इस पुस्तक के व्यंग्य ‘भ्रष्टाचार के सैनिक’ का एक अंश :

‘वे भ्रष्टाचार के सैनिक थे, हलवाई के समोसे नहीं. वे सैनिक नहीं थे, पर सैनिक की वेशभूषा में थे...वे तीनों एक-दूसरे से पीठ किए खड़े थे. योद्धा तो आमने-सामने होते हैं, न ही पीठ दिखाते हैं और न देखते हैं. पर ये हमारे योद्धा थे.

मैंने पहले से पूछा - आप कौन हैं?
तीनों ने एक साथ उत्तर दिया - मैं योद्धा हूं.
मैंने दूसरे से पूछा - तुम्हारा शत्रु कौन है?
तीनों ने एक साथ उत्तर दिया - मेरा शत्रु भ्रष्टाचार.
मैंने तीसरे से पूछा - भ्रष्टाचारी कौन है?
तीनों पलटे. एक-दूसरे की ओर लकड़ी की तलवार तानी और समूहगान गाया - ये है भ्रष्टाचारी.
तीनों की आखों में खून खौल रहा था. तीनों बराबर भारत माता की जय बोल रहे थे. इतनी देर में एक किसान आया और तीनों से बोला - मैं गरीबी से मर रहा हूं. मेरी आत्मा की हत्या हो चुकी है. मेरी सहायता करो.

तीनों बोले - तुम हमें डिस्टर्ब मत करो, हम भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी जंग लड़ रहे हैं. इस लड़ाई में देश के लिए तुम जान दो, हम तुम्हें मुआवजा देंगे. यह कहकर एक टुकड़ा उछलकर वहां से किसान के पास जा गिरा, जिसे पास खड़े कुत्ते ने सूंघा और उबकाई करता हुआ चला गया. किसान ने अपनी आत्मा की हत्या कर ली. तीनों ने तालियां बजाईं.’


व्यंग्य संग्रह : भ्रष्टाचार के सैनिक

व्यंग्यकार : प्रेम जनमेजय

प्रकाशक : वाणी

कीमत : 195 रुपये


साहित्य की सभी विधाएं पाठकों के मन में कोई न कोई भाव जगाती ही हैं, लेकिन व्यंग्य इकलौती ऐसी विधा है जो एक साथ दोहरे मनोभावों को जगाती है. कहा जा सकता है कि व्यंग्य दोधारी तलवार का काम करता है. यह हंसाता-गुदगुदाता है, साथ ही समाज की हर एक विद्रूपता के प्रति मन में घृणा भी पैदा करता है. हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की सूची बहुत लंबी तो नहीं है, लेकिन इसमें जो नाम हैं, वे सदियों तक याद किए जाएंगे. हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल की समृद्ध व्यंग्य परंपरा में नई पीढ़ी के जो व्यंग्यकार शामिल हैं, उनमें एक नाम प्रेम जनमेजय का भी है. यह व्यंग्य संग्रह उनके व्यंग्य के वारों की गहराई से हमें बखूबी परिचित कराता है.

प्रेम जनमेजय के व्यंग्यों की कई खासियतों में से एक यह है कि उनकी भाषा बेहद सहज-सरल है, या कहें कि पढ़ने में साधारण, लेकिन घाव करे गंभीर. वे गुदगुदाते भी हैं और चोट भी करते हैं. अपने आस-पास की बहुत सी मामूली बातों ने उनको छुआ है, और फिर उन्हीं को उन्होंने अपने खास चुटीले और पैने अंदाज में पेश किया है. एक व्यंग्य में स्थिति है जहां भयंकर गर्मी में पानी ढ़ूंढ़ते गरीब बच्चों को मुर्दे की लाश उठाने के बाद फेंकी गई बर्फ ही बड़ा सहारा दिखती है. इस पर जनमेजय लिखते हैं -

‘प्रतीक्षारत लोगों को मरने वाले के मरने का दुख कम हो रहा था और लड़की के अब तक न आने का कष्ट बढ़ रहा था. उदासी बेचैनी में बढ़ रही थी...बतरसियों को चुप्पी खल रही थी...इस बीच प्रतीक्षा खत्म हो गई. बेटी आ गयी थी. शव को नहलाने के लिए उसे बर्फ की सिल्लियों में से निकाला गया. बर्फ की सिल्लियों को पास की सूखी नाली में लुढ़का दिया गया था. छोटे लड़के ने जीभ से एक बार फिर होंठों को तर किया था...वह नाली में फेंकी गयी बर्फ का एक टुकड़ा उठाकर चूस रहा था...

बड़े ने उसे डांटा - फेंक इसे, ये मुर्दे की बर्फ है.
छोटे ने चूसते हुए कहा - बर्फ जूठी थोड़े होती है.’

