स्पेशल ओलंपिक्स वर्ल्ड समर गेम्स-2015 में भारत के लिए दो स्वर्ण पदक जीतने वाले एक खिलाड़ी को सरकारी बेरुखी की वजह से मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ा. यह कहानी राजबीर सिंह की है. 2015 में 15 साल के राजबीर स्वर्ण पदक लेकर चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर उतरे तो उनका एक नायक की तरह स्वागत किया गया था. लेकिन इसके कुछ ही महीनों बाद वे अपने पिता के साथ मजदूरी करने लगे. सरकार ने उनके लिए जो रकम बतौर इनाम घोषित की थी वह उन्हें नहीं मिली.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रतियोगिता में एक और दो किलोमीटर साइकिलिंग इवेंट में स्वर्ण पदक जीतने वाले राजबीर को पंजाब की तत्कालीन भाजपा-अकाली दल सरकार ने 15 लाख रुपये देने की घोषणा की थी. तब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने उन्हें सम्मानित करते हुए एक लाख रुपये का अतिरिक्त पुरस्कार दिया था. केंद्र सरकार ने भी राजबीर को 10 लाख रुपये देने की बात कही थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.

उधर, सरकार ने इस मामले की जानकारी से इनकार किया है. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल ने बताया यह उनकी सरकार के आने से पहले का मामला है. हालांकि उन्होंने राज्य के खिलाड़ियों को हरसंभव मदद देने का आश्वासन दिया.

राजबीर के पिता बलबीर अपने परिवार के साथ एक छोटे से कमरे के मकान में रहते हैं. अखबार से बात करते हुए वे कहते हैं, ‘मेरा बेटा मेरे लिए खास है. लेकिन अधिकारियों की बेरुखी ने उसे तोड़ दिया. किसी के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए.’ वे आगे बताते हैं, ‘जब राजबीर को स्वर्ण पदक मिले तो मुझे लगा कि हमारे बुरे दिन अब खत्म हो जाएंगे लेकिन मैं समझा नहीं सकता कि बीते दो सालों में हमें कितने बुरे दौर से गुजरना पड़ा.’

राजबीर आज भी मजदूरी कर रहे होते अगर इस साल मई में एक ग़ैर-सरकारी संस्थान ‘मनुक्ता दी सेवा’ की तरफ से उनके लिए मदद का हाथ न बढ़ा होता. एनजीओ के संस्थापक गुरप्रीत सिंह को जब राजबीर के बारे में पता चला तो उन्होंने उनकी मदद करने का फैसला किया. वे राजबीर को अपने एनजीओ की एक शाखा में ले गए और उनके लिए साइकिल, दवाइयों और खाने का बंदोबस्त किया. फिलहाल राजबीर एनजीओ के लिए काम कर रहे हैं. हालांकि साइकिल चलाने का उनका जुनून अब गुजरी बात हो चुकी है.