अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच तनातनी हो, सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव या फिर दक्षिण चीन सागर का विवाद, ये वैश्विक मामले बीते कुछ सालों से लगातार चर्चा में हैं. 2017 में भी ऐसा रहा और यह कहना काफी मुश्किल है कि 2018 में इनको लेकर कोई निर्णायक घटनाक्रम देखा जा सकता है. लेकिन वहीं 2017 के दौरान ऐसी तीन घटनाएं जरूर हुईं जिन्होंने बीते सालों से चले आ रहे एक सिलसिले को तगड़ा झटका दिया और अब इस बात की पूरी संभावना है कि 2018 में इनकी पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण समीकरण बनेंगे-बिगड़ेंगे या फिर इनका असर पूरी दुनिया पर तो देखा ही जाएगा.

नवाज शरीफ के बाद पाकिस्तान की सियासत

नवाज शरीफ की प्रधानमंत्री पद से विदाई ऐसी घटना है जिसका पाकिस्तान के बाद सबसे ज्यादा असर भारत पर भी दिख सकता है. भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने का आरोप सही साबित होने के बाद बीते साल जुलाई में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को राजनीति के लिए अयोग्य ठहरा दिया था. इसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

नवाज शरीफ का इस तरह जाना आने वाले समय में क्यों भारत और पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला है, इसके लिए इस मामले में सेना की भूमिका को समझना भी जरूरी है. पाकिस्तान में अधिकांश जानकारों की एक आम राय है कि शरीफ को पद से हटाने के पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ था. इनके मुताबिक यह काम सुप्रीम कोर्ट के जरिये इसलिए करवाया गया क्योंकि अब संसद ने संविधान के उस अनुच्छेद 52बी को खत्म कर दिया है जिसके तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर सकता है.

पाकिस्तान की न्यायपालिका पर उंगली उठाने के पीछे भी ठोस वजह है. पाकिस्तान के लगभग सभी कानून विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का निर्णय बेहद चौंकाने वाला है क्योंकि पनामा पेपर्स में कहीं भी नवाज शरीफ का नाम नहीं है. इसमें उनके दोनों बेटों और बेटी का नाम है और ये तीनों भी बालिग हैं इसलिए इनके पिता को इनके व्यवसायिक कामकाज के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ये लोग यह भी कहते हैं कि किसी को भी केवल इस वजह से राजनीति से अयोग्य नहीं ठहरा सकते कि उसने अपने एक विदेशी खाते में जमा पैसे की घोषणा नहीं की थी.

शरीफ के खिलाफ सेना के इस रुख के पीछे की वजह उनके और सेना के बीच संबंध अच्छे न होना है. बीते साल कई मंचों पर उन्होंने सेना की आलोचना की थी. एक रैली में उन्होंने यह तक कह दिया था कि करगिल हमला तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को धोखा देने जैसा था. बतौर राजनेता वे बीते समय में कुछ ज्यादा ही ताकतवर भी हो गए थे. चूंकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) भी शीर्ष स्तर पर बदलाव के दौर से गुजर रही है सो इसके चलते शरीफ के सामने कोई मजबूत राजनीतिक विपक्ष भी अब नहीं रहा. जानकारों की मानें तो ऐसे में सेना को डर था कि शरीफ संविधान में बड़े बदलाव कर उसकी ताकत कम न कर दें. इसके अलावा भारत और अफगानिस्तान मामलों पर भी शरीफ का रुख सेना के रुख से मेल नहीं खा रहा था.

पाकिस्तान के कई पत्रकार कहते हैं कि इस मामले से सेना ने एक तीर से दो शिकार किए हैं. एक तो उसने नवाज शरीफ को रास्ते से हटा दिया, दूसरा नेताओं को यह संदेश भी दे दिया कि कोई कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो अभी भी देश की असली सत्ता पाकिस्तानी सेना के हाथ में ही है. और अगर उसके साथ मिलकर नहीं चले तो इसकी कीमत सत्ता के साथ-साथ राजनीति से भी हाथ धोकर चुकानी पड़ सकती है.

