बीते 11 दिसंबर को सऊदी अरब के लिबरल क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 35 साल बाद फिर से देश में सिनेमा हॉल्स को खोलने का फैसला लिया. अगले दिन जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले का स्वागत किया. इसके बाद यह बहस फिर गर्म हो गई कि क्या अब घाटी में भी सिनेमा हॉल्स को खोल दिया जाना चाहिए.

कश्मीर और सिनेमा का रिश्ता काफी गहरा है. जितना हम समझते हैं, उससे कहीं ज़्यादा गहरा. हम हिंदुस्तानियों में से बहुतों ने अब तक कश्मीर को सिनेमा के ज़रिए देखा है. कश्मीर की कली हो या रोज़ा या हैदर या फिर फितूर, सिनेमा ने हमें बताया है कि कश्मीर को फिरदौस आखिर कहते क्यों हैं.

फिर पिछले 30 सालों में कश्मीर के हालात खराब होने के बाद हमारे फिल्मकारों का कैमरा भी उस ओर कम ही गया. कश्मीर के लिए भी सिनेमा बड़े पर्दे से उतर कर टीवी स्क्रीन, फिर कंप्यूटर और मोबाइल तक सिमट गया.

आज हालात ये हैं कि 45 साल के एक लंबे अरसे के बाद पूरी तरह कश्मीर में बनी फिल्म ‘कश्मीर डेली’ जम्मू, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में तो रिलीज़ हुई, लेकिन घाटी के बाशिंदों की पहुंच से दूर रही क्योंकि वहां अब एक भी सिनेमा हॉल नहीं है. इस फिल्म का विषय कश्मीर में ड्रग्स की समस्या और बेरोज़गारी थी.

19 अगस्त 1989 को ‘अल्लाह टाइगर्स’ नाम के एक गुमनाम से चरमपंथी संगठन ने स्थानीय अखबारों के ज़रिए घाटी के सिनेमा हॉल्स और शराब की दुकानों को गैर इस्लामिक बताते हुए उन पर प्रतिबंध लगा लिया था. शुरूआत में कुछ सिनेमा हॉल्स इस प्रतिबंध के बाद भी फिल्में दिखाते रहे. लेकिन धीरे-धीरे एक के बाद एक करके वे सभी दम तोड़ते गिए.

इनमें से कई इमारतें या तो खाली पड़ी रहीं या शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में तब्दील हो गईं. कई इमारतों को सुरक्षा बलों ने डिटेंशन और इंटेरोगेशन के लिए इस्तेमाल किया. श्रीनगर के खानियार इलाके का शिराज सिनेमा उन बदनाम टॉर्चर सेंटर्स में से एक बताया जाता है.

श्रीनगर में रहने वाले 24 साल के दाऊद शाह ने वह समय नहीं देखा जब घाटी के लोग सिनेमा जाने के शौकीन हुआ करते थे. वे कहते हैं, ‘मैंने पिछले 24 साल बिना थिएटर में फिल्म देखे गुज़ार दिए. आगे भी गुज़र जाएंगे. सिनेमा हॉल का नाम सुन के मेरे दिमाग में सिर्फ टॉर्चर सेंटर से ज़िंदा या मुर्दा बाहर आए लोगों की डरावनी कहानियां आती हैं. हमें यहां सिनेमा हॉल्स नहीं चाहिए.’

कश्मीर को सिनेमा हॉल्स चाहिए या नहीं, पिछले 30 सालों में इस पर कई बार बहस उठी. यहां तक कि श्रीनगर के नीलम और ब्रॉडवे जैसे सिनेमा हॉल्स पिछले दशक में खुल कर बंद भी हुए, लेकिन कश्मीर ने एक बार जो सिनेमा जाने की अपनी आदत खोई तो उसे वापस हासिल नहीं कर सका.

वैसे भी 80 के दशक के बाद कश्मीर हमेशा के लिए बदल चुका था. 1987 में चुनाव नतीजों की हेराफेरी के बाद जब असंतुष्ट कश्मीरी युवाओं ने सरहद पार जाकर बंदूकें लाना शुरू किया तो कहते हैं कि उसके पीछे भी सिनेमा की अपनी भूमिका थी.

1985 में श्रीनगर शहर के ब्रॉडवे सिनेमा में एक अमेरिकन फिल्म प्रदर्शित हुई. इटली के लीबिया पर कब्ज़े के खिलाफ गुरिल्ला वॉर के हीरो और शहीद उमर मुख्तार पर बनी फिल्म, ‘लाइन ऑफ द डेज़र्ट’. फिल्म कश्मीर में ज़बरदस्त हिट रही. हालांकि उन दिनों भारत की कश्मीर में मौजूदगी को गैरकानूनी मानने वाले कश्मीरी भी सिर्फ अहिंसक विरोध प्रदर्शन के ही रास्ते पर थे, लेकिन इस फिल्म ने यह स्थिति बदल दी.

यासीन मलिक 1987 के बाद सरहद पार करने वाले सबसे पहले युवाओं में से थे जिन्होंने आगे चलकर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट बनाया. वे कहते हैं, ‘इस फिल्म में उमर मुख्तार के रोल ने मुझे और बाकी कश्मीरी लड़कों को हिला कर रख दिया. जब हम सिनेमा हॉल से बाहर निकले तो सब के सब कश्मीर के तब तक के चहेते नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला से नाराज़ थे. हम सब मन ही मन उनकी तुलना मुख्तार से कर रहे थे.’

