भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर का कार्यकाल पूरा होने वाला है. 28 जनवरी को विजय गोखले अगले विदेश सचिव बनने जा रहे हैं. यह बदलाव ऐसे समय में होने जा रहा है जब अगले 16 महीनों में भारत के सभी पड़ोसी देशों (श्रीलंका को छोड़कर) में चुनाव होने हैं. इसकी शुरुआत नेपाल से हो चुकी है जहां बीते साल के अंत में चुनाव हुए थे. वहां केपी ओली ने लेफ़्ट गठबंधन के साथ चुनाव लड़ते हुए सत्ता में वापसी की है. बताया जा रहा है कि इस बार नेपाल में पूर्णकालिक सरकार बनी है जिसके प्रधानमंत्री केपी ओली को भारत-विरोधी और चीन-समर्थक नेता के रूप में जाना जाता है.

उधर, पाकिस्तान में इस साल जून में आम चुनाव होने हैं. हालांकि जानकारों के मुताबिक दोनों देशों के मौजूदा हालात देखते हुए इन चुनावों से कोई ख़ास फर्क पड़ने की उम्मीद नहीं है. उधर, मालदीव में सितंबर में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होगा. उसके साथ भी भारत के रिश्ते अपने सबसे खराब दौर में हैं. चुनाव की क़तार में भूटान भी है. वहां आने वाली गर्मियों में आम चुनाव होने हैं. देखने वाली बात होगी कि वहां की नई सरकार का भारत को लेकर क्या रुख़ रहेगा. वैसे भी डोकलाम विवाद के बाद भूटान को लेकर भारत की चुनौतियां बढ़ गई हैं.

रोहिंग्या संकट से जूझ रहे बांग्लादेश में इस साल के आखिर या फिर 2019 की शुरुआत के दौरान चुनाव होंगे. वहां की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. भारत ने शेख़ हसीना सरकार का काफी समर्थन किया है. इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि बांग्लादेश के चुनावों का दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर क्या प्रभाव रहेगा.

अफ़ग़ानिस्तान में इस साल जुलाई में संसदीय चुनाव और अगले साल अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. उस समय भारत में भी आम चुनाव हो रहे होंगे. यानी एक श्रीलंका को छोड़ दिया जाए तो साल भर के भीतर भारत के सभी पड़ोसी देश चुनावी दौर से गुज़रेंगे. साफ है कि भारत और उसके अगले विदेश सचिव विजय गोखले के लिए अगले 16 महीने काफ़ी अहम और चुनौतीपूर्ण हैं.

नेपाल में असफलता और चीन की चुनौती

नेपाल के मोर्चे पर भारत लगातार चूकता रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि वह नेपाल के लोगों को अपने साथ जोड़ने में असफल रहा है. उधर, चीन लगातार नेपाल से नजदीकी बढ़ा रहा है. रेल से लेकर सड़क तक तमाम मोर्चों पर संपर्क बढ़ाने की उसकी कोशिशें इसकी पुष्टि करती हैं. पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने चीन के साथ बूढ़ी गंडक हाइड्रो परियोजना रद्द कर दी थी. लेकिन नए प्रधानमंत्री केपी ओली ने इसे फिर चीन को देने का वादा किया है.

पाकिस्तान से बदतर होते रिश्ते

पाकिस्तान से भारत के रिश्ते बीते कुछ समय से उतार पर ही हैं. दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही है. हालांकि भारत-पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के किसी तीसरे देश में मिलने की ख़बरें आती हैं, लेकिन इन मुलाक़ातों में होता क्या है इसे लेकर कोई साफ़ तस्वीर नहीं है. इसके अलावा पाकिस्तान को चीन के समर्थन और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत के विरोध ने दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावनाओं को और मुश्किल बना दिया है. पाकिस्तान की तरफ़ से जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की लगातार घुसपैठ के चलते सीमा पर हमेशा तनाव बना रहता है. आतंकवाद दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक बड़ी बाधा है.

मालदीव से आते बुरे संकेत

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन का रवैया भारत को लेकर नकारात्मक है, यह साफ दिखता है. जानकारों के मुताबिक भारत और मालदीव के संबंध अपने सबसे ख़राब दौर में हैं. पिछले दिनों खबरें आईं कि मालदीव की सरकार ने भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा के विपक्षी नेताओं से मिलने पर रोक लगा रखी है. हाल में मालदीव की सरकार ने अखिलेश मिश्रा से मिलने वाले तीन पार्षदों को निलंबित कर दिया था. चीन के साथ मुक्त व्यापार क्षेत्र (एफटीए) समझौते पर हस्ताक्षर करके मालदीव ने पहले से ख़राब चल रहे संबंधों को और ख़राब करने का काम किया.

दूसरी तरफ़, बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान से भारत के रिश्ते बेहतर तो हुए हैं, लेकिन ऐसा भारत की तरफ़ से इन देशों में ऊर्जा सहित तमाम क्षेत्रों में निवेश करने की वजह से हुआ है. भारत बांग्लादेश के साथ सबसे ज़्यादा परियोजनाओं पर काम कर रहा है. 2017 में ही उसने विकास और रक्षा के क्षेत्र में वहां क़रीब 3180 करोड़ रुपये का निवेश करने का प्रस्ताव दिया.

म्यांमार से संबंध बनाए रखने के लिए पिछले हफ़्ते भारत ने रखाइन प्रांत के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए क़रीब 159 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव दिया है ताकि कुछ रोहिंग्याओं को वहां वापस भेजा जा सके. जहां तक भूटान की बात है तो डोकलाम विवाद में उसने अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन यह भी देखने को मिला कि भूटान के ज़रूरी मुद्दों पर भारत बेपरवाह रहा. भूटान के लिए कहा जाता है कि वहां के युवा अब ख़ुद को भारत के नज़दीक महसूस नहीं करते. इसे देखते हुए भारत को वहां काफ़ी काम करना होगा.