गुजरात में बाजी एक बार फिर भाजपा के हाथ लगी है. चुनावी नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस की कड़ी टक्कर के बावजूद भाजपा ने अकेले बहुमत पाने में सफलता हासिल की है. लेकिन इस जीत ने यह भी साफ कर दिया है कि आगे पार्टी के लिए मुश्किल अब और बड़ी होने जा रही है. बीते 22 वर्षों से गुजरात की सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए अब वे युवा नेता सदन में भी चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं जिन्होंने इस चुनाव के दौरान पार्टी प्रबंधकों के माथे पर बल डाल दिए.

ये नेता हैं जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर. निर्दलीय जिग्नेश और कांग्रेस के अल्पेश, दोनों ने भाजपा उम्मीदवारों को मात दी. इन दोनों के अलावा पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) के संयोजक ललित वसोया भी विधानसभा पहुंचे हैं. हालांकि, कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे ‘पास’ के दूसरे उम्मीदवार जयेश लडानी को हार का सामना करना पड़ा.

चुनावी नतीजों के बाद यह बात साफ होती दिखती है कि आने वाले दिनों में गुजरात की राजनीति में इन युवाओं की अहम भूमिका हो सकती है. माना जा रहा है कि हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की कांग्रेस के पक्ष में गोलबंदी की वजह से भाजपा को नर्वस नाइंटीज (कुल 99 सीट) का शिकार होना पड़ा है. जानकार बताते हैं कि इनकी कामयाबी देश में जमीनी मुद्दों पर आधारित युवा राजनीति को एक दिशा दे सकती है. हालांकि, इसके साथ ही इन सभी के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं जो इनकी राहें अलग कर सकती हैं.

हार्दिक पटेल

बीते ढाई साल से पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) के प्रमुख 24 वर्षीय हार्दिक पटेल सत्ताधारी भाजपा की सबसे बड़ी मुसीबत बने रहे हैं. गुजरात चुनाव के दौरान उन्होंने रोजगार और किसानों की खराब स्थिति सहित कई मुद्दों पर भाजपा पर सबसे तीखा हमला बोला है. हार्दिक ने चुनावी अभियान के दौरान लगातार कहा है कि विकास केवल शहरों में हुआ है और ग्रामीण इलाकों में भाजपा के खिलाफ गुस्सा है. चुनावी नतीजे भी इसके पुष्टि करते हुए दिखाई देते हैं.

राजनीतिक मामलों के जानकार भी बताते हैं कि2015 में पटेल आरक्षण की मांग करने वाले हार्दिक पहले से अधिक परिपक्व दिख रहे हैं. पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग के अलावा उनकी जुबान पर युवाओं में बेरोजगारी और किसानों से जुड़े मुद्दे भी चढ़े हैं. चुनावी नतीजे आने के बाद उन्होंने कहा कि वे आगे भी इन मुद्दों को गांव के साथ-साथ शहरों में भी उठाते रहेंगे. हालांकि, माना जा रहा है कि पटेल युवाओं का समर्थन अपने साथ बनाए रखने के लिए आरक्षण का मुद्दा इनमें सबसे ऊपर रहेगा.

जिग्नेश मेवाणी

गुजरात में दलित अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद करने वाले जिग्नेश मेवाणी ने चुनाव के दूसरे चरण के लिए नामांकन की तारीख खत्म होने से एक दिन पहले चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान किया था. उन्होंने अपनी पहली सियासी पारी के लिए उत्तरी गुजरात स्थित बनासकांठा की वडगाम सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार दांव लगाना सही समझा. उनकी उम्मीदवारी को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) ने समर्थन दिया था.

इससे पहले वडगाम विधानसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा था. करीब ढाई लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में दलित और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख है. इसके अलावा ठाकोर समुदाय के मतदाताओं की संख्या भी करीब 25 हजार है. इस समुदाय के नेता अल्पेश ठाकोर ने जिग्नेश मेवाणी को अपना समर्थन दिया था.

