क्या किसी राजनीतिक पार्टी की रैली या रोड-शो में आई भीड़ उसके जनसमर्थन का विश्वसनीय पैमाना हो सकती है? हाल में संपन्न हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बड़े नेताओं की रैलियों में लोगों की कम संख्या और ख़ाली पड़ी कुर्सियों को मीडिया ने विशेष रूप से कवर किया. सोशल मीडिया पर भी भाजपा और कांग्रेस समर्थक एक-दूसरे की रैलियों में ख़ाली क़ुर्सियों वाले वीडियो शेयर कर यह बताते रहे कि उन्होंने जनता का विश्वास खो दिया है.
गुजरात चुनाव की रैलियों पर ख़ास तौर पर नज़र रखी गई. मीडिया और सोशल मीडिया के एक हिस्से ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों की रैलियों की ख़ाली कुर्सियों को उनके घटते जनसमर्थन के संकेत के रूप में दिखाने का प्रयास किया. कुछ रिपोर्टों में तो पक्षपात स्पष्ट दिखाई दिया. उन्हें इस तरह पेश किया गया कि कोई एक पार्टी मुक़ाबले में कमतर दिखाई दे.

गुजरात चुनाव के दौरान ऐसी ही कुछ मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों की हेडिंग कुछ यूं रहीं : ‘कांग्रेस के दावों की निकली हवा, राहुल की रैली में ख़ाली रह गईं कुर्सियां’, ‘हिम्मतनगर में ख़ाली कुर्सियों को भाषण देते रहे राहुल गांधी’, ‘नरेंद्र मोदी की रैली में ख़ाली कुर्सियां, कोई सुनने नहीं आया’, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोल रहे थे फिर भी रैली छोड़कर चल दिए लोग’, ‘धुंधका में पीएम की रैली, आधी कुर्सियां फिर ख़ाली’, ‘मायावती की गुजरात रैली से क्यों डर गए मोदी’, ‘मोदी की रैली से ज़्यादा भीड़ हार्दिक पटेल की रैली में, भाजपा में मचा हड़कंप’, ‘मोदी के हाथ से निकलता जा रहा गुजरात? मोदी-शाह की रैली की सच्चाई’, ‘हार्दिक पटेल की सूरत में हुई रैली ने भाजपा को चिंतित होने की वजह दे दी है’, ‘क्या गुजरात में भाजपा कांग्रेस के ख़िलाफ़ अपनी पकड़ खो रही है’, ‘मोदी लहर ग़ायब, भुज रैली में ख़ाली कुर्सियां’, ‘गुजरात गौरव यात्रा के दौरान अहमदाबाद की रैली में ख़ाली कुर्सियों को भाषण देते रहे पीएम मोदी’.
गुजरात चुनाव के प्रचार की शुरुआत में भाजपा की तरफ़ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और पार्टी के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ ने अक्टूबर के मध्य में वलसाड़ में एक रोड-शो किया था. रोड-शो के दौरान योगी आदित्यनाथ के क़ाफ़िले के आसपास भीड़ नहीं दिखी. मीडिया में रोड-शो को फ़्लॉप क़रार दिया गया और सवाल किया गया कि क्या यह फ़्लॉप रोड-शो भाजपा के चुनाव हारने का संकेत है. लेकिन चुनाव के नतीजों पर फ़्लॉप रोड-शो का कोई प्रभाव नहीं दिखा. वलसाड़ से भाजपा के उम्मीदवार भरत भाई पटेल ने कांग्रेस के नरेंद्र कुमार को 42 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हराया.