सेना के इन इशारों का असर भी देखने को मिला है. इमरान खान जैसे तेजतर्रार नेता भी अब सेना की नीतियों की तारीफ़ करते दिख रहे हैं. अब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्ते सुधारने के कई प्रयासों के बाद भी दोनों देशों के बीच रिश्ते न सुधरने के लिए उन्हें ही कोसते नजर आते हैं. साथ ही अब इमरान पाकिस्तान-तालिबान गुट का खुलेआम समर्थन करते हैं और कट्टरपंथियों की भी हां में हां मिलाने लगे हैं.

भारत और अमेरिका सहित कई देशों की एक और चिंता हाल ही में जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने बढ़ाई है. उसने हाल ही में राजनीति में आने का ऐलान किया है. हाफिज के इस ऐलान के पीछे भी नवाज शरीफ की सियासत से हुई विदाई को वजह माना जा रहा है. जानकारों की मानें तो शरीफ के जाने के बाद पाक सियासत में जो खाली जगह बनती दिख रही है उस पर सईद की नजर हैै. पिछले दिनों लाहौर की एक सीट पर हुए उपचुनाव में जमात-उद-दावा द्वारा बनाए गए राजनीतिक संगठन ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था. यहां उसके प्रत्याशी को पीपीपी से ज्यादा वोट मिले और वह तीसरे नंबर पर रहा.

ऐसे में कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2018 में होने वाले आम चुनाव पाकिस्तानी लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं क्योंकि इसमें उसका सबसे लोकप्रिय नेता नहीं होगा और उसकी जगह हाफिज सईद जैसे लोग मैदान में होंगे.

पाकिस्तान में पिछले काफी समय से नवाज शरीफ को एक ऐसे राजनेता के तौर पर भी पहचान मिल रही थी जो भारत से अच्छे संबंध बनाने की इच्छा रखता था. ऐसे में शरीफ के जाने का भारत की पाक नीति पर सीधा प्रभाव डालेगा.

आईएस के खात्मे के बाद ईराक की चुनौती

साल 2017 जाते-जाते इराक को भी एक बड़ी राहत देकर गया है. बीते दिसंबर में अमेरिकी गठबंधन सेना ने इस्लामिक स्टेट (आईएस) के नियंत्रण वाले आखिरी शहर रावा पर भी अपना कब्जा वापस ले लिया जिसके बाद इराकी प्रधानमंत्री हैदर अल अबादी ने इराक की जमीन से आईएस के सफाए का आधिकारिक ऐलान कर दिया.

साल 2014 में आईएस ने इराक के करीब एक तिहाई हिस्से पर नियंत्रण कर लिया था. तब आईएस सरगना अबु बकर अल बगदादी ने इस इलाके को अपना इस्लामी साम्राज्य और खुद को इस साम्राज्य का ‘खलीफा’ घोषित कर दिया था.

इराकी सेना के लिए अपने दम पर आईएस का मुकाबला करना संभव नहीं था. इसलिए अमेरिका सहित करीब 50 देशों ने एक गठबंधन सेना बनाकर आईएस के खिलाफ अभियान छेड़ा.

2018 के आने से पहले यह अभियान पूरा हो चुका है. लेकिन, इसके बाद भी इराक के सामने तमाम चुनौतियां हैं. तीन साल की लंबी लड़ाई में इराक के मोसुल और रमादी जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ करीब 70 प्रतिशत शहर मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं. इराक और यूएन द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार इराकी सरकार को देशभर में पुनर्निर्माण के लिए करीब 100 अरब डॉलर चाहिए. लेकिन, पिछले सालों में आर्थिक रूप से कंगाल हो चुकी इराकी सरकार के लिए यह पैसा जुटाना बड़ी चुनौती है. आर्थिक मदद को लेकर उसने सबसे पहले अमेरिका की तरफ देखा, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की ओर से साफ़ कर दिया गया है कि इराक को खड़ा करना उनका काम नहीं है.

