विजय रूपाणी एक बार फिर गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के अंदर यह चर्चा चल रही है कि वे लंबे समय तक इस पद पर नहीं रहेंगे. कहा जा रहा है कि कुछ ही महीनों में उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है.

दरअसल, गुजरात में भाजपा के 100 सीटों से भी नीचे आ जाने के बाद तीन-चार दिनों तक यह चर्चा चली कि भाजपा विजय रूपाणी की जगह किसी नए व्यक्ति को प्रदेश सरकार की कमान सौंप सकती है. 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 182 में से 115 सीटें मिली थीं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यह दावा कर रहे थे कि इस बार पार्टी 150 से अधिक सीटें जीतेगी. लेकिन उसका आंकड़ा 99 सीटों पर सिमट गया. इन नतीजों को कांग्रेस और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने भाजपा की नैतिक हार के तौर पर पेश किया.

किसी तरह सरकार बचा लेने वाले भाजपा के प्रदर्शन के बाद यह माना जा रहा था कि विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री के तौर पर बरकरार नहीं रखा जाएगा. स्मृति ईरानी से लेकर पुरुषोत्तम रुपाला तक कई नाम चले. लेकिन अंततः पार्टी ने विजय रूपाणी के पक्ष में निर्णय लिया.

कारण

इस निर्णय के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं. पहली यह कि पार्टी के अंदर कुछ प्रमुख नेताओं ने यह तर्क दिया कि अगर अभी रूपाणी को हटाया जाएगा तो विपक्ष इसे अपनी कामयाबी के तौर पर पेश करेगा. उनका कहना था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल इसे अपनी कामयाबी और भाजपा द्वारा नैतिक हार स्वीकार करने के तौर पर पेश करेंगे. गुजरात समेत पूरे देश में यह संदेश देने की कोशिश होगी कि विपक्ष की वजह से भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ा. पार्टी में कई नेताओं का मानना था कि इस स्थिति का फायदा विपक्ष को अधिक मिल सकता है. कहा जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की ओर से भी यही तर्क आया.

विजय रूपाणी को बरकरार रखने की दूसरी वजह अमित शाह के चुनाव के पहले के बयान बताए जा रहे हैं. चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने कहा था कि अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो विजय रूपाणी ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे. वे लगातार कह रहे थे कि गुजरात में भाजपा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल के चेहरे को लेकर चुनाव में उतरी है और चुनाव जीतने के बाद भी यही नेतृत्व बरकरार रहेगा. इस आधार पर भाजपा के अंदर यह बात चली कि अगर विजय रूपाणी को नहीं बनाए रखा गया तो पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर यह संदेश जाएगा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की बातों का कोई महत्व नहीं है. कहा गया कि ऐसी स्थिति में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए काम करना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा और विपक्ष भी इसे पार्टी और अमित शाह को नीचा दिखाने के लिए लगातार एक बड़े मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करेगा.

एक और बात यह भी आई कि अगर किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया जो विधायक नहीं है तो फिर छह महीने के अंदर उसे चुनाव लड़ाना पड़ेगा. ऐसे में कुछ नेताओं का यह भी कहना था कि अभी की स्थिति में छह महीने में फिर से चुनाव में उतरना ठीक नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस और हार्दिक पटेल भी उस सीट पर अपनी पूरी ताकत लगा देंगे. ऐसे में इस बात का भी जिक्र हुआ कि अगर छह-आठ महीने बाद नेतृत्व परिवर्तन होता है तो नए मुख्यमंत्री को चुनाव में लोकसभा चुनावों के साथ जाना पड़ेगा जो अकेले एक सीट पर चुनाव लड़कर जीतने के मुकाबले अपेक्षाकृत आसान होगा.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए पार्टी में यह योजना बनी कि अभी विजय रूपाणी को बरकरार रखा जाए और कुछ महीने बाद गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए. क्योंकि जिस तरह के नतीजे गुजरात में आए हैं, उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनावों में विजय रूपाणी के नेतृत्व के साथ जाना बेहद जोखिम का काम होगा.

आगे की रणनीति

गुजरात में भाजपा के प्रति वहां के सबसे प्रभावशाली पाटीदार समाज की नाराजगी स्पष्ट तौर पर दिखी. इस बार के चुनावों में पटेल समुदाय के लोगों ने भाजपा के पक्ष में उस तरह से वोट नहीं किया जैसा वे करते आए हैं. इसके बावजूद भले ही भाजपा गुजरात की सत्ता बरकरार रखने में कामयाब हो गई हो, लेकिन पार्टी के अंदर यह चर्चा है कि बगैर पटेलों को अपने साथ लाए भाजपा गुजरात में अच्छी जीत को लेकर निश्चिंत नहीं हो सकती. पटेलों को नाराज करके हो सकता है कि भाजपा चुनावों में जीत जाए, लेकिन ऐसी स्थिति में हार का भय भी हमेशा बना रहेगा. इस बार पटेलों का एक वर्ग भाजपा से नाराज था तो जीत हासिल करने के लिए भाजपा को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा.

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा गुजरात की 26 सीटों में से सभी पर जीती थी. इसका मतलब यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के पास हासिल करने के लिए बहुत कुछ नहीं है, लेकिन खोने के लिए बहुत कुछ है. 2019 के लोकसभा चुनावों तक हार्दिक पटेल भी 25 साल के हो जाएंगे और अभी की जो स्थिति दिख रही है, उसमें वे भी लोकसभा चुनाव लड़ते दिख सकते हैं. ऐसे में भाजपा को पटेल समाज को अपने पाले में लाने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी.

दरअसल, जिस गुजरात में भाजपा अपनी जीत को पक्की मानकर चलती थी, उस गुजरात में वह वापस उसी स्थिति को हासिल करना चाहती है. भाजपा इस बार के चुनावों वाली स्थिति को बदलना चाहती है. ऐसे में उसे लगता है कि पटेलों को अपने साथ पूरी तरह से लाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. इसी पृष्ठभूमि में यह माना जा रहा है कि अगले छह-आठ महीनों में भाजपा विजय रूपाणी की जगह पटेल समाज के किसी नेता को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दे. माना जा रहा है कि इससे गुजरात में पटेल समाज की भाजपा के प्रति नाराजगी दूर हो सकती है और उन्हें 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के साथ लाया जा सकता है.