व्यंग्यकार यदि अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए लेखन करता है तो उन व्यंग्यों की धार बहुत तेज हो जाती है. पूरे व्यंग्य संग्रह में प्रेम जनमेजय की सामाजिक प्रतिबद्धता साफ झलकती है. यही कारण है कि उनके व्यंग्य सिर्फ गुदगुदाते नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर कहीं न कहीं कचोट पैदा करना भी उनका मकसद दिखता है और इसमें वे पूरी तरह सफल होते हैं. आज के समय में मुंह खोलने की आजादी को लेखक ने बहुत ही अदभुत तरीके से दांत के डॉक्टर से जोड़ा है. एक बानगी -

‘मैं अपने दांतों के डॉक्टर आहूजा के पास गया. डॉक्टर ने कहा - मुंह खोलो. दांतों का डॉक्टर ही है, जिसके सामने मैं मुंह खोल सकता हूं. दांतों का डॉक्टर ही है जो मुंह खोलने की पूरी आजादी देता है, कहता है - और मुंह खोलो...सब जानते हैं कि हमारे देश में प्रजातंत्र है. सब जानते हैं कि प्रजातंत्र में सभी को मुंह खोलने का अधिकार है. पर बहुत कम जानते हैं कि खुले मुंहों को बन्द करने का सर्वाधिकार कुछ लोगों के पास सुरक्षित है. आप किसी भी चैनल में बहस सुन लें, अखबार पढ़ लें, पता चल जायेगा कि आप चारों ओर से मुंह बन्द करने वालों से घिरे हुए हैं. प्रजातंत्र में आप मुंह खोलने को स्वतन्त्र हैं तो आपका मुंह बंद करने वाले भी स्वतन्त्र हैं.’

बदलते समय ने व्यक्ति, परिवार, समाज, त्यौहार, खान-पान, भाषा, संस्कृति या फिर देश; हर एक चीज पर चाहे-अनचाहे अपनी छाप छोड़ी है. बदलाव की इस प्रक्रिया में परस्पर संवाद भी बहुत कम हुआ है. ऐसे में व्यंग्य न सिर्फ एक संवाद कायम करने की कोशिश करता है, बल्कि परिवेश में फैल रहे अवसाद, मूल्यहीनता, एकाकीपन आदि स्थितियों से लड़ने का हौसला भी देता है. लेखक ने बदलावों की इस प्रक्रिया को व्यक्ति, त्यौहार और देश के संदर्भ में एक साथ बड़े ही महीन तरीके से परखा और लिखा है. जैसे -

‘बूढ़े व्यक्ति को किसी को भी आशीर्वाद देने का अधिकार होता है. जैसे पुलिसवाले को आप रिश्वत देते हैं, वह आपको नहीं देता, नेता को आप वोट देते हैं पर वो आपको कुछ नहीं देता, कुछ-कुछ वैसे ही आयु में बड़े द्वारा ही आशीर्वाद देने की भारतीय परम्परा है...मैं बूढ़ा हो रहा हूं, पर मेरा देश जवान हो रहा है. बूढ़ा आदमी गुलाल का एक टीका लगाकर होली की औपचारिकता निभा लेता है और जवान जब तक किसी पर कीचड़ न उछाले, उसे होली का मजा नहीं आता. इन दिनों खूब कीचड़ उछाला जा रहा है. कीचड़ की डिमांड बढ़ गयी है. समाचार चैलनों की टीआरपी बढ़ गयी है. बेचारे टेसू के फूल मुझ बूढ़े-से किसी कोने में पड़े, कबीर की तरह उदास हैं.’

प्रेम जनमेजय के इस व्यंग्य संग्रह की एक बड़ी खासियत यह है कि यहां स्वस्थ हास्य है. हास्य के नाम पर द्विअर्थी संवाद या फिर महिलाओं और स्त्री-पुरुष संबंधों को केन्द्र में रखकर हंसाने की भौंडी और फूहड़ कोशिश यहां कतई नहीं की गयी है. हंसने वाले तो अश्लील और नॉनवेज जोक्स पर भी बुक्का फाड़कर हंस ही लेते हैं, लेकिन संवेदनशील लोग हंसना चाहते हुए भी हर एक बात पर हंस नहीं पाते. संवेदनशील पाठक इस संग्रह को पढ़कर वह खीज कतई महसूस नहीं करते जो अक्सर ही लॉफ्टर शो या फिर तथाकथित कॉमेडी फिल्मों को देखकर होती है. यह व्यंग्य संग्रह उन संवेदनशील पाठकों के लिए बहुत अच्छा तोहफा है जो हंसना तो चाहते हैं, लेकिन फूहड़ता, अश्लीलता या फिर द्विअर्थी भौंडी बातों पर नहीं हंस पाते.