पिछले दिनों भारतीय ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन टेस्ट क्रिकेट में सबसे तेज 300 विकेट लेकर खासे चर्चा में रहे थे. दुनिया के सबसे कामयाब स्पिन गेंदबाजों में शुमार मुथैया मुरलीधरन और शेन वार्न ने भी उनकी जमकर तारीफ की थी. मुरली ने तो उन्हें वर्तमान में दुनिया का सबसे महान स्पिनर भी करार दिया था.

लेकिन, पिछले कुछ समय से ही तमिलनाडु से आने वाला यह गेंदबाज एक और कारण से भी चर्चा में है. यह है अश्विन के लगातार वनडे और टी20 टीम में जगह न बना पाने को लेकर. जनवरी में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली जाने वाली वनडे सीरीज बीते पांच महीनों में ऐसी पांचवीं सीरीज होगी जिसमें आर अश्विन को टीम में जगह नहीं दी गई है. ऐसे में क्रिकेट प्रशंसकों के बीच एक सवाल लगभग आम हो चुका है कि क्या आर अश्विन का वनडे और टी20 करियर अब लगभग खत्म हो चुका है.

अधिकांश क्रिकेट विश्लेषक भी इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देते नजर आते हैं. इन लोगों की मानें तो किसी खिलाड़ी के टीम से बाहर होने के पीछे दो प्रमुख कारण होते हैं - एक, वह लगातार अच्छा प्रदर्शन न कर पा रहा हो या फिर तब जब टीम को उससे बेहतर खिलाड़ी मिल गया हो. इन लोगों के मुताबिक अश्विन के मामले में ये दोनों ही कारण सही नजर आते हैं.

अश्विन का वनडे में प्रदर्शन

आईपीएल में शानदार प्रदर्शन के बाद साल 2010 में आर अश्विन का राष्ट्रीय में चयन हुआ था. इसके बाद उन्होंने शुरुआती दस महीनों में नौ वनडे मैच खेले. 23.22 के औसत और 4.86 के इकॉनमी से उन्हें 18 विकेट मिले. इसी दौरान विश्वकप 2011 का वह क्वार्टर फाइनल मैच कइयों को याद होगा जिसमें अश्विन ने रिकी पॉन्टिंग और शेन वाटसन के विकेट लेकर भारतीय टीम की जीत का रास्ता साफ़ किया था.

साल 2011 से लेकर 2013 तक आर अश्विन ने अपने प्रदर्शन को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया. इन दो सालों में उन्होंने 33.95 के औसत से 56 विकेट हासिल किए. इस दौरान उनका इकॉनमी रेट घटकर 4.76 तक आ गया और वे एक बड़ी छलांग लगाकर आईसीसी की वनडे रैंकिंग में आठवें पायदान पर आ गए. यह एक ऐसा दौर था जब अश्विन वनडे और टी20 में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का प्रमुख हथियार हुआ करते थे. इस सुनहरे दौर में ही उन्होंने भारत को 2013 में इंग्लैंड में हुई चैम्पियंस ट्रॉफी जितवाने में भी अहम भूमिका निभाई थी.

इसके अगले दो साल भी आर अश्विन का यह शानदार सफर जारी रहा. 2013 से लेकर 2015 तक उन्होंने 33.52 के औसत और 4.93 के इकॉनमी रेट से 59 विकेट झटके. 2015 विश्वकप में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा था. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हुआ सेमीफाइनल मुकाबला जिसमें सभी गेंदबाजों की जमकर धुनाई हुई थी उसमें भी अश्विन ने 10 ओवर में 42 रन देकर एक विकेट लिया था जोकि कप्तान धोनी के लिए काफी राहत भरा स्पैल रहा था.

अश्विन के वनडे और टी20 करियर के बुरे दौर की शुरुआत 2015 के विश्वकप के बाद से होनी शुरू हुई. हालांकि, इसके बाद उनके प्रदर्शन में गिरावट को देखते हुए उन्हें मौके भी काफी कम दिए गए. विश्वकप और इस साल जुलाई में वेस्टइंडीज दौरे तक भारत ने 38 वनडे मैच खेले लेकिन अश्विन को केवल 15 मैच ही खिलाए गए. इन मैचों में उन्होंने 40.58 के औसत से केवल 17 विकेट लिए. इस दौरान उनका इकॉनमी भी बढ़कर 5.36 प्रति ओवर पहुंच गया. इसमें इस साल हुई चैम्पियंस ट्रॉफी के वे तीन मुकाबले भी शामिल हैं जिनमें 5.75 के इकॉनमी के साथ वे केवल एक विकेट ही हासिल कर सके थे.

हालांकि, इस दौरान भी एक या दो मैचों में आर अश्विन ने निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन, माना जाता है कि टीम मैंनेजमेंट ने उनके प्रदर्शन में निरंतरता की कमी के चलते उन्हें वेस्टइंडीज दौरे के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया.

यजुवेंद्र चहल, कुलदीप यादव और अक्षर पटेल का बेहतरीन प्रदर्शन

कई जानकार अश्विन को वनडे में मौका न मिलने का एक और बड़ा कारण टीम में उनसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले स्पिनरों का होना भी मानते हैं. इनके मुताबिक अगर दो साल पहले की बात करें तो अश्विन के बिना भारतीय टीम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. लेकिन, दो साल में सब कुछ बदल गया, आज यजुवेंद्र चहल, कुलदीप यादव और अक्षर पटेल के बेहतर प्रदर्शन के चलते किसी को भी अश्विन की याद नहीं सताती.

