अभी बहुत पुरानी बात नहीं है. बीते महीने गुजरात विधानसभा के चुनाव के वक़्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और भारतीय जनता पार्टी के चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तमाम बड़े नेता तमाम धर्मस्थलों में माथा टेकते नजर आ रहे थे. दोनों पार्टियां राज्य में जातीय गुणा-भाग में लगी हुई थीं. धर्म और जाति की समीकरणों की इस रेलमपेल में जिस गुजरात के विकसित मॉडल की दुहाइयां दी जाती थीं वहीं ‘विकास पागल हो गया’ था.

अब कर्नाटक में चुनाव आने वाले हैं. शायद मार्च में हाें क्याेंकि राज्य विधानसभा का कार्यकाल 28 अप्रैल को पूरा हो रहा है. सो यहां भी ‘विकास की गति’ देखिए. वह कैसे धर्म और जाति की संकीर्ण गलियों में दाख़िल होता नज़र आता है. या यूं कहें कि दाख़िल किए जाते हुए दिखता है.

मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस की पैंतरेबाज़ी

बीते साल मार्च में जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य का बजट पेश किया तो वे कह रहे थे, ‘सबका साथ सबका विकास का विचार सही मायने में हम कर्नाटक में अमल में लाए हैं. आने वाले विधानसभा चुनाव में कर्नाटक का विकास मॉडल ही प्रमुख मुद्दा रहेगा. चुनाव के दौरान यह मसला चर्चा का विषय बनने वाला है.’

लेकिन अगले तीन-चार महीने में ही मुख्यमंत्री के सुर बदल गए. जून में धारवाड़ इलाके में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि लिंगायतवाद वास्तव में एक स्वतंत्र धर्म है. अगर समुदाय के लोगों में इस तथ्य पर कोई मतभेद नहीं है तो मैं केंद्र सरकार से इसके पक्ष में अनुशंसा करने को तैयार हूूं.’ बताते चलें कि राज्य में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली लिंगायत समुदाय खुद को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लंबे समय से आंदोलन चला रहा है. और मुख्यमंत्री ने भी इस मांग के बाबत समुदाय के आवेदनों को राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पास भेज दिया है.’

फ़िर जुलाई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने ख़ुद को 100 फीसदी हिंदू बताया. साथ ही अपने नाम की व्याख्या कुछ ऐसे की, ‘मेरा नाम क्या है? मेरा नाम सिद्दा-रामा है. सिर्फ़ भाजपा के लोग ही हिंदू नहीं हैं. मैं भी हिंदू हूं.’ वे कन्नड़ पहचान का मसला भी जोर-शोर से उठा रहे हैं. राज्य का अलग झंडा हो सकता है या नहीं, यह परखने के लिए उन्होंने समिति बनाई है. बेंगलुरू की नम्मा मेट्रो से राष्ट्रभाषा हिंदी साइन बाेर्ड हटवा दिए गए हैं. उनकी जगह कन्नड़ में लिखे बोर्ड लगाए जा चुके हैं. इसी तरह के कुछ कामों से लगातार राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है.

और अब राहुल गांधी कर्नाटक में भी मंदिर-मंदिर माथा टेकने वाले हैं

इसके बाद अब कुछ समय पहले ही ख़बर आई है कि राहुल गांधी गुजरात का प्रयोग कर्नाटक में भी दोहराने वाले हैं. यानी वे यहां भी प्रचार अभियान के दौरान मठ-मंदिरों में प्रमुखता से माथा टेकने जाएंगे. क्योंकि यह फॉर्मूला उन्हेंं फिलहाल तो कामयाब नजर आ रहा है. ख़बरों के मुताबिक़ गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने क़रीब 27 मंदिरों की यात्रा की. ये मंदिर जिन-जिन विधानसभा क्षेत्रों में पड़ते थे उनमें से 18 पर कांग्रेस जीत गई. इसके बाद कहा जा रहा है कि कांग्रेस राज्य में अपने ’अलग ब्रांड के हिंदुत्व’ को चुनाव जीतने का जरिया बनाने जा रही है.

भाजपा की तो पहली पसंद ही ‘धर्म आधारित राजनीति’ है

अब ज़रा भाजपा का हाल देखिए. अभी इसी इतवार को योगी आदित्यनाथ कर्नाटक के दौरे पर थे. वही योगी जो इन दिनों ‘भाजपा के हिंदुत्व’ का मुख्य चेहरा बनते जा रहे हैं. और शायद इसी खूबी के कारण जिन्हें भाजपा ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम उत्तर प्रदेश जैसे सूबे की कमान सौंप रखी है. बताते हैं कि इस दफा तीन सप्ताह के भीतर दूसरी बार योगी कर्नाटक आए थे. पार्टी की परिवर्तन यात्रा के तहत बेंगलुरू में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर सीधा निशाना साधा. वह भी इसलिए कि ये ‘दोनों नेता भी अब ख़ुद को बढ़-चढ़कर हिंदू बता रहे’ हैं.

योगी ने विकास की तमाम बातें कीं. केंद्र और राज्य के विकास के लिए एक ही पार्टी की सरकार की जरूरत बताई. और फिर घूम-फिर कर असल मुद्दे पर आ गए. कहने लगे, ‘हिंदू कोई धर्म नहीं है. इसका किसी जाति या समुदाय से भी कोई लेना-देना नहीं है. हिंदुत्व तो जीवन शैली है. इस जीवन शैली में, इस संस्कृति में गाय का मांस खाना वर्जित है. मैं उनसे (सिद्धारमैया) पूछना चाहता हूं कि अगर वे भी हिंदू हैं तो क्या उनके लिए यह उचित है कि वे गौ-मांस खाने को प्रोत्साहन दें.’ फिर योगी ने लोगों को याद दिलाया कि प्रदेश में भाजपा की सरकार ने गौ-वध और गौ-मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की थी, लेकिन कांग्रेस ने उसका यह प्रयास नाकाम कर दिया.