कुछ जानकार एक और मामले में सतर्कता बरतने की बात कहते हैं. इराक में रह चुके पूर्व ईरानी राजनयिक सादेक खराज़ी एक साक्षात्कार में कहते हैं कि इराकी सरकार को अब सभी को साथ लेकर चलने की जरूरत है. क्योंकि भले ही आईएस खत्म हो गया हो लेकिन अभी उसकी सोच जिंदा है, जो जरा सा भी माहौल बिगड़ने पर फिर बड़ा खतरा बन सकती है.

वे आगे कहते हैं कि अब इराक सरकार की एक बड़ी चुनौती शिया और सुन्नी समुदायों को एकजुट रखने की भी है क्योंकि आईएस के जन्म के पीछे एक बड़ा कारण ही यही था. सादेक के मुताबिक सरकार को कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे सुन्नी आबादी को उनकी अनदेखी का अहसास हो. क्योंकि ऐसा होने पर उनमें असंतोष पैदा होगा जिससे सुन्नियों की नई पीढ़ी फिर आतंक का रास्ता अपना सकती है.

इन सबके अलावा साल 2018 में इराक सरकार के सामने ‘कुर्दिस्तान’ को लेकर एक और बड़ी चुनौती दिख रही है. इराक के उत्तर में स्थित कुर्द बहुल यह इलाका एक अर्द्ध-स्वायत्त क्षेत्र है. काफी समय से कुर्द इस क्षेत्र की आजादी की मांग कर रहे हैं. हाल में यह आन्दोलन और तेज हो गया है. माना जाता है कि कुर्दों के आईएस के खिलाफ लड़ने की एक वजह कुर्दिस्तान की आजादी की उम्मीद भी थी. कई जानकार मानते हैं कि 2018 में यह मसला ईराक के साथ-साथ अमेरिका और यूएन के लिए भी बड़ी समस्या बनने वाला है.

इसमें एक पेंच यह भी है कि अमेरिका की मनाही के बाद पैसे को लेकर इराक सरकार को सबसे ज्यादा उम्मीद अब ईरान और तुर्की से है और ये दोनों ही देश नहीं चाहते कि एक अलग कुर्दिस्तान बने. दरअसल, इन दोनों को डर है कि इससे उनके यहां भी कुर्दों को अलगाव के लिए प्रेरणा मिलेगी. ऐसे में माना जा रहा है कि जब ये ईराक को पैसा देंगे तो कुर्दिस्तान को आजादी न देने की इच्छा जरूर व्यक्त करेंगे.

लेबनानी-अमेरिकी पत्रकार रंदा सलीम कहती हैं कि 2018 में इराकी सरकार के फैसलों से दो बातें साफ़ हो जाएंगी. पहला यह कि उसने 2003 से 2014 के बीच की गई गलतियों से कोई सबक लिया या नहीं, और दूसरा यह भी तय होगा कि अब आईएस के अंत के बाद वह कैसा इराक बनाना चाहती है.

डोनाल्ड ट्रंप का यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करना

अपने विवादित फैसलों से आए दिन चर्चा में रहने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल के अंत में एक और विवादित फैसला लेकर दुनियाभर में खलबली मचा दी. बीते दिसंबर में उन्होंने यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित कर दिया. साथ ही अमेरिकी दूतावास को इजरायल के शहर तेल अवीव से यरुशलम ले जाने का भी आदेश दे दिया.

यरूशलम पर विवाद की जड़ इसका पूर्वी हिस्सा है जिस पर 1967 में युद्ध के जरिए इजरायल ने कब्जा कर लिया था. हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कब्जे को मान्यता नहीं देता और इसका मानना है कि यरुशलम का दर्जा बातचीत के जरिए तय होना चाहिए. वहीं, इस हिस्से में तीन लाख से ज्यादा फिलस्तीनी भी रहते हैं जो चाहते हैं कि जब भी फिलस्तीन एक अलग देश बने तो पूर्वी यरुशलम ही उनकी राजधानी हो.

