इतिहास में अक्सर देखा गया है कि एक त्रासदी दूसरी त्रासदी का बीज बो देती है. बहुत से लोग मानते हैं कि 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट को फैसले को संसद के जरिये पलटा जाना किसी त्रासदी से कम नहीं था. इसके बाद हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए और उनकी जमकर निंदा की. माहौल इस कदर गरमा गया कि इससे विचलित हुए राजीव गांधी बहुसंख्यक तुष्टिकरण की राह पर निकल पड़े.

प्रसिद्ध इतिहासकार राम चंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि शाह बानो केस पर हुई राजनीति से नाराज चल रहे बहुसंख्यक समुदाय के तुष्टिकरण के लिए राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन तुष्टिकरण की जिस राह पर राजीव गांधी निकल पड़े थे, उसके नतीजे बेहद घातक सिद्ध हुए. सांप्रदायिक ताकतें लगातार हावी होती चली गई, बाबरी मस्जिद गिरा दी गई और हजारों लोग धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गए.

शाह बानो केस

अब कहानी तफसील से जो इंदौर के उस समय के एक मशहूर वकील मोहम्मद अहमद खान और उनके परिवार से शुरू होती है. वकील साहब ने 43 साल तक साथ रहने के बाद 1975 में अपनी पहली बीवी शाह बानो को उसके पांच बच्चों सहित घर से निकाल दिया था. इसके बाद वे कभी-कभी अपने बच्चों की परवरिश के लिए कुछ रकम अपनी बेगम को दे दिया करते थे. लेकिन शाह बानो अपने शौहर से बाकायदा हर महीने गुजारा-भत्ता मांग रही थीं. पर इसके लिए वकील साहब तैयार नहीं थे. इस चलते दोनों के बीच अक्सर ही झगड़ा होता रहता था.

इसी माहौल में छह नवंबर, 1978 को झगड़े के बाद शाह बानो के शौहर मोहम्मद अहमद खान ने उन्हें तीन तलाक देकर उनसे हमेशा के लिए रिश्ता खत्म कर लिया. मुसलमानों की रवायत तय करने वाले शरीअत कानून के अनुसार शौहर (पति) और बीवी का रिश्ता तलाक के तीन महीने बाद ही खत्म हुआ माना जाता है. वहां इस अवधि को ‘इद्दत की मुद्दत’ कहा जाता है. इसके अनुसार इस अवधि तक पति को अपनी तलाकशुदा बीवी की देख-रेख करना जरूरी होता है. इसीलिए मुस्लिम समाज में बाकायदा निकाह के वक्त ही ‘मेहर’ की रकम तय कर दी जाती है.

मुसलमानों में तलाक के बाद बीवी को ‘नफ़्का’ यानी गुजारा-भत्ता देने का चलन नहीं होता. ऐसे में शाह बानो की समस्या यह थी कि पांच बच्चों समेत उनकी भविष्य की जिंदगी कैसे चले. उनके पति तो इस्लामिक कानूनों के लिहाज से मेहर की रकम देकर अपना ‘फर्ज’ निभा चुके थे. इसका मतलब यह था कि मुसीबत की ऐसी घड़ी में शाह बानो को उनके समाज से कोई सहारा नहीं मिल सकता था. ऐसे हालात में उनके पास अदालत के सिवा कोई सहारा नहीं था. लिहाजा वे अदालत गईं और वहां गुहार लगाई कि उनके शौहर उन्हें हर महीने तय रकम गुजारा-भत्ता के रूप में दें. न्यायिक मजिस्ट्रेट से लेकर हाई कोर्ट तक ने यह मांग जायज मानते हुए फैसला शाह बानो के पक्ष में दिया. लेकिन मोहम्मद अहमद खान ने इस फैसले को इस्लामिक रवायत में दखल मानते हुए इसे देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट इससे पहले दूसरे मामलों में भी कह चुका था कि केवल मेहर की रकम दे देने से तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पति की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती. उधर शाह बानो मामले में संविधान और मुस्लिम पर्सनल कानून के बीच टकराव का सवाल निहित होने के चलते शीर्ष अदालत ने इसे अपने पांच जजों की संविधान पीठ के हवाले कर दिया. इस खंडपीठ में बहस-मुबाहिसे का लंबा दौर चला. आखिरकार 23 अप्रैल, 1985 को चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाया. यह फैसला शाह बानो के पक्ष में था. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश में मोहम्मद अहमद खान से कहा कि वे अपनी पूर्व बेगम को हर महीने 500 रुपये का गुजारा-भत्ता दें.