यासीन मलिक के मुताबिक उमर मुख्तार के सामने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कमज़ोर और लचर नज़र आ रहे थे. फिल्म की हर स्क्रीनिंग के बाद युवाओं ने शेख अब्दुल्ला के आदमकद पोस्टर खरीद कर जलाए. हालत यह हुई कि उस समय की नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार को हाउसफुल जा रही उस फिल्म को हफ्ते भर में ही थिएटर से उतरवा देना पड़ा.

फिल्म थिएटर से उतर गई, लेकिन कश्मीरी युवाओं के मन से नहीं उतर सकी. उन्हें मुख्तार में अपना हीरो मिल गया था. लोग बताते हैं कि फिल्म का एक डायलॉग, ‘वी विल नेवर सेरेंडर. वी विल विन ऑर डाइ’ यानी हम घुटने हरगिज़ नहीं टेकेंगे, या तो हम जीत जाएंगे या मर जाएंगे, उन दिनों हर लड़के की ज़ुबान पर था. चार साल बाद यही लड़के सरहद पार चले गए और बंदूकें लेकर ऐसे लौटे कि झेलम का पानी सुर्ख होता चला गया.

यह तो थी उन दिनों की कहानी जब फिल्में देखना कश्मीरियों के लिए उतना ही आम था जितना दिल्ली या कलकत्ता वालों के लिए. लेकिन आज के कश्मीरी युवाओं ने बड़े पर्दे पर फिल्में तभी देखी हैं जब उन्होंने बनिहाल टनल के बाहर का रुख किया है.

बीते नवंबर में श्रीनगर में हुए कश्मीर वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल ने भी कश्मीर में सिनेमा ह़ॉल्स खोले जाने के मुद्दे को आंच दी थी. अब सऊदी अरब के इस बड़े फैसले ने लोगों को हुर्रियत के इस तर्क के खिलाफ बोलने का मौका दे दिया है कि फिल्में देखना इस्लाम के खिलाफ है. सवाल उठ रहा है कि मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहरों वाला एक इस्लामिक देश जब सिनेमा से प्रतिबंध हटा रहा है तो कश्मीर में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता.

पर हुर्रियत के मुखिया सैयद अली शाह गिलानी सऊदी अरब के इस फैसले से खुश नहीं हैं. उनका कहना है कि सऊदी अरब के ‘रूलिंग इलीट’ उस संस्कृति को बढ़ावा देकर ठीक नहीं कर रहे हैं जिसके खिलाफ इस्लाम खड़ा होता है.

श्रीनगर की मरूज मुन्तहा 21 साल की हैं और फाइन आर्ट्स पढ़ रही हैं. वे कहती हैं, ‘फिल्में कौन नहीं देखता इन दिनों? हम सबके फोन तक में फिल्में रहती हैं. और फिर फिल्मों को गैर इस्लामिक मान भी लें तो हम गैर मुसलमान कश्मीरियों से फिल्म देखने का हक कैसे छीन सकते हैं?’ वे कहती हैं, ‘कश्मीर घाटी में सिनेमा हॉल्स होने चाहिए. हम उनमें अच्छी फिल्में दिखा सकते हैं, डॉक्यूमेंट्रीज़ दिखा सकते हैं. इस तरह के स्पेसेज़ हम कश्मीरियों को एक दूसरे से और जोड़ेंगे.’

लेकिन थियेटरों का वापस खुलना इतना आसान नहीं है. शोपियां कोर्ट में वकील हबील इकबाल कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि यहां के लोग नहीं चाहते कि यहां सिनेमा हॉल्स खुलें. लेकिन हम लोग ये भी नहीं चाहते कि यहां सिनेमा हॉल्स खुलें और यहां की सरकार और इंडियन मीडिया उनका इस्तेमाल ये दिखाने के लिए करे कि यहा नॉर्मल्सी लौट आई है.’ हबील वरिष्ठ पत्रकार मनु जोसेफ की एक टिप्पणी का जिक्र करते हैं जिसमें उन्होंने लिखा था कि कश्मीर में सब ठीक-ठाक है, बस अब उन्हें केएफसी चाहिए. वे कहते हैं, ‘कल सरकार ये न कहने लगे कि अब कश्मीर में लोग सिनेमा देखने जा रहे हैं और वहां सब ठीक है.’

हबीब आगे जोड़ते हैं, ‘य़हां लोग सरकार में यकीन खो चुके हैं. सरकार का इस तरह का कोई कदम, चाहे वो कैफे खोलने को बढ़ावा देने का हो, या फिर सेना के सद्भावना ऑपरेशन्स, सब एक कॉन्सपिरेसी का हिस्सा लगते हैं कि वो भारत को ये जताना चाहते हैं कि कश्मीर में सब सामान्य हो चुका है. जबकि यहां सबकुछ सामान्य नहीं है.’

हालांकि हबील यह भी कहते हैं कि सिर्फ इसलिए सिनेमा हॉल्स का विरोध नहीं करना चाहिए कि सरकार ऐसा चाहती है. उनके शब्दों में ‘हमारी नई पीढ़ियों ने सिनेमा हॉल्स नहीं देखे हैं, उन्हें बड़े पर्दे पर अच्छी फिल्में देखने का मौका मिलना चाहिए. बात बस इतनी सी है कि कश्मीर को सिनेमा हॉल्स से नहीं उनके अलामती (प्रतीकात्मक) इस्तेमाल से दिक्कत है.’