैसले लेने वाला शीर्ष निकाय है.

बताया जाता है कि सार्वजनिक खाद्य भंडारण और खाद्य सब्सिडी से जुड़े मुद्दे पर गतिरोध को खत्म करने में विफल रहने के चलते भारत, चीन और ब्राजील सहित अन्य विकासशील देशों को काफी निराशा हुई है. केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. इसके साथ ही, डब्ल्यूटीओ के महानिदेशक रॉबर्टो एजवेडो ने भी बातचीत की प्रगति को लेकर अपनी निराशा जाहिर करते हुए सदस्य देशों से कहा, ‘बहुपक्षीय बातचीत में आपको वह नहीं मिलता जो आप चाहते हैं, आपको वह मिलता है जो संभव है.’ उधर, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइथिजर ने सम्मेलन की सफलता को लेकर रॉबर्टो एजवेडो और ब्यूनर्स आयर्स सम्मेलन की अध्यक्ष सुसैना मालकोरा को बधाई दी है.

डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों के मुताबिक विकासशील देशों को साल 1986-87 के आधार मूल्य पर अपनी खाद्य सब्सिडी की सीमा 10 फीसदी तक तय करने को कहा गया है. विकसित देशों के लिए यह सीमा पांच फीसदी है. भारत, चीन और ब्राजील सहित अन्य विकासशील देशों का मानना है कि यह प्रावधान मनमाना है. इन देशों में इस प्रावधान के अमल में आने पर इसका असर भूखमरी से जूझ रहे करीब 80 करोड़ लोगों पर पड़ना तय है. इसे देखते हुए ही भारत सहित अन्य विकासशील देश इस प्रावधान में संशोधन करने की मांग कर रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देश इस पर अड़े हुए हैं.

डब्ल्यूटीओ के ब्यूनर्स आयर्स मंत्रिस्तरीय सम्मेलन की विफलता को लेकर देश के प्रमुख अखबारों ने निराशा जाहिर की है. साथ ही उन्होंने वैश्विक कारोबार को लेकर दुनिया की इस सबसे बड़ी और नियामक संस्था की विश्वसनीयता और सार्थकता को लेकर सवाल उठाया है. इसके अलावा अधिकांश अखबारों ने इसके पीछे अमेरिका के अड़ियल रुख को जिम्मेदार ठहराया है.

हिन्दुस्तान टाइम्स ने कहा है कि ब्यूनर्स आयर्स सम्मेलन लगातार दूसरा मौका है, जब मंत्रिस्तरीय यह बैठक विफल रही है. अखबार ने इसके साथ ही अमेरिका को भी निशाने पर लिया है. अखबार का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से पीछे हटने के बाद अब डब्ल्यूटीओ की इस बैठक में अमेरिका का रुख बताता है कि शायद वह अभी भी बहुस्तरीय मंचों में लिए गए संकल्प का सम्मान करने के लिए तैयार नहीं है. उधर, भारत ने सम्मेलन से पहले ही चेतावनी दी थी कि खाद्य सुरक्षा के लिए भंडारण के मुद्दे का कोई समाधान नहीं निकलने पर विश्व व्यापार संगठन की विश्वसनीयता को ही नुकसान पहुंचेगा.

अमर उजाला ने सम्मेलन के विफल होने को भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के लिए बड़ा झटका बताया है. अखबार के मुताबिक इससे पता चलता है कि अमेरिका अभी भी वैश्विक मंचों पर चौधरी की तरह व्यवहार करता है. इस मुद्दे पर प्रकाशित संपादकीय में उसने लिखा है कि डब्ल्यूटीओ की स्थापना के बाद से ही इसमें विकसित देशों का दबदबा रहा है. साथ ही, ये देश कृषि सब्सिडी के मुद्दे पर विकासशील देशों पर दबाव बनाते रहे हैं. इस मुद्दे पर भारत सहित विकासशील देशों का कहना है कि उनके यहां अधिकांश कृषि वर्षा आधारित होने की वजह से किसानों के लिए सब्सिडी जरूरी है. साथ ही, गरीब लोगों को अनाज उपलब्ध कराना उनकी सरकारों का दायित्व है.

उधर, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस सम्मेलन में कोई नतीजा न निकलने को चिंताजनक बताया है. अन्य अखबारों की तरह इसने भी माना है कि ब्यूनर्स आयर्स सम्मेलन के बाद वैश्विक स्तर पर डब्ल्यूटीओ के प्रभाव पर सवाल उठ खड़े हुए हैं. साथ ही, इसके लिए सबसे बड़ी चिंताजनक बात अमेरिका का रुख है. अखबार का आगे कहना है कि खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भारत को सम्मेलन के विफल होने से कोई नुकसान नहीं पहुंचा है. फिलहाल भारत सरकार इसे आगे भी जारी रख सकती है. इसके साथ ही अखबार ने कहा है कि बैठक में भारत ने खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को लेकर अपना बचाव अच्छे से किया. साथ ही, अखबार ने अगले साल खाद्य सुरक्षा को लेकर कुछ देशों की बैठक बुलाने को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है.

डब्ल्यूटीओ की बैठक में बातचीत को लेकर अमेरिका का रुख | साभार : द हिंदू
डब्ल्यूटीओ की बैठक में बातचीत को लेकर अमेरिका का रुख | साभार : द हिंदू