अगर इन तीनों के आंकड़ों की अश्विन से तुलना करें तो जहां अश्विन ने अपने पिछले 15 मैचों में 40.58 के औसत और 5.36 के इकॉनमी से 17 विकेट लिए हैं वहीं, चहल ने अब तक 17 मैचों में 25.07 के औसत से 27 विकेट और कुलदीप ने 14 मैचों में महज 24.77 के औसत से 22 विकेट झटके हैं. अक्षर का प्रदर्शन भी अश्विन के मुकाबले बेहतर है. वे अब तक 38 मैचों में 31.31 से औसत से 45 विकेट ले चुके हैं. इन तीनों की एक ख़ास बात यह भी है कि इनका इकॉनमी पांच रन प्रति ओवर से कम ही रहा है.

कई जानकार अश्विन और तीनों के प्रदर्शन में बड़े अंतर का कारण इनकी गेंदबाजी रणनीति को भी मानते हैं. इन लोगों के मुताबिक पिछले करीब साल भर से देखने को मिला है कि अश्विन पर जहां चौके-छक्के लगना शुरू होते हैं वे दबाव में आ जाते हैं और आक्रामकता भूलकर डिफेंसिव हो जाते हैं. इसके बाद वे विकेट लेने के बारे में नहीं सोचते बल्कि रन बचाने के तरीके अपनाने लगते हैं. चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल मुकाबले में यही देखने को मिला था और इस हाई वोल्टेज मैच में उन्होंने 10 ओवर में 70 रन दे डाले थे.

इससे अलग आईपीएल से सामने आए यजुवेंद्र चहल, कुलदीप यादव और अक्षर पटेल एक अलग रणनीति से गेंदबाजी करते हैं. ये तीनों दबाव में नहीं आते और हमेशा ही विकेट लेने के उद्देश्य से गेंदबाजी करते हैं जिसका इन्हें लाभ मिलता है. बीच के ओवरों में ये कप्तान को विकेट निकालकर भी दे रहे हैं.

अश्विन के प्रदर्शन में गिरावट का कारण

वरिष्ठ खेल पत्रकार विमल कुमार कहते हैं कि अश्विन आज उसी फ़ॉर्मेट में फेल हो रहे हैं जिसने उन्हें राष्ट्रीय टीम तक पहुंचाया था. वनडे में चयन के करीब डेढ़ साल बाद नवंबर 2011 में अश्विन पहली बार भारतीय टेस्ट टीम हिस्सा बने थे. विमल कुमार टेस्ट क्रिकेट को अश्विन के टी20 और वनडे के प्रदर्शन में गिरावट का एक प्रमुख कारण मानते हैं. उनके मुताबिक अश्विन जब टेस्ट टीम में आए तो उस समय टीम को एक नियमित स्पिनर की बहुत जरूरत थी जो उस जगह को भर सके जो अनिल कुंबले के जाने से खाली हुई थी. ऐसे में अश्विन पर भी दबाव बढ़ा. साथ ही टेस्ट में उनके प्रदर्शन को देखने के बाद कप्तान और कोच भी यह चाहने लगे कि वे टेस्ट क्रिकेट पर अधिक ध्यान दें. कई अन्य जानकार भी अश्विन के वनडे और टी20 प्रदर्शन में आई गिरावट के पीछे की मुख्य वजह यही मानते हैं.

पूर्व भारतीय खिलाड़ी आकाश चोपड़ा की मानें तो अश्विन अभी भी वनडे के अहम खिलाड़ी हैं. लेकिन, आकाश कुछ जरूरी बदलाव करने पर भी जोर देते हैं. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि अगला विश्वकप इंग्लैंड में होना है और 2017 की चैम्पियंस ट्रॉफी को अगर छोड़ दें तो इंग्लैंड में अश्विन का प्रदर्शन खराब नहीं कहा जा सकता. ऐसे में अगले विश्वकप के दौरान टीम को उनकी जरूरत पड़ सकती है.

आकाश आगे कहते हैं, ‘चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में मैं और सभी साथी कमेंट्रेटर उनकी गेंदबाजी लाइन को देखकर आश्चर्य चकित थे. मुझे लगता है यह तकनीक से ज्यादा उनके दिमाग से जुड़ा मामला है और उन्हें अपनी सोच बदलने की जरूरत है. अश्विन को समझना होगा कि उन्हें केवल विकेट लेने के लिए ही टीम में रखा गया है और हर परिस्थिति में उन्हें विकेट निकालने के बारे में ही सोचना पड़ेगा.’ आकाश चोपड़ा यह भी जोड़ते हैं कि कप्तान को भी उन्हें इस मुश्किल दौर से निकलने में सहयोग करना होगा और इसके लिए एक या दो मैचों में उनके कमजोर प्रदर्शन को नजरअंदाज करना भी जरूरी है.

हालांकि, इस मामले में सबसे अहम यह है कि लाख आलोचनाओं के बाद भी अश्विन ने हार नहीं मानी है. वे आकाश चोपड़ा की तरह खुद को चूका हुआ नहीं मानते. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ‘मैं बिल्कुल निराश नहीं हूं. एक दिन यह मौका मेरे दरवाजे पर खुद दस्तक देगा, क्योंकि मैंने ज्यादा गलतियां नहीं की हैं. मैं दोबारा अपनी लय पाने की भरपूर कोशिश कर रहा हूं.’