गुजरात में फिर वही सरकार बन गई है जिसका अंदाज़ा था. विजय रुपाणी मुख्यमंत्री बने हैं और नितिन पटेल उपमुख्यमंत्री. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से लेकर पुरुषोत्तम रुपाला तक का नाम चला था, लेकिन ये सारे नाम हवा-हवाई साबित हुए.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरात को लेकर भाजपा में अब शांति का माहौल है. जानकारों की मानें तो भाजपा अगले कुछ महीने गुजरात में एक भी चुनाव नहीं लड़ना चाहती. उसे लगता है कि ऐसा करना जोखिम का काम है. इसलिए उसने दिल्ली से किसी को मुख्यमंत्री बनाकर वहां नहीं भेजा. गुजरात में विधान परिषद नहीं है. इसलिए वहां उत्तर प्रदेश जैसी सहूलियत भी नहीं है जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य बिना चुनाव के ही सदन के सदस्य चुन लिए गए.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने गृह प्रदेश गुजरात के नेताओं से बेहद नाराज़ हैं. वे वहां के किसी भी नेता से ज्यादा बात नहीं कर रहे. गांधीनगर में विधायक दल की बैठक में भी माहौल बेहद तनावपूर्ण ही था. मोदी का सख्त संदेश वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नए विधायकों को दिया और मेहनत से काम करने की सलाह दी.

तीन साल पहले नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव लड़ा था और गुजरात की सभी 26 सीटें भाजपा ने जीती थीं. 2014 के वोटों के हिसाब से इस बार भाजपा को 161 विधानसभा सीटें मिलनी चाहिए थीं. लेकिन 2017 में ये आंकड़ा 99 पर जाकर ठहर गया. 2017 में मिले वोटों के हिसाब से अनुमान लगाएं तो अगले आम चुनाव में गुजरात की 26 में से 13 लोकसभा सीटें भाजपा हार सकती है. अपने ही राज्य में ऐसी हालत प्रधानमंत्री के लिए चेतावनी है.

चुनाव शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात गौरव महोत्सव में बड़े विश्वास के साथ कहा था कि गुजरात में 2019 की नहीं 2024 की तैयारी करनी चाहिए. लेकिन अब वहां 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना मुश्किल दिख रहा है. विजय रुपाणी और नितिन पटेल अमित शाह के शुक्रगुजार होंगे कि उन्हें उनकी कुर्सी वापस मिल गई है. लेकिन कहा जा रहा है कि इस बार इन दोनों को ये कुर्सी पांच साल के लिए नहीं बल्कि दो साल से भी कम समय के लिए मिली है. 2019 का चुनाव विजय रुपाणी, नितिन पटेल के साथ-साथ अमित शाह का भी भविष्य तय कर सकता है.

गांधीनगर में विधायक दल की बैठक में मौजूद रहे एक विधायक बताते हैं कि इस बार अमित शाह ने अपनी व्यक्तिगत गारंटी पर विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनवाया है. आनंदीबेन पटेल को हटाते वक्त जो तय हुआ था उस पर चलते हुए नितिन पटेल को भी उपमुख्यमंत्री बना दिया गया है. इन दोनों को हर हाल में 2019 का चुनाव जीतना है. अगर इसमें कोई गड़बड़ हुई तो गांधीनगर में सत्ता परिवर्तन होना भी तय है.

केंद्र सरकार में एक कद्दावर मंत्री के करीबी सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री इस बात से बेहद खफा हैं कि उन्हें गुजरात का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए इतना पसीना बहाना पड़ा और आखिर में हर तरीके के शब्दबाण चलाने पड़े. इतनी मेहनत और प्रचार के बाद भी 22 साल में भाजपा को यहां सबसे कम सीटें मिलीं और आंकड़ा 100 भी नहीं छू पाया.

विधानसभा चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिमाचल और गुजरात के सांसदों से दिल्ली में मिले थे. सुनी-सुनाई है कि हिमाचल के सांसदों से तो प्रधानमंत्री की मुलाकात अच्छे माहौल में हुई, लेकिन जब गुजरात के सांसदों से मिलने की बारी आई तो माहौल बदल गया. गुजरात के एक सांसद के मुताबिक प्रधानमंत्री का मूड उस दिन कुछ ज्यादा ही खराब था. वे साफ कह रहे थे कि उन्हें ऐसे परिणाम की उम्मीद नहीं थी. अगर गुजरात जैसे राज्य में भी पार्टी इतनी कमजोर हो जाएगी तो बाकी देश में क्या होगा.

भाजपा की खबर रखने वाले एक पत्रकार ने पिछले कुछ दिनों में भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं से बात की है. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री गुजरात के नतीजे को आखिरी चेतावनी मानकर चल रहे हैं. नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा चिंता गुजरात के गांवों में भाजपा की हार और कांग्रेस के उभार से है. उन्हें चिंता है कि अगर गुजरात के किसान भाजपा से नाराज होकर राहुल गांधी को वोट दे सकते हैं तो उत्तर प्रदेश या फिर बाकी देश के किसान भी ऐसा कर सकते हैं. इस वजह से आने वाले कुछ दिनों में अगर भाजपा में कुछ बड़े परिवर्तन देखने को मिलें तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.