देश के सभी 4041 शहरी निकायों में साफ-सफाई की क्या स्थिति है, इसके आकलन के लिए चार जनवरी से स्वच्छ सर्वेक्षण-2018 शुरू किया गया है. इसे 10 मार्च तक पूरा किया जाना है. उसी महीने के आखिर तक इसके नतीजे घोषित किए जाएंगे. बीते साल केवल 434 शहरों को इस सर्वेक्षण में शामिल किया गया था. इससे पहले 2016 में यह आंकड़ा केवल 73 था. यह दो अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किए जाने के बाद इस तरह का तीसरा सर्वेक्षण है.

स्वच्छ भारत अभियान को मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक माना जाता है. इसके लिए लोगों पर सेवा कर के रूप में आधा फीसदी (0.5%) सेस का बोझ डाला गया. साथ ही, इसके लिए बजट में साल 2014-15 से लेकर अब तक 33,875 करोड़ रुपये आवंटित किए जा चुके हैं. यह अभियान जमीनी स्तर पर कितना सफल रहा है, इसे जानने के लिए ही समय-समय पर स्वच्छ सर्वेक्षण किया जाता रहा है. केंद्र सरकार ने इस सर्वेक्षण की जिम्मेदारी क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) को दी है. इसकी स्थापना 1996 में भारत सरकार और कारोबारी संगठनों जैसे फिक्की और सीआईआई द्वारा की गई थी.

बीते साल तत्कालीन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने स्वच्छ सर्वेक्षण-2017 के नतीजों का ऐलान करते हुए कहा था, ‘मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात से खुश हूं कि 80 फीसदी लोगों ने स्वच्छता में सुधार होने की बात कही है. पिछले दो वर्षों में साफ-सफाई से जुड़े बुनियादी ढांचे और सेवा में प्रगति दिखाई देती है.’ साल 2014 में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत उन्हें स्वच्छ भारत के रूप में सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि दे सकता है.’

उधर, इस सर्वे के नतीजों पर सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वॉयरमेंट (सीएसई) सहित कई संस्थाओं ने सर्वेक्षण के तौर तरीके को लेकर कई सवाल उठाए थे. इनका मानना था कि इनकी वजह से शहरों की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाई है. इन आपत्तियों को देखते हुए सरकार ने इस बार सर्वेक्षण करने के तरीकों और मूल्यांकन पद्धति में बदलाव किया है.

स्वच्छ सर्वेक्षण- 2017 के नतीजे

बीते साल 434 शहरों के 37 लाख लोगों के बीच कराए गए इस सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश के इंदौर और भोपाल ने बाजी मारी थी. इनके बाद शीर्ष के पांच शहरों में विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), सूरत (गुजरात) और मैसूर (कर्नाटक) शामिल थे. चंडीगढ़ को इस साल 11वें पायदान पर ही संतोष करना पड़ा. साल 2016 में वह दूसरे पायदान पर था. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश स्थित गोंडा और महाराष्ट्र के भुसावल को सबसे गंदा शहर बताया गया था.

साभार : पीआईबी
साभार : पीआईबी

सर्वेक्षण का तरीका और इस साल इसमें किए गए बदलाव

स्वच्छ सर्वेक्षण के लिए तीन मानक बनाने के साथ इसके लिए अंक निर्धारित किए गए थे. ये मानक हैं- शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) का कामकाज, क्यूसीआई द्वारा स्वतंत्र मूल्यांकन और नागरिकों की प्रतिक्रिया. इन सभी मानकों के लिए क्रमश: 900, 500 और 600 अंक तय किए गए थे. इस तरह शहरों का कुल 2,000 अंकों पर मूल्यांकन किया गया था.

इस साल मूल्यांकन के लिए निर्धारित अंकों को 2,000 से बढ़ाकर 4,000 कर दिया गया है. साथ ही, नागरिक प्रतिक्रिया और स्वतंत्र मूल्यांकन का वेटेज 35 फीसदी (1400 अंक) और 30 फीसदी (1200 अंक) किया गया है. बीते साल इनका वेटेज क्रमश: 30 और 25 फीसदी था. दूसरी ओर, शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) के कामकाज के लिए निर्धारित वेटेज को घटाकर 45 से 35 फीसदी (कुल अंक- 1400) कर दिया गया है.

स्थानीय शहरी निकाय के कामकाज के मूल्यांकन की बात करें तो इलाके की साफ-सफाई, कचरा इकट्ठा करने और इसके परिवहन के लिए 40 फीसदी वेटेज निर्धारित किया गया था. इस साल इसे घटाकर 30 फीसदी कर दिया गया है. खुले में शौच से मुक्ति के लिए (30) फीसदी, क्षमता निर्माण (पांच फीसदी) और जागरूकता फैलाने (पांच फीसदी) के लिए निर्धारित वेटेज में कोई बदलाव नहीं किया गया है. दूसरी ओर, ठोस कचरे के निपटारे के लिए तय वेटेज को 20 से बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया गया है. इस साल स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए नए तरीकों के लिए ‘अभिनव’ मानदंड बनाया गया है. इसे मूल्यांकन में पांच फीसदी वेटेज दिया गया है.

