नूतन शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं और नजफगढ़ में रहती हैं


मैं घर में दो भाइयों की छोटी बहन थी. मेरा जन्म तो दिल्ली में हुआ पर परवरिश गांव वाली मिली थी क्योंकि मम्मी-पापा दोनों ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे. इसलिए हमें शहरी बच्चों की तरह टिप-टॉप बनकर घूमने और पार्क में जाकर खेलने तक सीमित बचपन नहीं मिला. मैं भाइयों के साथ मिट्टी में खेली और लोट-पोटकर खेली. इस तरह खेलने पर मम्मी-पापा ने कभी रोक-टोक नहीं की. लेकिन मिट्टी में लोटते हुए भी मेरा दिमाग उड़न-तश्तरी की तरह जाने किस आसमान के चक्कर लगाता रहता, हर समय मैं कुछ न कुछ करने की फिराक में रहती थी. मुझे बचपन से ही एडवेंचर का बहुत शौक था, अब भी जब कभी सटक जाती हूं तो कभी पहाड़ चढ़ने शिमला निकल पड़ती हूं तो कभी नाव चलाना सीखने के लिए बनारस के किसी घाट पहुंच जाती हूं. घर वालों को भी मेरे इस शौक का अंदाजा पहले ही लग गया था क्योंकि बचपन में मैंने इस तरह की हरकतों के नैनो वर्जन उन्हें दिखा दिए थे.

जिस घटना का मैं यहां पर जिक्र करने जा रही हूं वह तब की है जब मेरी उम्र सात-आठ साल रही होगी. उन दिनों गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं. मई-जून की सुनसान और तीखी दोपहरों में बाकी सब तो सो जाते थे लेकिन मेरी नन्ही सी जान को चैन नहीं पड़ता था. मैं हमेशा दोपहर में कुछ न कुछ डेयरिंग करने का सोचती रहती थी. आखिर एक दिन मुझे गर्मी की बोरियत भरी दोपहर से खुद को बचाने का एक तरीका सूझ ही गया.

पहले यह बता देती हूं कि उन दिनों हमें पापा से रोज एक रुपए का सिक्का मिलता था. वह एक रुपया बहुत सोच-समझकर खर्च किया जाता था. अब किस्से पर आते हैं. मेरे घर से जरा सा हटकर एक सड़क जाती थी जिस पर एक ठण्डी लॉलीपॉप (बर्फ वाली कुल्फी या कैंडी) वाला खड़ा रहता था. मैं पहली बार अपने बड़े भाई के साथ वहां गई थी क्योंकि पापा ने वहां अकेले न जाने की ख़ास हिदायत दी थी. शायद वो मेरे दिमाग के कभी-कभी उड़न तश्तरी हो जाने के बारे में जानते थे.

एक बार दोपहर में जब सब सो रहे थे, तब मैं दबे पांव वह एक रुपया मुट्ठी में दबाए निकली और सड़क की तरफ दौड़ पड़ी. मैं गई, लॉलीपॉप खरीदा, खाया और सबके उठने से पहले ही वापस भी आ गयी. मेरी उमर के अनुपात में यह उपलब्धि मेरे लिए बड़ी थी और ऐसा करनेभर से मुझे बहुत रोमांच हो रहा था. अब मैं रोजाना वहां जाने लगी. मैं दो-तीन बजे तक सबके सोने का इंतजार करती. जैसे ही सब सो जाते दौड़कर जाती, लॉलीपॉप खाकर घर लौट आती.

यह सिलसिला करीब छह-सात दिन तक चला. फिर वह दोपहर आई जो आज भी मेरी यादों में एक बड़े सबक की तरह मौजूद है. हुआ यूं कि उस दोपहर को भी मैं अपनी लाल रंग की चप्पल पहनकर सड़क किनारे पहुंची तो रोज की ही तरह सड़क एकदम सुनसान थी. एक-दो ठेले वालों के अलावा वहां कोई भी नहीं था. वहां पर एक स्कूल था जिसके कोने पर लॉलीपॉप वाला खड़ा रहता था. मैंने एक रुपया देकर लॉलीपॉप खरीदी और वहीं स्कूल के गेट पर खड़े होकर खाने लगी. तभी स्कूल की दीवार के पीछे से एक लड़के ने मुझे बुलाया. उसकी उम्र 28-30 के करीब रही होगी.

मासूमियत में लिपटी मैं उसके पास पहुंच गई. उसने मुझसे कुछ बातें कीं जैसे – क्या नाम है आपका, आपको लॉलीपॉप पसंद है, क्या और लॉलीपॉप खाओगे? आखिरी सवाल के जवाब में मैंने पूरी जीभ टपकते लालच के साथ हां कहा. उसने मुझे सौ रुपए का नोट दिखाते हुए कहा – ‘मैं आपको ये पैसे दूंगा जिससे आप बहुत सारे लॉलीपॉप खरीद पाओगे. लेकिन इसके पहले आपको मेरा एक काम करना पड़ेगा.’ पहले तो मैं सौ का नोट देखकर ही डर गयी. फिर मम्मी की सुनाई हुई बच्चों को उठाकर ले जाने वाली कहानियां भी दिमाग में गश्त लगाने लगीं. इसलिए मैंने ‘न’ में अपनी गर्दन हिलाते हुए, वापस आने के लिए अपने कदम बढ़ाए.

मुझे याद है कि उस लड़के ने मेरा हाथ पकड़ लिया था और मैं इतना डर गयी थी कि तुरंत मैंने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया. मेरे चिल्लाने की आवाज सुनकर लॉलीपॉप वाले अंकल आए तो वो आदमी अपनी साइकिल लेकर वहां से भाग गया. मैं रोते रोते घर पहुंची और चुपचाप जाकर मम्मी से लिपट गयी. इस बीच मन ही मन सोच लिया कि आज के बाद कभी अकेले बिना बताये ऐसे नहीं जाउंगी. मुझे यह तो नहीं पता कि उस दिन वह आदमी मुझसे अपना कौन सा काम करवाना चाहता था पर यह जरूर समझ आ गया था कि उस समय लॉलीपॉप का लालच बहुत महंगा पड़ सकता था. इसके बाद बहुत दिनों तक मैंने डर से लॉलीपॉप भी नहीं खाई थी.

उस उमर में भी जाने कैसे मैंने यह बात समझ ली कि अगर मैंने घर पर इस घटना के बारे में बताया तो मेरे इस शौक के लिए यह फायदेमंद नहीं होगा. शायद मुझे इस पर डांट पड़ने और घरवालों की चिंता बढ़ जाने का डर भी था. लेकिन उसी दिन मैंने यह बात भी सीख ली कि इस तरह बिना बताकर किये गए एडवेंचर किस तरह हम पर ही भारी पड़ सकते है. इस घटना ने मुझे एडवेंचर में लाइन ड्रॉ करना सिखा दिया. लॉलीपॉप से मिली चोट ने उस दिन मेरे दिमाग पर हनुमान जी की गदा सरीखा असर किया. अब जब भी कुछ ऐसा करने जैसा होता है तो इस घटना से मिली सीख दिमाग के एक कोने से मुझे फैसले लेने में हमेशा मदद करती है.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.comपर भेज सकते हैं.)