साल 2017 में खेल जगत में काफी कुछ ऐसा घटित हुआ जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा. इनमें भारतीय महिला क्रिकेट टीम का विश्वकप फाइनल तक पहुंचना, साइना नेहवाल की जोरदार वापसी और भारतीय टीम द्वारा लगातार टेस्ट मैच जीतने का रिकॉर्ड जैसी कई घटनाएं प्रमुख हैं.

लेकिन, इन सबके अलावा इस साल कुछ ऐसे नाम भी लगातार सुर्ख़ियों में छाए रहे जिन्हें इस साल के पहले तक महज चंद लोग ही जानते थे. 2017 के इनके प्रदर्शन को देखते हुए आने वाले समय में इनके और बड़ा बनने को लेकर भी भविष्यवाणियां की जा रही हैं. आइये जानते हैं, ऐसे तीन खिलाड़ियों के बारे में जिन्होंने 2017 से अपनी चमक बिखेरनी शुरू की और उनकी प्रतिभा को देखते हुए आने वाले समय में उनके विश्व पटल पर छा जाने की उम्मीद जताई जा रही है.

पृथ्वी शॉ - क्रिकेट

साल 2017 में भारतीय प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सबसे ख़ास बात यह देखने को मिली कि इसकी शुरुआत जिस खिलाड़ी की चर्चा से हुई, साल के अंत में भी वही छाया रहा. इस साल जनवरी में पृथ्वी शॉ का चयन जब मुंबई की रणजी टीम में हुआ तो कइयों के लिए यह बेहद चौंकाने वाली खबर थी. इसके दो कारण थे-एक तो उनकी उम्र महज 17 साल थी, दूसरा यह मैच कोई साधारण मैच नहीं बल्कि रणजी ट्रॉफी का सेमीफाइनल मुकाबला था. लेकिन, शॉ ने अपने प्रदर्शन से इस चयन को सही साबित किया. उन्होंने अपने इस पहले प्रथम श्रेणी मैच की दूसरी पारी में शानदार शतक लगाकर मुंबई को फाइनल में पहुंचा दिया. इस मैच में उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना गया.

पृथ्वी शॉ इसके बाद इस साल सितम्बर में चर्चा में आए जब उन्होंने अपने पहले दिलीप ट्रॉफी मैच में ‘इंडिया रेड’ की ओर से खेलते हुए शानदार 154 रन बनाए. यह भी कोई आम मैच नहीं बल्कि दिलीप ट्रॉफी का फाइनल मुकाबला था जिसमें उनकी पारी के चलते ‘इंडिया रेड’ ने खिताब अपने नाम किया.

इस मैच में शतक लगाकर उन्होंने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए. वे सचिन तेंदुलकर के बाद दिलीप ट्रॉफी में शतक लगाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गए. सचिन ने उनसे 58 दिन पहले यानी 17 साल 262 दिन की उम्र में यह कारनामा किया था. काफी कम उम्र में शानदार प्रदर्शन के चलते ही पृथ्वी शॉ की सचिन से तुलना की जाने लगी है. रणजी और दिलीप ट्रॉफी दोनों के अपने पहले मैचों में शतक ठोकने वाले भी ये दो ही हैं. इसके अलावा पृथ्वी ने अब तक प्रथम श्रेणी में नौ मैच खेले हैं जिनमें उनके पांच शतक हैं, इस मामले में भी वे सचिन के 18 साल की उम्र तक सात प्रथम श्रेणी शतक लगाने के रिकॉर्ड से महज दो कदम दूर हैं.

सचिन तेंदुलकर से पृथ्वी शॉ की तुलना का एक कारण यह भी है कि उन्होंने 2013 में मुंबई के प्रतिष्ठित इंटर स्कूल ‘हैरिस शील्ड’ टूर्नामेंट के एक मैच में 546 रनों की पारी खेली थी. यह वही टूर्नामेंट है जिसके एक मैच में कभी तेंदुलकर ने 326 रन बनाए थे. पृथ्वी शॉ की एक बड़ी खासियत यह भी है कि उन्हें औरों से अलग बड़े मैच काफी रास आते हैं. रणजी और दिलीप ट्रॉफी के बड़े मुकाबलों के बाद इस नौजवान ने इस साल भारत आई न्यूजीलैंड की टीम के खिलाफ अभ्यास मैच में अपने प्रदर्शन से सभी को चौंका दिया. इस मैच में उन्होंने टिम साउथी, ट्रेंट बोल्ट, ईश सोढ़ी और मिचेल सैंटनर जैसे दुनिया के नामी गेंदबाजों का काफी अच्छे से सामना किया और 80 गेंदों में शानदार 66 रन की पारी खेली.

