क्या राहुल गांधी आखिरकार एक नेता के तौर पर स्वीकार किए जाने लगे हैं? गुजरात चुनाव नतीजों के बाद यह प्रश्न कई कोनों से उठने लगा है. अचानक माना जाने लगा है कि भारत को आखिरकार एक मजबूत विपक्षी नेता मिल गया है. आज से दो महीने पहले तक राहुल गांधी की राजनीतिक बुद्धि और क्षमता पर संदेह करने वाले भी अब उन्हें गंभीरता से लेने को बाध्य दिखलाई पड़ रहे हैं.

क्या यह परिवर्तन राहुल गांधी का है या उन्हें देखे जाने के तरीके का है? खुद राहुल ने एक गुजराती टेलीविज़न चैनल को कहा कि वे तो वही हैं जो पहले थे, उनकी छवि पर जो झूठ का अंबार लगा दिया गया था, वह अब धीरे-धीरे छंटने लगा है और वे जैसे थे वैसे दिखलाई पड़ने लगे हैं.

बात इतनी सरल नहीं है. उनमें स्थिरता की कमी की शिकायत सिर्फ मीडिया ही नहीं कर रहा था. एक राजनीतिक नेता में, खासकर जब वह विपक्ष की भूमिका में हो, जो स्थिरता दिखनी चाहिए, वह राहुल में नहीं थी. स्वभाव में एक ऐसी आक्रामकता भी दिखती थी जो नाटकीय तो मालूम पड़ती थी लेकिन विश्वसनीय नहीं थी. ऐसा लगता था कि राजनीतिक तौर-तरीकों से अपरिचित कोई नेता दूसरों की सलाह पर अपने मुद्दे और मुद्राएं चुन रहा हो. एक तरह की हड़बड़ी उनके बोलने में और काम करने के तरीके में दिखलाई पड़ती थी.

ऐसे में आसानी से यह प्रचारित किया जा सका कि राहुल को न तो गांव का कुछ पता है न भारतीय यथार्थ का ही उन्हें कोई अंदाज है. वे आखिरकार एक विदेशी मां के बेटे हैं और सुविधाप्राप्त राजनीतिक परिवार के वारिस भर हैं. उनमें खुद कोई पात्रता नहीं है.

इस छवि का सामना राहुल को करना था और तभी वे एक थकी हुई, सत्ता की आदी रही पार्टी को नेतृत्व भी दे सकते थे. यह ऐसी कांग्रेस थी जो भूल चुकी थी कि वह सत्ता के लिए नहीं, भारतीय जनता के वाजिब अधिकारों के संघर्ष के लिए गठित की गई थी. वह यह भी भूल गई कि उसका जिम्मा भारत के साझापन की हिफाजत का था.

अपने आखिरी दिनों में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता गांधी ने बड़ी तकलीफ और गुस्से से कांग्रेस के लोगों से पूछा था कि जब लोग मारे जा रहे थे तो कांग्रेसी कहां थे. उन्होंने पूछा कि जो वे उनसे शिकायत करने आए हैं, इसी से पता चलता है कि उन्होंने हिंसा में कोई हस्तक्षेप नहीं किया. गांधी ने पूछा कि मेरे पास आने के लिए आप जीवित कैसे हैं? यहां तक कि उन्होंने यह आरोप लगाया कि सांप्रदायिक हिंसा में उनमें से भी कई लोग शामिल थे.

गांधी की यह फटकार आज भी गूंज रही है. आजादी के बाद कई ऐसे मौके आए जब अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में हस्तक्षेप की ज़रूरत थी लेकिन खुद को धर्मनिरपेक्षता का अलंबरदार कहने वाली कांग्रेस ने जुबानी जमाखर्च से अधिक कुछ नहीं किया. नेहरू की गांधीवादी दृढ़ता बाद के कांग्रेसी नेताओं में नहीं दिखलाई पड़ी. खुद नेहरू की बेटी ने एक हिंदूवादी मुहावरा ओढ़ने की कोशिश की और धर्मनिरपेक्षता का एक मूल्य से अधिक एक अवसरवादी या सुविधाजनक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया. उनके जाने के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में यह लड़खड़ाहट और बढ़ गई. शाहबानो और बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर शिलान्यास करवाने तक कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष साख खो दी.