1995 में इजरायल के मित्र देश अमेरिका के सांसदों ने अपने दूतावास को इजरायल के तेल अवीव से यरुशलम ले जाने की अनुमति देने वाले कानून को मंजूरी दे दी थी. हालांकि 1995 से लेकर अब तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस कानून को मंजूरी नहीं दी. इसका एकमात्र कारण दुनियाभर के मुस्लिम देशों का इसके खिलाफ एकजुट होना और फिलस्तीन और इजरायल के बीच हिंसक टकराव शुरु होने का डर था. लेकिन, बीते दिसंबर में डोनाल्ड ट्रंप ने इसे मंजूरी दे दी.

ट्रंप के इस फैसले का दुनिया के लगभग सभी देशों ने विरोध किया. पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की आम सभा में इसके विरोध में एक प्रस्ताव लाया गया. इसमें ट्रम्प के फैसले को पूरी तरह खारिज करने की बात कही गई थी. अमेरिका ने इस प्रस्ताव के आने से पहले यूएन, उसके सदस्य देशों और नाटो जैसी तमाम संस्थाओं को प्रस्ताव का समर्थन करने पर फंड न देने की धमकी दी थी. इसके बाद भी इस प्रस्ताव के समर्थन में 128 और विरोध में केवल नौ वोट ही पड़े.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई जानकार मानते हैं कि पिछले एक महीने में इस मामले पर जो कुछ भी घटित हुआ वह आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को कई तरह से प्रभावित करने वाला है. इनके मुताबिक इस पूरे मामले पर पहला सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका को ही होने वाला है. इनके अनुसार अभी तक ‘इजरायल-फिलस्तीन’ विवाद के समाधान में सबसे अहम भूमिका में अमेरिका था. खास बात यह थी कि इजरायल के साथ-साथ फिलस्तीन को भी अमेरिका पर पूरा भरोसा था. लेकिन, ट्रंप के फैसले से यह भरोसा खत्म हो गया है. 57 मुस्लिम देशों के संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) में फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के साथ सभी सदस्य देश भी इस बात पर सहमत हुए हैं कि वे अब इस मामले पर अमेरिका की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे.

जानकार कहते हैं कि पिछले कुछ समय से मध्यपूर्व में अहम भूमिका में दिख रहा रूस 2018 के अंत तक इस मुद्दे पर अमेरिका की जगह मध्यस्थ की भूमिका में दिख सकता है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इजरायल को छोड़कर इस क्षेत्र के लगभग सभी देश इस पर आसानी से सहमत हो जाएंगे. इन लोगों की मानें तो ऐसा होने पर विश्व राजनीति की दिशा तेजी से बदलेगी.

इसके अलावा कुछ विश्लेषक डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोपीय देशों को दी गई धमकी का जिक्र करते हुए कहते हैं कि अगर ट्रंप ने नाटो को दी जाने वाली आर्थिक मदद रोक दी तो नाटो का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. ऐसा होने की संभावना काफी ज्यादा है क्योंकि ट्रंप इस मुद्दे को पहले भी उठाते रहे हैं और इस मामले ने उन्हें एक बहाना भी दे दिया है. जानकारों की मानें तो नाटो के कमजोर होने का सीधा फायदा भी रूस को ही मिलेगा.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के कुछ विशेषज्ञ ट्रंप के इस निर्णय के बाद गाजा पट्टी और यरुशलम के आसपास हिंसा में तेजी आने की बात कहते हैं. लेकिन, इनका मानना है कि अप्रत्यक्ष रूप से मध्यपूर्व को इस फैसले का एक फायदा भी हो सकता है. ये लोग कहते हैं कि इससे आपस में झगड़ रहे मुस्लिम देश एक साथ आ सकते हैं. हाल ही में इसके संकेत भी मिले हैं. बताते हैं कि ओआईसी की बैठक में काफी समय बाद किसी मुद्दे पर ईरान, सऊदी अरब और यूएई के सुर एक जैसे देखने को मिले.