योगी ताे चलिए कर्नाटक से बाहर के नेता हैं. पर भाजपा की कर्नाटक इकाई के नेता भी इसी धर्म आधारित राजनीति की इसी लाइन पर आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं. उदाहरण के लिए केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े. पिछले महीने ही कर्नाटक के कोप्पल जिले में ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में हेगड़े ने कहा, ‘अगर कोई कहे कि मैं मुस्लिम हूं, ईसाई हूं, लिंगायत हूं या हिंदू हूं तो मुझे खुशी होती है. क्योंकि उसे अपनी जड़ों का पता होता है. लेकिन जो खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं उन्हें क्या कहा जाए मुझे नहीं पता. क्योंकि ये वे लोग हैं जिन्हें अपने पुरखाें का पता नहीं. अपने माता-पिता के बारे में पता नहीं.’

हेगड़े यहीं नहीं रुके. उन्होंने संविधान में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता की भावना पर भी सवाल उठाते हुए उसमें बदलाव की तैयारी का दावा किया. वे बोले, ‘कुछ लोग कहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान में है. आपको उनकी बात माननी होगी. क्योंकि यह संविधान में है. और हम संविधान का सम्मान भी करते हैं. मगर उसमें भी जल्द बदलाव होने वाला है. संविधान इसके पहले भी कई बार बदला गया है. हम (भाजपा) भी उसमें बदलाव के लिए यहां (सत्ता में) आए हैं. हम उसमें बदलाव करेंगे.’ हालांकि बाद में हेगड़े को अपने इस बयान के लिए संसद में माफ़ी मांगनी पड़ी.

यही हेगड़े पिछले साल अक्टूबर में भी सुर्ख़ियों में थे. तब उन्होंने मैसूर के पूर्व शासक टीपू सुल्तान की जयंती पर हुए समारोह में हिस्सा लेने से मना कर दिया था. सिर्फ़ इंकार नहीं उन्होंने बाक़ायदा इस बारे में मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र भेजा. साथ ही इस बारे में ट्विटर पर लिखा, ‘मैंने कर्नाटक सरकार को बता दिया है कि एक बर्बर, कट्टरपंथी और सामूहिक बलात्कारी (टीपू) को महिमामंडित करने वाले कार्यक्रम में मुझे न बुलाया जाए.’ दिसंबर में जब योगी अादित्यनाथ कर्नाटक यात्रा पर आए थे तो उन्होंने टीपू का जिक्र किया था. उन्होंने तब कहा था, ‘अगर कर्नाटक की जनता कांग्रेस को एक झटके में सत्ता से बाहर कर देती है तो यहां टीपू का कोई नामलेवा भी नहीं रहेगा.’

कांग्रेस और भाजपा को जातीय समीकरणों की भी उतनी ही फिक्र है

सिर्फ़ धर्म ही नहीं दोनों प्रमुख पार्टियां जातीय समीकरणों को भी योजनाबद्ध तरीके से साध रही हैं. मिसाल के तौर पर जब कांग्रेस ने पिछले साल पार्टी की प्रदेश इकाई में परिवर्तन किए तो इसकी पहली साफ़ झलक मिली. पार्टी ने प्रदेश इकाई की कमान दलित नेता जी परमेश्वरा काे सौंपी. वहीं लिंगायत नेता एसआर पाटिल को उत्तर कर्नाटक का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया क्योंकि इस इलाके में लिंगायत समुदाय का असर है. इसी तरह वोक्कालिगा समुदाय के नेता डीके शिवकुमार को प्रचार अभियान समिति की कमान दी गई. दक्षिण में वोक्कालिगा समुदाय का ख़ासा असर है.

राज्य के दो ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों में से एक-आर गुंडूराव के पुत्र दिनेश गुुंडूराव को कांग्रेस ने दक्षिण कर्नाटक का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हैं ही. वे कुरुबा (पिछड़े) समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं. इस तरह ऊंची-नीची जातियाें, दक्षिण-उत्तर क्षेत्रों और वोक्कालिगा-लिंगायत जैसे राज्य के सबसे ज़्यादा असरदार समुदायों में से सभी को एक साथ साधने की कोशिश की गई.

इसी तरह भाजपा भी जात-पात की जमावड़े में जुटी है. राज्य में लिंगायत भाजपा का परंपरागत मतदाता माना जाता है. इसलिए उसे अपने साथ बनाए रखने के लिए लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा को उसने काफ़ी पहले ही अपना चेहरा घोषित कर दिया. वहीं पिछड़ों और दलितों को साधने के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री केएस ईश्वरप्पा को लगाया गया है.

कांग्रेस और अन्य दलों के दूसरे जातीय दिग्गजों को भी पार्टी में शामिल करने की कवायद जारी है. इनमें एक बड़ा नाम वोक्कालिगा समुदाय के नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा का है. उन्हें बीते साल फरवरी में भाजपा में लाया गया है. उन्हें अपने साथ जोड़कर भाजपा जातीय के साथ विकास का संदेश देने की भी कोशिश रही है क्योंकि बेंगलुरू आज जिस स्थिति में है उसका काफ़ी-कुछ श्रेय एसएम कृष्णा को दिया जाता है.

यानी कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भूले-बिसरे बातें भले ही विकास की होती रही हों, हो जाती हों पर गुजरात की तरह कर्नाटक में क़रीब-क़रीब तय है कि चुनाव की चकल्लस में यहां भी विकास पागल क़रार दिया जाने वाला है. और राजनीति धर्म-जाति की संकरी गलियों से गुजरते हुए सत्ता तक पहुंचने वाली है.