सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) जैसी जांच एजेंसियां 2जी मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा सहित सभी 18 आरोपितों को बरी करने के आदेश के ख़िलाफ़ जनवरी के दूसरे सप्ताह में अपील कर सकती हैं. सीबीआई की विशेष अदालत के जज ओपी सैनी ने इसी गुरुवार को एक साथ 2जी घोटाले से जुड़े तीन मामलों में फ़ैसला सुनाया था. इनमें से दो मामले सीबीआई और एक ईडी ने दायर किया था.

द इकॉनमिक टाइम्स के मुताबिक दोनों ही एजेंसियां अब विशेष अदालत के 2,300 पेज के भारी-भरकम फ़ैसले का अध्ययन कर रही हैं. इसमें से उन पहलुओं का खास तौर पर अध्ययन किया जा रहा है जिनके आधार पर फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है. बताया जाता है कि फ़ैसले में से ऐसे कुछ बिंदु ढूंढ भी लिए गए हैं. जैसे कि विशेष अदालत ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार के कार्यकाल में लाई गई ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति पर तो ध्यान दिया. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री को इस सिलसिले में गुमराह कर भ्रष्टाचार किए जाने के पहलू पर ग़ौर नहीं किया. काले धन को सफेद करने से जुड़े पहलू पर भी विचार नहीं किया.

जबकि एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो, ‘चलन में रही किसी नीति पर टिप्पणी करना निचली अदालत के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था. और इससे भी बड़ी बात तो वे बदलाव थे जो तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा ने किए थे. उन्होंने ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की ‘आने से पहले ही पाओ’ की नीति में बदल दिया.’ नाम न छापने की शर्त पर वे कहते हैं, ‘नीति में बदलाव जानबूझकर किए गए. ताकि ‘सुविधा शुल्क देने वालों’ को लाभ पहुंचाया जा सके. ग़ैरगंभीर किस्म के पक्षकारों (दूरसंचार कंपनियां) को नियमों में बदलाव की पूर्व जानकारी थी. इससे उन्हें गंभीर पक्षकारों की तुलना में लाभ मिला. इन बदलावों के बाद जो कंपनियां स्पेक्ट्रम नीलामी प्रक्रिया में हिस्सा लेने के पात्र नहीं थीं वे आवंटन के योग्य हो गईं. ऐसे ही कुछ और बिंदु हैं जिनके आधार पर विशेष अदालत के फ़ैसले को चुनौती दिए जाने का मजबूत आधार बनता है.’