भारत के टाटा ग्रुप की यूरोपीय शाखा ‘टाटा स्टील यूरोप’ और जर्मनी की सबसे बड़ी इस्पात कंपनी ‘थ्यिसनक्रुप’ के बीच विलय की बातचीत डेढ़ साल से चल रही थी. 20 सितंबर 2017 को दोनों ने ऐलान किया कि 2018 बीतने से पहले ही इन दोनों कंपनियों के विलय से एक साझी यूरोपीय इस्पात कंपनी की स्थापना होगी. दोनों के पास इस नयी कंपनी के 50-50 प्रतिशत शेयर होंगे.

साझी कंपनी कैसे चलेगी, इससे संबंधित सारे मामले दोनों पक्ष 2018 की शुरुआत में ही सुलझा लेना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि 2018 के अंत से पहले ही अंतिम सहमति पर हस्ताक्षर हो जायें. दोनों पक्षों की साझी कंपनी भारत के ही लक्ष्मीपति मित्तल की ‘आर्सेलोर-मित्तल’ के बाद यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी होगी.

‘आर्सेलोर-मित्तल’ के यूरोपीय प्रमुख आदित्य मित्तल ने हाल ही में कहा कि उनकी कंसर्न को भी अब इसका कोई जवाब ढूंढना होगा और अपने आप को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना पड़ेगा. थ्यिसनक्रुप और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के विलय से विभिन्न मदों पर होने वाले ख़र्चों में 40 से 60 करोड़ यूरो वार्षिक की बचत होने और 15 अरब यूरो तक की बिक्री-आय होने का अनुमान है.

थ्यिसनक्रुप के कर्मचारी खुश नहीं थे

लेकिन, जर्मनी के विभिन्न शहरों में स्थित थ्यिसनक्रुप के कारखानों और कार्यालयों के 27 हज़ार कर्मचारी इस समाचार से बिल्कुल खुश नहीं थे. बीते सितंबर से ही वे इस विलय के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. विलय या अधिग्रहण सिर्फ अपना विस्तार करने के लिए ही नहीं, अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से ख़र्च घटाने और उत्पादकता बढ़ाने के इरादे से भी होते हैं. इसलिए इन कर्मचारियों को डर था कि विलय के बाद उनकी बड़े पैमाने पर छंटनी हो सकती है, उनकी पक्की नौकरियां भी जा सकती हैं.

थ्यिसनक्रुप के प्रबंधक दो हज़ार कर्चारियों की छंटनी होने की बात कह रहे थे. पर, अधिकतर लोग यही मान रहे थे कि प्रबंधक शुरू में ही सारी सच्चाई तो बताते नहीं, इसलिए नौकरी गंवाने वालों की असली संख्या इससे कहीं अधिक ही होगी. लगे हाथ यह भी हो सकता है कि जर्मनी में 20 जगहों पर फैले कारखा़नों एवं इकाइयों में से कुछ को बंद भी कर दिया जाये.

यूनियन की मांग

थ्यिसनक्रुप के कर्मचारी जर्मनी की जिस धातुकर्मी (मेटल वर्कर) ट्रेड यूनियन ‘आईजी मेटाल’ में संगठित हैं, उसकी मांग थी कि कम से कम एक दशक के लिए कर्मचारियों की नौकरियों, उत्पादन इकाइयों, संयंत्रों आदि को उनके वर्तमान स्थानों पर बनाये रखने और समुचित निवेश की सुरक्षा दी जाये. उनका कहना था कि इस गारंटी के बिना किसी भी प्रकार के विलय को स्वीकार नहीं किया जायेगा. उन्हें राहत मिल गई. 2017 का अंत आने से एक सप्ताह पहले ही, इस मांग को लेकर ट्रेड यूनियन और थ्यिसनक्रुप के प्रबंधकों के बीच संतोषजनक समझौता हो गया. इस समझौते के साथ ही विलय की राह का एक बहुत बड़ा रोड़ा अब हट गया है.

