सुनी-सुनाई है कि नए साल के पहले महीने में ही अरविंद केजरीवाल की पार्टी का फैसला होने वाला है. केजरीवाल बनाम कुमार विश्वास की लड़ाई का आखिरी अध्याय लिखा जा रहा है. इसमें हार कुमार विश्वास की ही होनी है और इसी के डर से वे अब तक कोई फैसला नहीं ले पा रहे थे. लेकिन आगे ऐसा कर पाना मुश्किल है.

दिल्ली में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं. जनवरी के पहले हफ्ते में ही इनके नाम की घोषणा होनी है. दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 70 में से 66 विधायक हैं, इसलिए तीनों सीटें आम आदमी पार्टी को मिलना तय है. लेकिन अरविंद केजरीवाल किसे उम्मीदवार बनाएंगे यह अभी तक तय नहीं हुआ है. गुरुवार को आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर कुमार विश्वास के समर्थन में जबरदस्त नारेबाजी हुई. सोशल मीडिया पर कुमार को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की मुहीम शुरू है. इसका खुला समर्थन कुमार विश्वास खुद भी कर रहे हैं. वे ट्विटर पर हर उस ट्वीट को लाइक कर रहे हैं जो उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की पैरवी करती है. लेकिन जब कुमार के समर्थकों ने आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर हल्ला बोला तो उन्होंने इससे खुद को अलग करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ‘मुद्दों के लिए संघर्ष करें, मेरे हित-अहित के लिए नहीं. स्मरण रखिए अभिमन्यु के वध में भी उसकी विजय है.’

उनके इस लिखने से भी अंदाजा हो जाता है कि अब ये करीब-करीब तय हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल उन्हें राज्यसभा नहीं भेजेंगे. सुनी-सुनाई है कि कुमार विश्वास को पार्टी के दो-तीन बड़े नेताओं ने बता दिया है कि उनका संसद पहुंचना नामुमकिन है. इसलिए वे वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी में जुट गये हैं. हाल-फिलहाल में जिन लोगों ने कुमार विश्वास से बात की, उनमें से कुछ का मानना है कि वे खुद पार्टी नहीं छोड़ेंगे. वे खुद को पार्टी के ‘टॉप थ्री’ नेताओं में से एक मानते हैं. वे पिछले दिनों बार-बार कहते सुने गए कि अभी जितने लोग पार्टी में शीर्ष पर हैं उनमें से वे, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया ही पार्टी के ‘फाउंडर मेंबर’ हैं. इसलिए वे पार्टी क्यों छोड़ें, ये पार्टी तो उनकी है. वे कई बार खुद को मनीष सिसौदिया से भी ज्यादा लोकप्रिय बताते हैं. वे कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल के बाद उनकी जनसभा की सबसे ज्यादा मांग की आती है. इस हिसाब से पार्टी में उनकी हैसियत नंबर दो की है, मनीष सिसौदिया की नहीं. यह बात मनीष को नागवार गुजर रही है.

आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के एक करीबी नेता बताते हैं कि इस वजह से कुमार विश्वास को केजरीवाल ने नहीं मनीष सिसौदिया ने किनारे लगाया है. दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद में काम कर चुके पत्रकार जानते हैं कि कुमार विश्वास और मनीष सिसौदिया दोनों लड़कपन के मित्र हैं. एक ही साथ पढ़े-लिखे और बड़े हुए. जब अन्ना आंदोलन हुआ तो मनीष की वजह से ही कुमार विश्वास आंदोलन से जुड़े और फिर अरविंद केजरीवाल के करीब आए. जब अन्ना से अलग होने का फैसला हुआ तब भी मनीष सिसौदिया से अपने संबंध की वजह से कुमार ने केजरीवाल की सियायत का रास्ता पकड़ा. जब पार्टी से प्रशांत भूषण और योगेंद्र योदव को निकाला गया तब भी मनीष सिसौदिया के ही कहने पर कुमार विश्वास ने उऩके निष्कासन की घोषणा की थी. लेकिन पिछले कुछ महीने में यह दोस्ती टूट सी गई है.

कुमार विश्वास से पहले राजस्थान का कामकाज मनीष सिसौदिया ही देखते थे. उस दौरान वहां आम आदमी पार्टी का कोई खास संगठन नहीं था, बस कुछ पदाधिकारी थे जो मनीष ने ही बनाए थे. लेकिन केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच हुए पिछले समझौते के तहत कुमार को राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई. राजस्थान में अजमेर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होने वाले हैं. सुनी-सुनाई है कि अरविंद केजरीवाल से ज्यादा मनीष सिसौदिया चाहते थे कि कुमार विश्वास अजमेर से चुनाव लड़ें. राजस्थान इकाई के कई नेताओं के जरिए उनका नाम दिल्ली भिजवाया भी गया. लेकिन अपनी हार तय मानकर कुमार विश्वास ने चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा की सीट पर अपनी दावेदारी बरकरार रखी. इसके बाद से उनकी केजरीवाल के साथ-साथ अपने पुराने मित्र मनीष सिसौदिया से भी बातचीत बंद है.

कुमार तीन राज्यसभा सीट में से एक अपने नाम करना चाहते हैं, अरविंद केजरीवाल तीन में से एक सीट अपने मित्र संजय सिंह के नाम कर चुके हैं. बाकी दो सीटों पर सस्पेंस है. लेकिन इतना तय है कि यह अब कुमार विश्वास को नहीं मिलने वाली.