भाजपा मुख्यालय 11 अशोक रोड में नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज़ में अमित शाह की पीठ थपथपाई उसे देखकर भाजपा के पदाधिकारी और उस दफ्तर में काम करने वाला स्टाफ, दोनों चौंक गए. पदाधिकारी तो फिर भी बदलते रहते हैं लेकिन दफ्तर का स्टाफ तो नरेंद्र मोदी को एक लंबे समय से जानता है. एक ने कहा कि प्रधानमंत्री के चेहरे पर इतनी खुशी तो 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने पर भी नहीं देखी थी.

गुजरात का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच की सीधी टक्कर थी. 22 साल में पहली बार मोदी गुजरात की ज़मीन पर इतनी मुश्किल जंग लड़ रहे थे और राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार परीक्षा में बैठे थे. बड़े-बड़े विश्लेषणों को किनारे कर दें तो एक सीधी-सादी उस वजह की ओर ज्यादातर लोगों ने ध्यान नहीं दिया जिसके चलते मोदी शायद यह अग्निपरीक्षा हारते-हारते जीत गए और राहुल गांधी गुजरात जीतते-जीतते हार गए.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की रणनीति में सबसे बड़ा फर्क अपने अपने ‘चाणक्य’ के इस्तेमाल को लेकर था. भाजपा में जीत की रणनीति हमेशा की तरह अमित शाह ने बनाई. लेकिन राहुल ने चुनाव से पहले अपना चाणक्य बदल दिया. कांग्रेस के एक बड़े नेता के करीबी पत्रकार ने बताया राहुल अगर अहमद पटेल को अपने साथ लेकर उनके हिसाब से चलते तो स्थिति ठीक उल्टी हो सकती थी. लेकिन वे प्रदेश के उन नेताओं के इशारे पर चल रहे थे जो खुद अपना चुनाव हार गए.

कुछ महीने पहले, राज्यसभा चुनाव के वक्त अहमद पटेल ने अपनी रणनीति से अकेले दम पर अमित शाह को हराया था. लेकिन इसके कुछ महीने बाद राहुल ने एक तरह से उनसे किनारा कर लिया. वे अहमद पटेल की बात सुन जरूर लेते थे, लेकिन उस पर चलते नहीं थे. बताने वाले बताते हैं कि सिर्फ नौ फीसदी मुस्लिम आबादी वाले गुजरात में कांग्रेस के प्रदेश नेताओं को अहमद पटेल एक अनुभवी रणनीतिकार से ज्यादा एक मुस्लिम नेता लगने लगे थे. सुनी-सुनाई है कि राहुल ने भी उनकी इस दलील को मान लिया. जबकि गुजरात में कांग्रेस के पास अहमद पटेल के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं जो एक-एक जिले, एक-एक इलाके को जानता-समझता हो और उससे भी ज़्यादा अमित शाह की एक-एक चाल को पढ़ सकता हो.

24 अकबर रोड में अहमद पटेल के करीबी एक नेता ने कुछ पत्रकारों को बताया कि इस बार पटेल कुछ भी करके भाजपा को हराना चाहते थे. वे राज्यसभा चुनाव के दौरान हुई तोड़फोड़ का बदला लेना चाहते थे. लेकिन राहुल उनकी मदद लेते दिखने को तैयार ही नहीं थे. आखिर में कांग्रेस के सबसे सक्षम रणनीतिकार को ज्यादातर वक्त चुनावी मैदान से बाहर ही रहना पड़ा.

इसके उलट अमित शाह ने दो महीने गुजरात में ही गुजारे. उनके कहने पर गुजरात की 182 सीटों के एक-एक बूथ की रिपोर्ट मंगाई गई. जब भाजपा को यह लगा कि सौराष्ट्र और ग्रामीण इलाके में जीतना मुश्किल है तो फिर शहर की उन पक्की सीटों पर पूरी ताकत झोंक दी गई जहां पार्टी अजेय मानी जाती है. एक-एक सीट के लिए रणनीति बनाई गई. इसका सबसे बढ़िया उदाहरण उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल की सीट मेहसाना है. मेहसाना पाटीदार बहुल इलाका है और हार्दिक पटेल के आंदोलन का केंद्र रहा है. नितिन पटेल को हराना हार्दिक ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और पाटीदारों का रुख भी कुछ-कुछ ऐसा दिख रहा था. अंत में भाजपा ने पांच पाटीदार नेताओं को निर्दलीय के तौर पर यहां से चुनाव में उतार दिया. इन सबने पाटीदार वोट काटे और आखिरकार नितिन पटेल अपनी सीट बचाने में कामयाब हो गए.

चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने संसाधनों की भी कोई कमी नहीं रखी. पन्ना प्रमुखों के पास मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने के लिए अनगिनत गाड़ियां मुहैया कराई गई. एक-एक पन्ना प्रमुख ने जो मांग की उसे घंटे भर में पूरा किया गया. इसके उलट कांग्रेस माहौल बनाकर चुनाव जीतने में लगी थी.

अहमदाबाद में एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि माहौल की बात करें तो वह कांग्रेस के पक्ष में था. इसीलिए गुजरात में इस बार वोटों का बंटवारा शहर बनाम गांव की तर्ज पर हुआ. शहर में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया और गांवों में कांग्रेस आगे निकली. लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी कमी यह रही कि वह अपने वोटरों को बूथ तक पहुंचा ही नहीं पाई. यहीं पर राहुल गांधी को अहमद पटेल की जरूरत थी.

कांग्रेस में अहमद पटेल ही एक ऐसे नेता हैं जो दिल्ली हो या गुजरात संसाधन और संपर्क में अमित शाह का मुकाबला कर सकते हैं. राहुल गांधी ने दिल्ली और मुंबई से नेताओं को गुजरात भेजा, बस अहमद पटेल को ही किनारे कर दिया. अब तो खबर यहां तक है कि सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद अहमद पटेल भी सियासत से संन्यास लेने के बारे में सोच रहे हैं.