देश का वित्तीय घाटा नवंबर में ही बजट के तय लक्ष्य का 112 फीसदी हो गया है. इससे यह आशंका प्रबल हो गई है कि मौजूदा वित्त वर्ष में अब यह पहले से तय लक्ष्य - जीडीपी के 3.2 फीसदी - से ज्यादा ही रहेगा. इससे वित्तीय अनुशासन बनाने और महंगाई कम करने की नरेंद्र मोदी सरकार की कोशिश एक बार फिर नाकाम होती दिख रही है. इन संकेतों के चलते सोमवार को शेयर बाजार में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई.

वित्तीय घाटा आय से ज्यादा खर्च करने के लिए बाजार से ली गई उधारी को कहा जाता है. करीब डेढ़ दशक पहले केंद्र सरकार ने तय किया था कि इसे तीन प्रतिशत के दायरे तक सीमित रखा जाएगा. इससे कम का वित्तीय घाटा होने पर विकास के लिए कम राशि उपलब्ध हो पाती है. दूसरी ओर इसके ज्यादा होने पर महंगाई का खतरा बढ़ जाता है. ऐसा इसलिए कि बाजार में मांग से ज्यादा धनराशि उपलब्ध हो जाती है. इन्हीं वजहों से मोदी सरकार ने तय किया था कि वह वित्त वर्ष 2018-19 तक इस लक्ष्य को पा लेगी.

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार अभी भी यह लक्ष्य हासिल कर तो सकती है. लेकिन लगता नहीं कि वह ऐसा करना चाहेगी. क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार की चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं. एक ओर उसे विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए पैसे चाहिए. दूसरी ओर उसे महंगाई पर भी काबू पाना है. ऐसे में, जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार ने महंगाई पर लोक-लुभावन फैसलों को तरजीह देने का मन बना लिया है.

बताया जाता है कि मोदी सरकार भी अपने आर्थिक प्रदर्शन को लेकर पूरी तरह से सहज नहीं है. ऐसे में यदि उसे दोबारा सत्ता में लौटना है तो ग्रामीण विकास, कृषि, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में खर्च बढ़ाना होगा. यही वजह है कि सरकार ने इस साल तय लक्ष्य से भी 50 हजार करोड़ रुपये ज्यादा खर्च करने का फैसला किया है. इसका परिणाम यह हुआ है कि केवल आठ महीनों में वित्तीय घाटा पूरे वर्ष के तय लक्ष्य 5.8 लाख करोड़ रु के बजाय 6.12 लाख करोड़ रु हो गया है.

इन आठ महीनों में राजस्व घाटा भी 3.2 लाख करोड़ रु के लक्ष्य से 1.6 लाख करोड़ रुपये ज्यादा हो गया है. इसका मतलब यह हुआ कि नरेंद्र मोदी सरकार पैसे उधार लेकर वेतन, पेंशन जैसे मदों पर लक्ष्य से ज्यादा खर्च कर रही है. जानकारों के अनुसार यह कवायद बताती है कि मोदी सरकार दो साल पहले से ही मतदाताओं को खुश करने में लग गई है. यही वजह है पिछले तीन साल में न के बराबर नौकरियां देने वाले विभिन्न सरकारी विभागों से अब हजारों की तादाद में नौकरियों के विज्ञापन निकलने लगे हैं. अभी पिछले हफ्ते रेलवे ने भी बताया है कि वह जल्द ही 65 हजार पदों पर नियुक्तियां करेगा.

जानकारों का यह भी मानना है कि केंद्र सरकार का अगला बजट भी काफी लोक-लुभावन होने वाला है. यह तब होगा जब जीएसटी लागू होने के चलते सरकार का राजस्व 25 से 30 हजार करोड़ रुपये घटने की संभावना है. आर्थिक सुस्ती के चलते प्रत्यक्ष कर में भी करीब 20 हजार करोड़ रुपये की गिरावट आने की आशंका है. इसके अलावा ब्याज और कंपनियों के लाभांश में भी गिरावट देखने को मिल रही है. ऐसे में सरकार के पास केवल विनिवेश के जरिये ही अपनी आमदनी बढ़ाने का रास्ता बचता है. लेकिन जानकारों का मानना है कि आक्रामक विनिवेश के बावजूद बिना खर्च घटाए अगले 16 महीनों में वित्तीय घाटे को तीन फीसदी तक ले जाना असंभव है.

तो अब ऐसे में सरकार वित्तीय अनुशासन को लेकर क्या करने जा रही है? बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक केंद्र सरकार ने अब लगभग यह तय कर लिया है कि मौजूदा वित्त वर्ष में वित्तीय घाटे का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता. इसलिए वह 3.2 फीसदी के मौजूदा लक्ष्य को अगले वित्त वर्ष के लिए तय करने की सोच रही है. वहीं तीन फीसदी के वित्तीय घाटे के लक्ष्य को 2018-19 के बजाय उसके एक साल बाद तय किया जा सकता है.

यानी कि आने वाले समय में हम सरकार द्वारा दिये गये तरह-तरह के उपहारों से खुश तो हो सकते हैं लेकिन महंगाई के मोर्चे पर हमें सतर्क भी रहने की जरूरत होगी. और ब्याज दरों के घटने की संभावना भी अब न के बराबर हो गई है. बल्कि अगर महंगाई थोड़ा काबू से बाहर जाती दिखी तो आरबीआई इसे बढ़ा भी सकता है.