कारोबारी माहौल सुधारने की कवायद में जुटी नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बीते दो साल में  कॉरपोरेट घोटालों में आई यह असाधारण बढ़ोतरी चिंता का सबब होनी चाहिए
आर्थिक विकास की गाड़ी पटरी में लाने लाना केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में है. इसके लिए वह कोशिश कर रही है कि देश में ज्यादा से ज्यादा निवेश आए. लेकिन दूसरी ओर इस कोशिश को पलीता लगाने वाली एक समस्या विकराल हो रही है. दरअसल बीते दो साल में कॉरपोरेट घोटालों की संख्या में करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. एसोचैम का एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये घोटाले भ्रष्टाचार, हवाला, टैक्स चोरी, खातों में हेर-फेर और रिश्वत के रूप में हुए हैं. इस अध्ययन के मुताबिक इन घोटालों से आशंकित अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश करने से हिचक रही हैं.

हर क्षेत्र शिकार

सर्वे के मुताबिक घोटालों का यह प्रेत भारत में कारोबार के हर क्षेत्र पर लगा हुआ है. बीते दो साल के दौरान करीब 52 फीसदी घोटाले रियल एस्टेट और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में हुए हैं. दूसरे नंबर पर वित्तीय सेवा क्षेत्र का नंबर आता है जिसके लिए यह आंकड़ा 34 फीसदी है. इसके बाद दूरसंचार, विनिर्माण और सूचना-तकनीकी हैं. इसमें निजी और सरकारी दोनों ही क्षेत्र शामिल हैं. सामान की खरीद-फरोख्त में घोटाला है तो कर्मचारियों की तनख्वाह में भी. इसके चलते कारोबार के माहौल पर बुरा असर पड़ रहा है.
सर्वे इसकी जड़ में कई कारण गिनाता है. इसमें सबसे प्रमुख यह है कि कंपनियां अपने तंत्र में ऑडिट की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं रखतीं. इसके अलावा शीर्ष प्रबंधन के पास हर फैसले को पलटने की ताकत होती है. इसका स्वाभाविक नतीजा घोटाले के रूप में सामने आता है.

बुरा असर

कोई भी घोटाला उस कंपनी को आर्थिक नुकसान तो पहुंचाता ही है,  इसके बुरे नतीजे इतर भी जाते हैं. इससे उस कंपनी के ब्रांड और छवि को चोट पहुंचती है. कुछ लोगों की करनी से एक दुश्चक्र बन जाता है जो शेयरधारकों को नुकसान पहुंचाता है, निवेशकों का विश्वास हिलाता है, कानूनी मामलों में कंपनी की पूंजी फंसाता है और अगर कंपनी बड़ी हुई तो वित्तीय बाजार में अस्थिरता का सबब भी बनता है.

भविष्य

इस मुद्दे पर भविष्य भी आशंकाओं से भरा ही दिखता है. सर्वे में जिन कंपनियों से बात की गई उनमें से 71 फीसदी ने आशंका जाहिर की कि अगले पांच साल के दौरान भारत में कारोबारी क्षेत्र में होने वाले घोटालों की संख्या बढ़ेगी ही. हालांकि कंपनियों में इस बारे में जागरूकता बढ़ रही है कि वे खुद के भीतर ही एक ऐसी आंतरिक व्यवस्था बनाएं जिससे किसी घोटाले को रोका जा सके. उनका यह भी मानना है कि गड़बड़ियों की खबर देने वालों को प्रोत्साहन और बाहर से ऑडिट करके घोटालों का जोखिम कम किया जा सकता है.
इन घोटालों के चलते सरकार को भी खासी चपत लगती है. दूसरे शब्दों में कहें तो जनता की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इनकी भेंट चढ़ता है. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि 2012-13 के दौरान भारत के राष्ट्रीयकृत बैंकों में घोटालों के 29 हजार 653 मामले सामने आए. इनसे कुल मिलाकर 24 हजार 828 करोड़ रु का नुकसान हुआ.