गुजरात के मेहसाणा जिले से आने वाले जिग्नेश मेवाणी उना में दलितों की पिटाई के बाद देश में दलित अधिकारों की बड़ी आवाज बनकर उभरे हैं. कुछ समय तक जिग्नेश आम आदमी पार्टी से भी जुड़े रहे. फिलहाल वे उना दलित अत्याचार लड़ाई समिति के संयोजक हैं. जिग्नेश मेवाणी पहले भी राज्य में दलितों का नेतृत्व करने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं. इसके साथ ही उनका मानना है कि असली लड़ाई साल 2019 का लोकसभा चुनाव होगा, जब पूरे देश की 18 फीसदी दलित आबादी भाजपा के खिलाफ वोट देगी. जिग्नेश लगातार कहते रहे हैं कि चुनाव में जीत के बाद भी वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे और दलित-मुसलमान एकता के लिए काम करेंगे.

अल्पेश ठाकोर

गुजरात चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल होने वाले 40 वर्षीय अल्पेश ठाकोर ओबीसी क्षत्रिय-ठाकोर समुदाय आते हैं. उत्तरी और मध्य गुजरात में उनकी करीब 22 फीसदी आबादी है. अल्पेश ठाकुर ने चुनाव लड़ने के लिए पाटन जिले की राधनपुर सीट पर दांव लगाना सही समझा. इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 65 हजार ठाकोर मतदाताओं के साथ करीब 40 हजार मुसलमान और दलित मतदाता हैं. इस सीट पर भाजपा ने कांग्रेस के बागी लविंगजी ठाकोर को उतारा था, जो कोली-ठाकोर समुदाय से आते हैं.

अल्पेश ठाकोर साल 2015 में पाटीदार आंदोलन शुरू होने के बाद चर्चा में आए थे. उन्होंने इसके खिलाफ ओबीसी-एसी-एटी एकता मंच का गठन किया था. उस वक्त पाटीदार आंदोलन के बारे में अल्पेश का कहना था कि यह आरक्षण की मांग को लेकर नहीं बल्कि, इसे खत्म करने के मकसद से शुरू किया गया है. इसके अलावा हार्दिक पटेल ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग कर रहे थे इससे ओबीसी में शामिल जातियों को अपनी कुछ हिस्सेदारी जाने की आशंका हो गई थी. इससे पहले 2011 में अल्पेश ने क्षत्रिय-ठाकोर सेना का गठन किया था. इसके बाद उन्होंने राज्य में शराबबंदी को सख्ती से लागू करने के लिए भी आंदोलन चलाया. गुजरात में 1960 से शराबंदी लागू है.

हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश के लिए चुनौती

जानकारों के मुताबिक इन तीनों युवा नेताओं ने देश में युवा राजनीति की ओर एक उम्मीद जगाने का काम तो किया है लेकिन, जिन समुदायों का ये प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके बीच आपसी टकराव ही इनके लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.

इसके बारे में जिग्नेश मेवाणी मानते हैं कि राज्य में पाटीदार-दलित, दलित-ओबीसी और ओबीसी-पाटीदारों के बीच अपने हितों और अधिकारों को लेकर टकराव है, इसके बावजूद अल्पेश और हार्दिक उनके साथ हैं क्योंकि उन सभी का टकराव भाजपा के साथ है. इसके साथ ही जिग्नेश का कहना है कि उनके बीच जो भी टकराव वाले मुद्दे हैं, उनका समाधान कर लिया जाएगा.

दूसरी ओर, पाटीदार आंदोलन को लेकर भाजपा पहले ही सख्त रुख अपना चुकी है. हार्दिक के अपने खिलाफ लगातार हमले को देखते हुए वह इसमें कोई ढील देगी, इसकी संभावना कम ही नजर आती है. जानकारों के मुताबिक ऐसी स्थिति में हार्दिक पटेल अगर आरक्षण की मांग को लेकर उग्र रुख अपनाते हैं तो अल्पेश के साथ उनके टकराव से इनकार नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा राज्य में शोषित और वंचित दलित समुदाय, समृद्ध माने जाने वाले पाटीदारों के साथ एक हो पाएगा, इसकी संभावना भी कम ही नजर आ रही है.

कुल मिलाकर यह आने वाला वक्त ही बता सकता है कि ये युवा राजनेता अपने समुदाय के हितों से समझौता करके भाजपा को कड़ी टक्कर देंगे या फिर खुद ही एक-दूसरे के लिए चुनौती बनेंगे.