लालू प्रसाद यादव की पहचान एक ऐसे नेता की रही है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का फायदा उठाना बखूबी आता है. जब वे बिहार की राजनीति में नए-नए उभरे थे तो उस दौर में लोग उन्हें भदेस और असभ्य कहते थे. लेकिन लालू यादव ने इसे अपना एक स्टाइल बना लिया और यादव समाज के बीच न सिर्फ अपनी पैठ बनाई बल्कि समय के साथ इसे मजबूत करते चले गये.

लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो जब भी विपक्ष उन्हें वाजिब मसलों पर भी घेरने का प्रयास करता, वे इसे जाति और वर्ग का रंग दे देते थे. वे कहते थे कि अगड़ी जाति के नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लगती कि पिछड़े वर्ग से आने वाला लालू यादव प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया है. इससे न सिर्फ वे मुद्दे धराशाई हो जाते बल्कि पिछड़ा वर्ग के बीच लालू का समर्थन कुछ और मजबूत हो जाता.

इस शैली में राजनीति करने वाले लालू यादव एक बार फिर सुर्खियों में हैं. बुधवार को चारा घोटाले से जुड़े तीसरे मामले में उन्हें पांच साल कैद की सजा सुनाई गई है. दो अन्य मामलों में उन्हें पांच और 3.5 साल के कारावास की सजा हुई है. फिलहाल वे रांची (झारखंड) की बिरसा मुंडा जेल में हैं. ऐसे में उन्हें होने वाले राजनीतिक नुकसानों की चर्चा तो हर तरफ चल रही है लेकिन उनकी राजनीतिक शैली को जो भी समझते हैं, उनका कहना है कि लालू इस स्थिति का भी फायदा उठा सकते हैं.

सहानुभूति से समर्थकों की गोलबंदी

लालू यादव को सजा होते ही उन्होंने और उनके परिवार व पार्टी के नेताओं ने इसे केंद्र सरकार की बदले की कार्रवाई के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है. राजद नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लालू को ठिकाने लगाने की साजिश में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं. स्थानीय स्तर पर राजद के नेता लालू के समर्थक वर्ग, खास तौर पर यादव और मुस्लिम समाज में, इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और नीतीश कुमार उनके वर्ग के नेता को निपटाकर उनके शोषण की साजिश पर काम कर रहे हैं.

बिहार की राजनीति को जिसने भी करीब से देखा है, उसे यह मालूम होगा कि कुछ खास वर्ग के लोग लालू यादव की बातों पर आंख मूंदकर विश्वास करते हैं. 2015 के विधानसभा चुनावों में भी इसे देखा जा सकता था. जानकारों का कहना है कि ऐसे में लालू यादव अपनी पार्टी के लिए जितने उपयोगी जेल से बाहर थे उससे कम उपयोगी जेल के अंदर नहीं हैं.

सजायाफ्ता होने की वजह से लालू यादव अब चुनाव नहीं लड़ सकते. वे सभा कर सकते हैं. लेकिन इन मामलों में उन्हें जमानत नहीं मिली तो तेजस्वी और तेजप्रताप यादव राजद के समर्थकों के बीच उनकी तस्वीर के साथ सभा करते हुए यह कह सकते हैं कि उनके नेता को साजिश के तहत जेल में डाला गया है. बिहार की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि इसका राजनीतिक फायदा राजद को मिलना तय है.

तेजस्वी और तेजप्रताप यादव का एक जोड़ी के तौर पर उभार

2015 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद जब तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और तेजप्रताप यादव कैबिनेट मंत्री तो उस वक्त यही कहा गया कि दोनों को लालू यादव का बेटा होने की वजह से ये जिम्मेदारियां मिलीं. लेकिन नीतीश सरकार से बाहर होने के बाद दोनों ने अपने-अपने स्तर पर पार्टी और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व देने की कोशिशें की हैं.

तेजस्वी पार्टी के उदार चेहरे की नुमाइंदगी करते हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं तो तेजप्रताप यादव बिहार के अलग-अलग हिस्सों में जाकर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को पार्टी के साथ बनाए रखने और उन्हें उत्साहित रखने के काम में अधिक सक्रिय हैं. राजद के जमीनी कार्यकर्ता खुद को तेजप्रताप से अधिक जोड़कर देखते हैं. उन्हें लगता है कि तेजप्रताप अपने पिता लालू यादव की तरह ही सीधा हमला करते हैं. तेजस्वी के संबोधन में कार्यकर्ता खूब तालियां बजाते हैं और उत्साह दिखाते हैं.

अब तक इन दोनों के बारे में यही माना जाता था कि ये पूरी तरह लालू यादव के कहे पर चलते हैं. लेकिन लालू यादव के जेल जाने के बाद से दोनों ने जिस तरह से अलग-अलग मोर्चों पर आक्रामक रुख अपनाया हुआ है, उससे इनकी छवि एक स्वतंत्र नेता के तौर पर स्थापित हो रही है. लालू यादव के बाहर न होने पर अगर तेजस्वी और तेजप्रताप एक प्रभावी जनसंपर्क अभियान चलाने में सफल हो जाते हैं तो इससे न सिर्फ लालू समर्थक पार्टी से जुड़े रहेंगे बल्कि तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव पूरी तरह से एक स्वतंत्र नेता के तौर पर भी राजद और बिहार में स्थापित हो जाएंगे.