देश की शीर्ष अदालत ने इस फैसले में शरीअत में मौजूद मेहर के प्रावधान की भी व्याख्या की और कहा कि तलाक के बाद पत्नी को मेहर देने का मतलब उसे गुजारा-भत्ता दे देना नहीं है. ऐसे में तलाकशुदा पत्नी को पूरा हक है कि वह अदालत जाकर अपने पूर्व पति से गुजारा-भत्ता की मांग करे. इसके अलावा उसने सरकार से एक बार फिर ‘समान नागरिक संहिता’ पर कदम उठाने की अपील की. इस आदेश से शाह बानो के पूर्व पति वकील साहब लाचार हो गए लेकिन यह लाचारी उनकी अकेले की नहीं थी. इस फैसले ने तो सभी मुस्लिम शौहरों को लाचार और परेशान कर दिया था क्योंकि अब उनके लिए तीन तलाक देकर अपनी बेगम से पीछा छुड़ाना आसान नहीं रह गया था.

फैसला पलटना कांग्रेस को बहुत महंगा पड़ा

उधर इस फैसले के बाद शुरू हुए राजनीतिक दांव-पेंच ने देश का राजनीतिक इतिहास ही बदल कर रख दिया. हालांकि यह सिलसिला धीरे-धीरे ही चला था. उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी जो केवल छह महीने पहले अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर के सहारे प्रचंड बहुमत लेकर प्रधानमंत्री बने थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उनके सामने ‘इधर कुआं, उधर खाई’ वाले हालात पैदा कर दिए थे. इसमें उनकी छवि की भी भूमिका थी. असल में राजीव गांधी की छवि नई सोच और प्र​गतिशील विचारों वाले नेता की गढ़ी गई थी. उन्हें तब ‘यूथ आइकन’ भी कहा गया था.

ऐेसे में यदि वे इस फैसले को संसद से कानून बनाकर पलटते तो अपनी छवि को नुकसान पहुंचाते. वहीं यदि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अडिग रहते तो इससे मुस्लिम वोट बैंक के खिसकने का खतरा पैदा हो जाता. दोनों ही सूरत में उनके राजनीतिक भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ने की सूरत उत्पन्न हो गई थी. यह फैसला पलटने पर लोग कहते कि राजीव गांधी भी धर्म की राजनीति करने वाले बाकी नेताओं से अलग नहीं हैं. उनके सामने खतरा यह भी था कि इससे बहुसंख्यक हिंदू समाज भी उनसे नाराज हो सकता था. ऐसे हालात में कम अनुभवी और युवा राजीव के लिए कुछ भी तय करना आसान नहीं था. खैर उनकी सरकार ने पहले फैसला किया कि वह शीर्ष अदालत के फैसले को बरकरार रखेगी. उनके गृह राज्यमंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने फैसले के पक्ष में संसद में लगभग एक घंटे तक सरकार का पक्ष भी रखा.

हालांकि कुछ महीने बाद यानी 1985 के अंत में उत्तर भारत के कई राज्यों में उप-चुनाव कराए गए थे. इसमें कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. जानकारों के मुताबिक राजीव गांधी के सलाहकारों ने उनसे कहा कि ऐसा मुस्लिम मतदाताओं के दूर जाने की वजह से हुआ है. राजनीति में नए-नवेले राजीव का आत्मविश्वास इससे डगमगा गया और उन्होंने शाह बानो मामले पर अदालत के फैसले को पलटने का मन बना लिया.