वोट शेयरिंग के लिहाज़ से देखें तो भाजपा का पूरे राज्य का प्रदर्शन भी रैलियों की कम भीड़ से प्रभावित नहीं दिखा. पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को कुल 47.85 प्रतिशत वोट मिले थे. इस बार यह आंकड़ा 49.1 प्रतिशत रहा. यानी भाजपा के वोट शेयर में कमी नहीं आई. हालांकि उसे 16 सीटों का नुक़सान हुआ. वहीं, कांग्रेस के वोट शेयर में भी थोड़ा ही सही लेकिन इज़ाफ़ा हुआ. 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को क़रीब 39 फ़ीसदी वोट मिले थे और उसने 61 सीटें जीती थीं. इस बार के चुनाव में पार्टी का वोट शेयर साढ़े 41 फ़ीसदी के क़रीब रहा और उसने 77 सीटें जीतीं. अगर भाजपा के प्रदर्शन से इसकी तुलना की जाए तो कहा जा सकता है राहुल गांधी की रैलियों में कम भीड़ दिखाने वाली रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर किया गया प्रचार विश्वसनीय नहीं थे.
गुजरात चुनाव में भाजपा पर पाटीदार फ़ैक्टर का साया मंडराता रहा. चुनाव परिणाम में इसका असर भी देखने को मिला. 2012 के चुनाव में भाजपा के 36 पाटीदार उम्मीदवार जीते थे. इस बार यह संख्या घटकर 28 हो गई. जहां तक रैली की भीड़ की बात है तो मेहसाणा और सूरत की रैलियां काफ़ी चर्चा में रहीं. बताया गया कि इन दोनों क्षेत्रों में हुईं हार्दिक पटेल की रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के मुक़ाबले ज़्यादा भीड़ देखने को मिली. लेकिन इसके बावजूद भाजपा मेहसाणा और सूरत दोनों में जीती. यानी वहां भीड़ फ़ैक्टर भाजपा के जनाधार में सेंध नहीं लगा पाया.
उत्तर भारत की राजनीति में मायावती ऐसी नेता हैं जिनकी रैली शायद ही कभी फ़्लॉप जाती हो. वे अपनी राजनीति के केंद्र उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में जहां भी रैलियां करती हैं वहां लोग उन्हें बड़ी संख्या में सुनने आते हैं. जानकारों के मुताबिक अगर रैलियों की भीड़ नेता के मज़बूत या कमज़ोर जनाधार का विश्वसनीय संकेत होती तो मायावती की बहुजन समाज पार्टी की हालत कभी ख़राब न होती. 2007 के चुनाव में बसपा ने क़रीब साढ़े 30 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 206 सीटों के साथ राज्य की सत्ता में वापसी की थी. 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को क़रीब चार प्रतिशत वोटों का घाटा हुआ और उसे 26 प्रतिशत वोट मिले. लेकिन इन 3-4 प्रतिशत वोटों का नुक़सान पार्टी ने 126 सीटें खोकर चुकाया और वह सीधे 80 सीटों पर आ गई. इस साल हुए विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर प्रतिशत 22.23 रहा और उसे मात्र 19 सीटें ही मिलीं. यहां यह बात गौर करने वाली है कि इन 10 सालों में मायावती की रैलियों की भीड़ में कोई कमी नहीं आई.
एक वर्ग का मानना है कि बीते डेढ़ दशक के दौरान राजनीति के साथ-साथ रैलियों की भीड़ की प्रकृति में भी बदलाव आया है. अक्सर कहा जाता है कि इस भीड़ में कई लोग तो पार्टी के ही कार्यकर्ता होते हैं. वे अपने साथ परिवार और समाज के अन्य लोगों को भी लेकर आते हैं. इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं. बाक़ी लोगों को पैसे देकर बुलाया जाता है. 500-500 रुपये देकर ग़रीबों को गाड़ियों में भरकर रैली वाली जगह पर लाया जाता है. मीडिया ख़ुद ऐसी रिपोर्टें दिखाता रहा है जिनमें बताया गया कि कैसे किसी पार्टी की फ़लां रैली में लोगों को बसों-ट्रैक्टरों में भरकर लाया गया.
लेकिन इसी से सवाल उठता है कि जब मीडिया राजनीतिक दलों और बड़े नेताओं की रैलियों की ‘सच्चाई’ जानता है तो चुनाव के दौरान उनमें आई भीड़ को किसी पार्टी या नेता के जनाधार के विश्वसनीय पैमाने के रूप में क्यों पेश करता है.
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