कांग्रेस को यह भी याद न रहा कि गांधी और नेहरू के कारण धर्मनिरपेक्षता और कांग्रेस लगभग पर्यायवाची हो गए थे. इसलिए कांग्रेस के अवसरवाद का असर इस अवधारणा के सार्वजनिक अर्थ के लिए प्रतिकूल ही होना था.

कांग्रेस गांधी का दिया जंतर भी कहीं रखकर भूल गई. उनका कहना था कि प्रत्येक नीति की परीक्षा का सबसे अच्छा तरीका है कतार में खड़े आख़िरी शख्स की ज़िंदगी पर उसके असर को देखना. इंदिरा के आख़िरी वक्त से ही उस आर्थिक दिशा का अंदाज मिलने लगा था जिसकी ओर देश को मोड़ने का श्रेय नरसिंहाराव को दिया जाता है.

क्या राहुल गांधी इस भूली हुई विरासत की याद वापस कांग्रेस को दिला पाएंगे? उतनी ही बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे राजनीति के सार्वजनिक व्यवहार में शालीनता और सभ्यता को बहाल करना चाहेंगे और कर पाएंगे? आज जिस प्रकार की आक्रामकता परिदृश्य पर छा गई है और किसी भी तरह का लिहाज जाता रहा है, क्या राहुल उससे अलग दिखकर, उसका मुकाबला कर पाएंगे? अपने विरोधी को उसी की जुबान में जवाब देने के प्रलोभन का संवरण कर पाना कठिन अभ्यास है.

राहुल ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान कुछ संभावना दिखलाई है. उन्होंने बार-बार आक्रामकता की शरण लेने से गुरेज किया है. कई बार यह कहा है कि वे क्रोध की राजनीति का मुकाबला प्रेम की भाषा से करना चाहते हैं. यही बात उन्होंने कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालने के बाद भी कही है. लेकिन क्या यह मात्र रणनीति है? या, यह एक वैचारिक प्रतिबद्धता है?

भारतीय अर्थव्यवस्था भी एक जगह आकर अटक गई है. वह जिस रास्ते पर बढ़ रही है उस पर किसी भी पार्टी की सरकार हो, देश के युवाओं को भागीदारी का मौका मिलने का सवाल ही नहीं है. क्या उस दिशा को बदलने की वकालत राहुल कर पाएंगे जो खुद उनके दल की दिखलाई हुई है? इसका कुछ संकेत उन्होंने दिया है यह कहकर कि उनके दल के पास जो खाका था वह अब बेकार हो चुका है और आज की सरकार की विफलता का कारण यही है कि वह उसी अप्रासंगिक हो चुके खाके के दायरे में ही काम कर रही है.

तो क्या वे छोटे, मंझोले उद्यमों या कृषि को अपना आधार बनाने की दिशा में कुछ कर पाएंगे? या, जैसा पिछली बार देखा गया था, जनादेश की चोरी बड़ी पूंजी ने कर ली वही इस बार भी दुहराया जाएगा? क्या जनादेश का उपयोग बड़ी पूंजी को सत्ता का संरक्षण देने में किया जाएगा?

राहुल गांधी के समक्ष ये चुनौतियां हैं. उनकी परीक्षा का दौर अब शुरू हुआ है जब कांग्रेस उत्सव मनाने की हड़बडी में है. गुजरात के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को भारतीय राजनीति में फिर से पांव रखने का मौक़ा दिया है. वह अभी प्रासंगिक और काम की बनी हुई है, इतना भर कहा है. क्या राहुल गांधी उसमें नई अंतर्वस्तु भर पाएंगे? और इस सबसे ऊपर यह है कि क्या वे भारत के भारत से संवाद में उसकी मदद कर पाएंगे?