समझौता यह हुआ है कि थ्यिसनक्रुप और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के जिन दो-दो हजा़र कर्मचारियों की छंटनी अनिवार्य समझी जा रही है, वह एकबारगी नहीं, थीरे-धीरे इस तरह होगी कि जो लोग खुद नौकरी छोड़ते हैं या सेवानिवृत्त होते हैं, उनकी जगह भरी नहीं जायेगी. प्रयास यही होगा कि किसी के भी सामाजिक रहन-सहन को विशेष आंच न पहुंचे.

मुख्यालय एम्सटरडम में होगा

दोनों कंपनियों के विलय में कोई नयी बाधा यदि आड़े नहीं आती, तो परिचालन संबंधी कारणों से, सितंबर 2026 तक, किसी की न तो छंटनी होगी और न ही लाभ दे रही कोई उत्पादक इकाई बंद होगी. इतना ज़रूर होगा कि नयी साझी कंपनी का मुख्यालय जर्मनी में नहीं, नीदरलैंड (हॉलैंड) के एम्सटरडम शहर में होगा.

इस समय की तरह आगे भी जर्मन इकाइयों में उत्पादन आदि बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 40 करोड़ यूरो के बराबर निवेश करने का लक्ष्य बना रहेगा. आठ साल की अवधि ट्रेड यूनियन की मांग से दो साल कम ज़रूर है, पर इस्पात के बाज़ार में चीन से मिल रही चुनौतियों को देखते हुए इससे अधिक की गारंटी देना थ्यिसनक्रुप के प्रबंधकों की दृष्टि से संभव नहीं था.

अब यूरोपीय आयोग की हरी झंडी चाहिये

यह समझौता 2018 के अंत से कुछ पहले उस समय से लागू होगा जब विलय के लिए आवश्यक सारी प्रक्रिया पूरी हो जायेगी. यह प्रक्रिया तभी पूरी हो सकती है, जब उसे यूरोपीय आयोग की ओर से भी हरी झंडी मिलेगी. बाज़ारी प्रतियोगिता के हित में एकाधिकारी प्रवृत्तियों पर रोक-टोक लगाने वाले यूरोपीय संघ के अधिकारियों की इस हरी झंडी के बिना थ्यिसनक्रुप और ‘टाटा स्टील यूरोप’ का विलय नहीं हो सकता.

प्रबंधकों और कर्मचारियों की यूनियन के बीच के इस समझौते में यह भी कहा गया है कि थ्यिसनक्रुप का प्रयास होगा कि कम से कम छह वर्षों तक टाटा स्टील के साथ उसकी साझेदारी बनी रहे. दूसरे शब्दों में, थ्यिसनक्रुप को यदि लगा कि टाटा के साथ साझेदारी उतनी सुचारु या लाभदायक ढंग से नहीं चल रही है, जैसी उसे आशा थी, तो छह साल बाद इस साझेदारी का अंत भी हो सकता है.

शेयर बाज़ार में जाने की भी संभावना

इसी प्रकार यह भी संभव है कि इस अवधि में दोनों पक्षों के शेयरों के अनुपात में कुछ फेर-बदल भी देखने में आये और साझी कंपनी नयी पूंजी उगाहने के लिए शेयर बाज़ार में भी जाये. शुरुआत में दोनों पक्षों के पास 50-50 प्रतिशत शेयर होंगे.

इन अनिश्चयों के कारण भी थ्यिसनक्रुप के प्रबंधक अपने कर्मचारियों की नौकरियां पूरे 10 साल तक बनी रहने की गारंटी नहीं देना चाहते थे. ट्रेड यूनियन को भी इस पर विशेष आपत्ति नहीं थी. समझौते में कर्मचारियों के प्रतिनिधियों और कार्यकारी प्रबंधकों की एक ऐसी संयुक्त समिति के गठन का भी प्रावधान है, जो महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार-विमर्श करने के लिए साल में तीन बार बैठकें किया करेगी.

