नए साल के आगाज के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को एक बड़ा झटका दे दिया है. उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर अपने इस सहयोगी को कड़ी फटकार लगाते हुए उसे दी जाने वाली 25.5 करोड़ डॉलर यानी 1624 करोड़ रुपये की सैन्य सहायता पर रोक लगा दी है. माना जाता है कि यह रोक इसलिए लगाई गई है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में सक्रिय पाकिस्तानी-तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर कड़ी कार्रवाई नहीं कर रहा था जिसके लिए अमेरिका उसे यह सैन्य मदद देता है. लेकिन, कई जानकार इस समय हुई इस कार्रवाई के पीछे की वजह हाफिज सईद को भी मानते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार पाकिस्तान को लेकर अपना रुख बीते साल अगस्त में स्पष्ट किया था. तब उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर वह पाकिस्तान-तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई नहीं करता तो उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे.

लेकिन, इस घटना के एक महीने बाद ही डोनाल्ड ट्रंप के रुख में चौंकाने वाला परिवर्तन देखा गया था. अक्टूबर में पाक सेना द्वारा एक कनाडाई परिवार को हक्कानी नेटवर्क से छुड़ाये जाने के बाद ट्रंप ने पाकिस्तान की जमकर प्रशंसा की थी. उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान द्वारा किए गए इस आपरेशन से पता चलता है कि इस्लामाबाद ने वॉशिंगटन का सम्मान करना शुरू कर दिया है और अब वह इस क्षेत्र को आतंकियों से सुरक्षित रखने के प्रयास में लग गया है. उनका यहां तक कहना था कि यह अमेरिका के पाकिस्तान और इसके नेताओं से बेहतर रिश्ते की शुरुआत है.

इसके बाद माना जाने लगा था कि डोनाल्ड ट्रंप का पाकिस्तान पर रुख नरम हो गया है. लेकिन, बीते सोमवार को उन्होंने एक बार फिर सभी को चौंकाते हुए उसे दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगा दी.

विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो इस बार ट्रंप के इस बदले रुख का सबसे बड़ा कारण लश्कर सरगना हाफिज सईद है. इनके मुताबिक पिछले महीने जब हाफिज सईद की करीब साल भर बाद नजरबंदी खत्म हुई तो इससे सबसे ज्यादा नाराज अमेरिका ही हुआ था. इसके बाद उसने पाकिस्तान से सईद को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाने के लिए भी कई बार कहा. लेकिन, पाकिस्तान ने हर बार इसे नजर अंदाज कर दिया. साथ ही इस मामले को लेकर अमेरिकी प्रशासन तब और खफा हो गया जब हाफिज ने अमेरिका को चुनौती देते हुए सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा कर दी.

जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान यह बात अच्छे से जानता था कि सईद पर कोई करवाई न किए जाने की वजह से ट्रंप प्रशासन उससे नाराज है. यही कारण था कि जब सोमवार की सुबह-सुबह डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की लताड़ लगाने वाला ट्वीट किया तो उसके कुछ ही देर बाद पाक सरकार ने हाफिज सईद के कई संगठनों की फंडिंग पर रोक लगा दी. साथ ही उसने यह बयान भी जारी कर दिया कि सरकार हाफिज के संगठनों की संपत्तियां जब्त करने की योजना बना रही है. लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी. ट्रंप प्रशासन ने शाम होते-होते पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगाने की घोषणा कर दी.

अब पाकिस्तान पर भारी दबाव है

हालांकि, हाफिज सईद के संगठनों की फंडिंग पर रोक लगाने का एक कारण और भी है. पाकिस्तान में इस महीने के अंत में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और अमेरिकी अधिकारियों का एक दल इस बात की जांच करने आएगा कि पाकिस्तान ने अपने यहां स्थित आतंकी संगठनों पर क्या कर्रवाई की है. यह संगठन इस बात की भी समीक्षा करेगा कि इस कार्रवाई का आतंकी संगठनों पर क्या फर्क पड़ा. जानकारों की मानें तो ट्रंप के फैसले के बाद अब पाकिस्तान भारी दबाव में आ गया है और जो माहौल उसके खिलाफ बन रहा है उसमें उसे कई तरह के प्रतिबंधों का डर भी सताने लगा है. ये लोग यह भी कहते हैं कि इस वजह से ही अब हाफिज सईद के खिलाफ और भी कार्रवाई देखने को मिल सकती है.

पाकिस्तान ने हाफिज सईद के जिन संगठनों की फंडिंग रोकी है उनमें सबसे प्रमुख और नामी संगठन ‘जमात-उद-दावा’ और ‘फलह-ए-इंसानियत फाउंडेशन’ हैं जिन्हें यूएन और अमेरिका ने प्रतिबंधित कर रखा है. पाकिस्तान से भी इन संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कई बार कहा गया है. यूएन और अमेरिका दोनों का मानना है कि हाफिज के ये संगठन लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन हैं जो दान-पुण्य की आड़ में आतंकियों को फंडिंग करते हैं.

पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो यूएन के दबाव के चलते पाकिस्तानी सरकार ने हाफिज सदी के संगठनों की जांच तब ही शुरू कर दी थी जब उसे नजरबंद किया गया था. लेकिन, सरकार सेना की वजह से इस मामले पर कुछ भी बोलने से कतरा रही थी. यह भी बताया जाता है कि सेना के कारण ही जांच के आदेश के बावजूद सरकारी एजेंसियां इसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं ले रही थीं. पाकिस्तान में एक आम राय है कि हाफिज सईद की नजरबंदी खत्म होने और उसके राजनीति में आने के ऐलान के पीछे पाकिस्तानी सेना है जो सईद को राजनीति की मुख्धारा में लाना चाहती है. इसीलिए सोमवार को उसके संगठनों की फंडिंग पर रोक लगने के बाद से सरकार और सेना के बीच तनाव बढ़ने की आशंका भी जतायी जा रही है.