हाल ही में जब पृथ्वी को अगले महीने होने वाले अंडर-19 विश्व कप के लिए भारतीय टीम की कमान सौंपी गई तो मशहूर टायर निर्माता कंपनी ‘एमआरएफ’ ने पृथ्वी के साथ एक अनुबंध साइन किया. एमआरएफ ने इससे पहले केवल सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, स्टीव वा और विराट कोहली जैसे कुछ गिने चुने खिलाड़ियों के साथ ही करार किया है जिसके तहत ये खिलाड़ी अपने बल्ले पर ‘एमआरएफ’ के लोगो का इस्तेमाल करते हैं.

मैच-दर-मैच अपने प्रदर्शन का लोहा मनवाने वाले इस बल्लेबाज में उनके प्रशंसक सचिन तेंदुलकर की छवि देखते हैं. हालांकि, अधिकांश क्रिकेट विश्लेषक भी मानते हैं कि पृथ्वी उसी फेहरिस्त के खिलाड़ी हैं जिसमें सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली आते हैं और इन्हीं तीनों की तरह आने वाले सालों में वे भी बहुत बड़े खिलाड़ी बनने जा रहे हैं.

सैखोम मीराबाई चानू - वेटलिफ्टिंग

एमसी मैरी कॉम, कुंजा रानी देवी, सरिता देवी और संजीता चानू के बाद मणिपुर ने इस साल देश को एक और ‘गोल्डन गर्ल’ दी. ये हैं सैखोम मीराबाई चानू जिन्होंने पिछले महीने वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्णिम सफलता हासिल की. चानू की इस सफलता को दो बातें काफी बड़ा बना देती हैं. इस चैंपियनशिप में महिलाओं के 48 किग्रा भार वर्ग में हिस्सा लेते हुए उन्होंने रिकॉर्ड कुल 194 किलो का भार उठाया है. उन्होंने पहले 85 किलो (स्नैच में) और फिर 109 किलो भार (क्लीन और जर्क में) उठाया. वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग के इतिहास में महिलाओं के 48 किलो वाले भार वर्ग में अब तक कोई भी ऐसा नहीं कर सका है. भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उसे 22 साल बाद स्वर्ण पदक हासिल हुआ है. इससे पहले इस चैंपियनशिप में भारत की ओर से ओलंपिक पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी ने 1994 और 1995 में लगातार दो बार गोल्ड जीता था.

मीराबाई चानू के लिए यह सफलता एक और लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है. दरअसल, चानू ने पिछले साल रियो ओलंपिक में हिस्सा लिया था, लेकिन वे उम्मीदों से उलट कोई पदक नहीं हासिल कर सकी थीं. रियो में वे तीन बार में भी 104 किलो भार (क्लीन और जर्क में) नहीं उठा पाई थीं. इस स्पर्धा में 12 देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था और दो खिलाड़ी ही ऐसे थे जो स्पर्धा को पूरा नहीं कर पाए थे. किसी को भी सुनकर हैरत होगी कि आज की यह विश्व चैंपियन भी इन दो में से एक थी. मीराबाई चानू के लिए यह अब तक की सबसे बुरी याद थी क्योंकि इसके बाद उनके कोच और करीबियों के अलावा लगभग सभी ने उनसे उम्मीदें छोड़ दी थीं. हालांकि, मीराबाई ने इस सितंबर 2017 में ‘राष्ट्रमंडल वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप’ में स्वर्ण पदक जीता था लेकिन कइयों ने इस स्पर्धा को काफी छोटा बताते हुए उनकी कामयाबी को नकार दिया था.

जानकारों की मानें तो मीराबाई चानू में शुरू से ही मेहनत करने का माद्दा और हुनर दोनों रहे हैं जिससे वे हर किसी को प्रभावित करती रही हैं. वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने जिस आसानी से 194 किलो का भार उठाया वह हर किसी के लिए चौंकाने वाला था. इन लोगों की मानें तो मीराबाई के लिए साल 2017 सबसे अहम साबित हुआ है क्योंकि उन्होंने इस साल अपने एक सबसे बड़े ‘डर’ पर जीत हासिल कर ली है.

ओलंपिक पदक विजेता और वर्तमान में भारतीय वेटलिफ्टिंग फेडरेशन में सरकारी पर्यवेक्षक कर्णम मल्लेश्वरी एक हालिया साक्षात्कार में बताती हैं, ‘ हमें हमेशा से मीराबाई से काफी उम्मीदें रही हैं क्योंकि उसमें अपार प्रतिभा है. रियो ओलंपिक में मुझे उससे पदक की पूरी उम्मीद थी. लेकिन, उस समय तक उसकी सबसे बड़ी समस्या बड़े मंचों पर नर्वस हो जाना था जिस वजह से वह पीछे रह जाती थी. पिछले दिनों इस पर काफी काम किया गया और हालिया जीत बताती है कि अब चानू ने अपने इस सबसे बड़े डर पर काबू पा लिया है.’