सभी पक्षों को लाभ

थ्यिसनक्रुप के प्रमुख हाइनरिश हीज़िंगर ‘टाटा स्टील यूरोप’ के साथ विलय के सबसे उत्साही समर्थक रहे हैं. ट्रेड यूनियन के साथ समझौते पर पहुंचने को लेकर वे ही सबसे अधिक प्रसन्न भी हैं. उनके शब्दों में ‘यह समझौता एक तरफ़ तो हमें यह संभावना देता है कि साझेदारी की सिनर्जी (सहक्रिया) वाले आर्थिक प्रभावों का हम पूरी तरह लाभ उठायें, और साथ ही दूसरी तरफ़, हम अपनी साझी कंपनी के कर्मचारियों को पक्की नौकरी और अच्छे भविष्य का अवसर भी दे सकें.’

थ्यिसनक्रुप के प्रबंधकों और ट्रेड यूनियन के बीच हुए इस समझौते के अनुमोदन के लिए, 13 जनवरी से दो फ़रवरी के बीच, पूरे जर्मनी में फैले थ्यिसनक्रुप के उन सभी 20 स्थानों पर एक मतसंग्रह होगा, जहां उसके 27 हज़ार कर्चारी काम करते हैं. समझौते का लाभ सबको मिलेगा, पर मतसंग्रह में वोट डालने के अधिकारी लगभग 20,500 वे कर्मचारी ही होंगे, जो ट्रेड यूनियन ‘आईजी मेटाल’ के सदस्य हैं. मतसंग्रह का परिणाम पांच फ़रवरी को घोषित किया जायेगा. सभी यही मान कर चल रहे हैं कि मतदातों का एक बड़ा बहुमत समझौते का समर्थन करेगा.

भारत के लिए भी अलग महत्ता

थ्यिसनक्रुप और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के विलय का इन दोनों कंपनियों के कारोबारी हितों के लिए चाहे जो महत्व हो, एक देश के तौर पर भारत के लिए भी उसकी एक अलग ही महत्ता है. इससे यूरोप में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश जर्मनी में ही नहीं, पूरे यूरोप में भारत की इस छवि को खंडित करने में सहायता मिलेगी, कि भारत के पास दरिद्रता, ग़ंदगी, भ्रष्टाचार और ऊल-जलूल धार्मिक अंधविश्वास देने के सिवाय और कुछ नहीं है.

उदाहरण के लिए, जर्मनी के लाखों बच्चे कैथलिक चर्च के 60 वर्षों से चल रहे ‘स्टे्र्न सिंगर’ अभियान में भाग लेते हुए, जनवरी से, पूरे देश में घर-घर जा कर कुछ गायेंगे और इस बार भारत के उन बच्चों के लिए पैसा दान करने का अनुरोध करेंगे जो बालमज़दूरी करते हैं. इस अभियान को चाहे जितना नेकनीयती और सहानुभूति भरा बताया जाये, उसके पीछे यही धारणा काम करती है कि भारत दरिद्र ही नहीं, इतना अमानवीय भी है कि बच्चों से मज़दूरी करवाता है. यदि हम (ईसाई) कुछ न करें, तो इन बच्चों का भला सोचने-करने वाला कोई नहीं है. साफ है कि जो पैसा कभी भारत जायेगा उसका वितरण भारत के कैथलिक चर्च के माध्यम से ही होगा.

यूरोप के लोगों और उनके सर्वज्ञानी मीडिया को विश्वास ही नहीं होता कि जिस भारत में ‘बच्चे मज़दूरी करते हैं’, ‘गायें आवारा घूमती हैं’ और जिसे ‘विकास सहायता’ देने में हम भारी गर्व से गदगद हो जाते हैं, वहां की कंपनियां इतनी विकसित हैं कि हमारे बड़े-बड़े उद्योग समूहों का भी उद्धार करने लगी हैं! यूरोप के लोग अब तक तो भारत के आईटी धुरंधरों से ही जलते-भुनते थे, अब उन्हें भारतीय मैनेजरों का भी लोहा मानना पड़ सकता है!