बड़ा अजीब है. कोयला और कॉमनवेल्थ खेल से जुड़े घोटालों के साथ-साथ जिस 2जी घोटाले के खिलाफ आंदोलन चलाकर भाजपा विपक्ष से सत्ता पक्ष बन गई, उस कथित घोटाले को किसी मुकाम तक पहुंचाने के लिए अदालत में सामान्य प्रक्रियाओं तक का पालन नहीं किया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि उस मामले से जुड़े सारे आरोपित बरी हो गये जिसे पौने दो लाख करोड़ रुपयों का घोटाला बताया गया था.

इस मामले में फैसला देने वाली विशेष अदालत के जज ओपी सैनी ने अपने फैसले में लिखा है कि शुरुआत में तो इस मामले में खासा उत्साह दिखाया गया लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा अभियोजन पक्ष इस हद तक ‘सावधान और रक्षात्मक’ हो गया कि यह पता लगाना तक मुश्किल हो गया कि वह साबित क्या करना चाहता है.

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक अपने फैसले में कोर्ट का कहना है कि इस मुकदमे के अंत तक पहुंचते-पहुंचते अभियोजन की गुणवत्ता पूरी तरह से बिगड़ गई थी और वह दिशाहीन हो गया था.

अपने फैसले में विशेष जज का यह भी कहना है कि मुकदमे के आखिरी चरणों में तो सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी और उसके वकील अदालत में पेश किये जाने वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तक को तैयार नहीं थे. अदालत के मुताबिक ‘जब वरिष्ठ सरकारी वकील से इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि दस्तावेजों पर विशेष सरकारी वकील ही हस्ताक्षर करेंगे. जबकि विशेष अभियोजक का कहना था कि उन पर सीबीआई के लोग दस्तखत करेंगे. अंत में अदालत में जो याचिका या जवाब दाखिल किये गये उन पर सिर्फ इंस्पेक्टर के ही हस्ताक्षर थे.’ जज ओपी सैनी के मुताबिक इसका मतलब यह था कि जांचकर्ताओं और अभियोजकों में से कोई भी इस बात की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था कि अदालत में क्या कहा जा रहा है और क्या पेश किया जा रहा है.

विशेष अदालत के फैसले के अनुसार जब इस मामले में अंतिम बहस हुई तो विशेष सरकारी वकील ने महीनों तक अपनी बहस को लिखित के बजाय सिर्फ मौखिक तौर पर ही अदालत के सामने रखा. अपनी अंतिम बहस को खत्म करने के बाद भी उन्होंने यह कहकर लिखित में इसे नहीं दिया कि बचाव पक्ष के ऐसा करने के बाद ही वे भी ऐसा करेंगे.

जज ओपी सैनी के मुताबिक यह इसलिए सही नहीं था क्योंकि इसके बिना बचाव पक्ष के लिए खुद पर लगाये गये आरोपों को स्पष्ट तरीके से समझना और उनका जवाब दे पाना संभव नहीं था.

अंतिम बहस के दौरान बचाव पक्ष ने लिखित और मौखिक रूप से अपने बचाव के तर्कों को अदालत के सामने रखा. इसके बाद ही अभियोजन पक्ष ने भी जवाबी बहस के दौरान अपने तर्कों को लिखित में अदालत के सामने पेश किया. इस वजह से ऐसी स्थिति पैदा हो गई अदालत को बचाव पक्ष को दो अतिरिक्त दिन देने पड़ गये.

लेकिन अभियोजन पक्ष ने जिन लिखित तर्कों को अदालत के सामने रखा था उन पर भी किसी के हस्ताक्षर नहीं थे. ऐसा करने के पीछे सबके अपने-अपने तर्क थे: विशेष सरकारी वकील का कहना था कि वे इसलिए ऐसा नहीं कर रहे हैं क्योंकि बचाव पक्ष के कुछ वकीलों ने ऐसा नहीं किया है. वरिष्ठ सरकारी वकील और सीबीआई इंस्पेक्टर का कहना था कि बहस से जुड़े दस्तावेज उनके दफ्तरों से नहीं बल्कि विशेष अभियोजक के दफ्तर से आ रहे हैं इसलिए वे ऐसा नहीं कर सकते. अदालत के मुताबिक इससे यह साफ होता है कि इस मामले में अभियोजन पक्ष से जुड़े सभी घटकों के बीच कोई तालमेल नहीं था और वे सभी अलग-अलग दिशाओं में चल रहे थे.

न केवल सरकारी वकील और सीबीआई बल्कि सरकारी विभागों से जुड़े गवाहों ने भी इस मामले को कमजोर करने में पूरी भूमिका निभाई. दूसरे गवाहों की तो बात ही क्या, रिपोर्ट के मुताबिक दूरसंचार विभाग से जुड़े गवाह ही इतने डरे हुए थे कि उन्होंने अपनी गवाही के दौरान आधिकारिक दस्तावेजों के खिलाफ जाकर गवाहियां दीं.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जिस मामले की गंभीरता चुनावी और बहस के बाकी मैदानों पर सभी ने समझी उसे मुकाम पर पहुंचाने की गंभीरता शायद किसी में नहीं थी. या फिर उसे किसी मुकाम पर पहुंचाने की शायद अब जरूरत ही खत्म हो चुकी थी.