1985-86 में देश के गृह सचिव रहे आरडी प्रधान अपनी किताब ‘वर्किंग विद राजीव गांधी’ में इस बारे में लिखा है. वे कहते हैं, ‘मैंने प्रधानमंत्री से उनकी छवि का हवाला देते हुए अदालत का फैसला पलटने से मना किया था.’ लेकिन इसके जवाब में राजीव गांधी ने उनसे कहा, ‘प्रधान जी! आप शायद यह भूल रहे हैं कि मैं एक पॉलिटिशियन भी हूं.’ आरडी प्रधान के इस दावे को यदि सच मानें तो साफ हो जाता है कि ‘नई सोच’ वाले उस नेता ने आखिर क्यों ‘धर्म’ की राजनीति में कूदने का मन बनाया था. हालांकि उनका यह दांव न केवल उनकी पार्टी के लिए बल्कि निजी तौर पर उनके लिए भी काफी महंगा साबित हुआ. आलोचकों के अनुसार देश की समकालीन राजनीति के सांप्रदायिकीकरण में इस फैसले की काफी बड़ी भूमिका रही है.

बहरहाल 25 फरवरी, 1986 को राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) विधेयक, 1986 को लोकसभा में पेश कर दिया. विपक्ष ने इसका जबरदस्त विरोध किया था. इसके बावजूद मई आते-आते यह राज्यसभा से भी पास होकर कानून का रूप ले चुका था. इसके जरिए तलाक के बाद गुजारा-भत्ता के लिए अदालत जाने का मुस्लिम महिलाओं का अधिकार खत्म हो गया. इस कानून में यह भी साफ कर दिया गया था कि तलाकशुदा बीवियों को उनके शौहर से केवल इद्दत (तीन महीने) तक का ही गुजारा-भत्ता मिलेगा.

संसद और उससे बाहर तमाम प्रगतिशील तबके ने सरकार के इस कदम की जबरदस्त निंदा की. माकपा सांसद दीपेन घोष ने चेताया था कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को भेड़ियों का निवाला बना देगा. भाकपा के गुरुदास दासगुप्ता ने इस कानून को धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ बताते हुए इसे कट्टरपंथियों के आगे सरकार का शर्मनाक समर्पण करार दिया. वहीं किसी ने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के खिलाफ है जिसमें कहा गया था कि देश में एक समान नागरिक संहिता बनाई जाएगी. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी भी मानती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने उस समय की सरकार को राजनीति में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बढ़ाने का एक और मौका दिया था लेकिन अपनी अनुभवहीनता से राजीव गांधी यह मौका गंवा बैठे.

वरिष्ठ पत्रकार सतीश जैकब की मानें तो सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले ने देश की राजनीति ही बदलकर रख दी. उनका यह भी मानना है कि य​दि राजीव गांधी इस फैसले को न पलटते तो आज हिंदुत्व की राजनीति (भाजपा) का ऐसा उभार संभव नहीं होता. कुछ आलोचकों का तो यह भी कहना है कि देश में ‘कमंडल’ की राजनीति का असल बीजारोपण तो राजीव गांधी ने ही किया था. ऐसे लोगों का कहना है कि इस कानून के बाद अपनी मुस्लिम-परस्त छवि से परेशान होकर राजीव गांधी ने उसे तोड़ने के लिए कट्टरपं​थी हिंदुओं को खुश करने का दांव चला. इसके लिए उन्होंने अदालत के जरिए राममंदिर का ताला खुलवाया. कई जानकारों का मानना है कि भाजपा को कांग्रेस की उसी ‘गलती’ से वह संजीवनी मिली जिसके बूते आज वह केंद्र सहित देश के एक बड़े हिस्से में सत्तारूढ़ है.

हालांकि अब राजीव के बेटे राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस की कमान है. हाल के चुनावों के दौरान वे कई मंदिरों में जाते और और अपनी धार्मिक पहचान पर जोर देते दिखे हैं. आलोचकों की राय में ऐसा करके वे अपनी पार्टी की मुस्लिमपरस्त छवि को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. यदि ऐसा है तो यह तीन दशक पहले शाह बानो मामले में अपने पिता के फैसले से पार्टी को हुए नुकसान की भरपाई करने जैसा लगता है.