कर्णम मल्लेश्वरी और मीराबाई चानू के कोच इस बात को लेकर काफी आश्वस्त हैं कि आने वाले समय में वे न सिर्फ देश का बल्कि वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग का भी एक जाना-माना चेहरा बनने जा रही हैं.

किदांबी श्रीकांत - बैडमिंटन

इसी सिलसिले में एक नाम बैडमिंटन स्टार किदाम्बी श्रीकांत का भी है. हालांकि, श्रीकांत के अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत साल 2014 में ही हो गई थी लेकिन माना जाता है कि उन्हें असली पहचान इसी साल से मिलना शुरू हुई है.

साल 2014 में श्रीकांत तब सुर्ख़ियों में आए थे जब उन्होंने चाइना ओपन सुपर सीरीज के फाइनल में बैडमिंटन की दुनिया के लियोनल मैसी कहे जाने वाले चीन के ‘ली डैन’ को शिकस्त दी थी. उस समय विश्व चैंपियनशिप, विश्व कप, सुपर सीरीज मास्टर्स फाइनल, ऑल इंग्लैंड ओपन और ओलंपिक में गोल्ड जीत चुके ली डैन को हराना नामुमकिन जैसा माना जाता था.

इस बड़ी सफलता के बाद 2015 में भी किदांबी श्रीकांत ने दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों को हराकर स्विस ओपन ग्रां पी और इंडियन ओपन सुपर सीरीज का खिताब जीता. लेकिन, इसके बाद वे अपने प्रदर्शन में निरंतरता बनाकर नहीं रख सके. इस दौरान रियो ओलंपिक सहित कई बड़े आयोजन हुए लेकिन वे कुछ ख़ास नहीं कर पाए. हालांकि, इसका एक प्रमुख कारण उनका लंबे समय तक चोट के कारण फिट न होना भी माना जाता है.

लेकिन, कहते हैं कि देर आए दुरस्त आए. इसी साल अप्रैल में किदांबी श्रीकांत ने सिंगापुर सुपर सीरीज से एक बार फिर वापसी की. हालांकि, वे इस टूर्नामेंट के फाइनल में जाकर हार जरूर गए, लेकिन इसमें उन्होंने दुनिया के कई नामी महारथियों को शिकस्त दी.

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सिंगापुर सुपर सीरीज में अपने दमखम का परिचय देने वाले श्रीकांत ने इस साल जून में पहले इंडोनेशिया सुपर सीरीज प्रीमियर का खिताब जीता और फिर एक हफ्ते बाद ही ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज जीतकर इतिहास रच दिया. किदांबी ने इन दोनों टूर्नामेंटों में न केवल विश्व के नंबर एक शटलर सोन वान को दो बार हराया, बल्कि ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में मौजूदा ओलंपिक चैंपियन और विश्व चैंपियन चेन लांग को सीधे सेटों में शिकस्त दी.

इसके बाद अक्टूबर में आंध्र प्रदेश के इस नौजवान ने डेनमार्क ओपेन सुपर सीरीज का खिताब भी जीत लिया. इसके एक हफ्ते के अंदर ही उन्होंने एक और बड़ा टूर्नामेंट फ्रेंच ओपन सुपर सीरीज भी अपने नाम कर लिया. यह टूर्नामेंट जीतने के बाद किदांबी श्रीकांत विश्व रैंकिंग में दूसरे पायदान पर आ गए. साथ ही वे दुनिया के चौथे और भारत इकलौते ऐसे खिलाड़ी बन गये जिसने एक साल के अंदर बैडमिन्टन की चार ‘सुपर सीरीज’ अपने नाम की. इसके अलावा यह युवा स्टार खिलाड़ी बैडमिंटन की सुपर सीरीज, सुपर सीरीज प्रीमियर और ग्रां पी गोल्ड तीनों टूर्नामेंट जीतने वाला पहला भारतीय शटलर भी बन गया.

कई जानकार किंदाबी श्रीकांत की बेजोड़ तकनीक और जीतने की इच्छा शक्ति को देखते हुए मानते हैं कि यह खिलाड़ी भविष्य में वह हासिल करने वाला है, जो अभी तक दुनिया के चंद लोग ही हासिल कर सके हैं. इसका एक कारण उनकी उम्र भी है जो अभी महज 24 साल है. हालांकि, निकट भविष्य में श्रीकांत का सबसे बड़ा लक्ष्य अगले साल मार्च में होने वाली प्रतिष्ठित ‘ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप’ जीतना है. यह खिताब पाना बैडमिन्टन के हर खिलाड़ी का सपना होता है. अभी तक केवल दो भारतीय प्रकाश पादुकोण और पुलेला गोपीचंद ही इसे हासिल कर सके हैं.