सर्वे के लिए सभी शहरी निकायों में सर्वेक्षणकर्ता निकाय के दावे की जांच करके इसकी रिपोर्ट क्यूसीआई को देंगे. इनके आधार पर ही इन शहरों को अंक दिए जाने का प्रावधान किया गया है.

सर्वेक्षण पर सवाल

गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वॉयरमेंट (सीएसई) ने स्वच्छ सर्वेक्षण-2017 के तौर तरीकों को लेकर कई सवाल उठाए थे. संस्था का मानना है कि इसमें कचरे का अपने मूल जगह पर रिसाइकल कर इसका फिर से इस्तेमाल करने को प्राथमिकता नहीं दी गई. इसकी जगह ठोस कचरे को इकट्ठा करने और इसे एक स्थान पर जमा करने को वरीयता दी गई. सरकार की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सर्वेक्षण में अव्वल आने वाले शहरों में इन्हीं तरीकों से कचरे का प्रबंधन किया जा रहा है.

दूसरी ओर, पणजी (गोवा) और आलप्पुषा (केरल) जहां कचरे का मूल स्थान पर रिसाइकल कर इसका प्रबंधन किया जाता है, स्वच्छ शहरों की सूची में क्रमश: 90वें और 380वें पायदान पर हैं. साल 2016 में पणजी 16वें पायदान पर था. सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पणजी को स्थानीय निकाय के कामकाज के लिए 900 में से 596 अंक दिए गए थे, जबकि आलप्पुषा को केवल 127. दूसरी ओर इंदौर को 875, भोपाल को 830 और विशाखापट्टनम को 869 अंक मिले हैं. सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि इंदौर और सूरत कचरे के प्रबंधन की समस्या से जूझ रहे हैं. सूरत में प्रतिदिन 1600 मीट्रिक कचरा पैदा होता है और इसे एक जगह इकट्ठा किया जाता है.

बताया जाता है कि सर्वेक्षण में अव्वल आने वाले मध्य प्रदेश जैसे राज्य म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट रूल्स (2016) का पालन नहीं कर रहे हैं. इसके तहत ठोस कचरे को घरेलू स्तर पर तीन हिस्सों- गीला, सूखा और हानिकारक कचरे में बांटने की बात कही गई है. इसके अलावा कचरे के भराव को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाने की बात कही गई है.

उधर, एक सर्वे रिपोर्ट में शहरी स्थानीय निकाय के कामकाज पर ही सवाल खड़ा किया गया है. देश के 250 जिलों में 30,000 लोगों के बीच कराए गए सर्वे में 75 फीसदी लोगों ने माना था कि शहरी निकाय स्वच्छ भारत अभियान को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. साल 2015 में यह आंकड़ा 74 फीसदी था. इसके साथ इसे लेकर आम लोगों में भी उदासीनता की बात सामने आई थी. सर्वे के मुताबिक केवल 34 फीसदी लोगों ने ही स्वच्छता संबंधी नियमों का पालन करने की बात स्वीकार की थी.

सीएसई के अलावा इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट भी सर्वेक्षण के तौर-तरीके पर सवालिया निशान लगाती दिखती है. इसके मुताबिक स्वच्छता एप की वजह से शहरों की रैकिंग में काफी फेरबदल हुए. इंडिया स्पेंड ने सर्वे में शामिल कुल 20 शहरों की स्थिति का विश्लेषण किया है. इनमें से 13 शहरों ने स्वच्छता एप पर मिली लोगों की प्रतिक्रिया के आधार पर 150 में से 85 या इससे अधिक अंक हासिल किए हैं. इनमें से नौ शहरों ने साल 2016 की तुलना में बीते साल औसतन 10 पायदान की छलांग मारी थी. दूसरी ओर, सात शहर जिन्होंने 80 से कम अंक हासिल किए, उनकी रैकिंग में औसतन 36 स्थान की गिरावट दर्ज की गई.

इस श्रेणी में इंदौर और भोपाल ने एक बार फिर बाजी मारी. दोनों शहरों को क्रमश: 120 और 130 अंक मिले थे. दूसरी ओर, 2016 में आठवां स्थान हासिल करने वाले गंगटोक (सिक्किम) को इस श्रेणी में शून्य अंक दिया गया. बीते साल उसे रैंकिंग में 42 पायदानों का भारी नुकसान उठाना पड़ा था. दूसरी ओर, साल 2016 में दूसरे पायदान पर काबिज चंडीगढ़ को एप की श्रेणी में केवल 30 अंक ही मिले.

इन गैर-सरकारी संगठनों के अलावा नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (एनआईयूए) जो केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के तहत आता है, स्वच्छ सर्वेक्षण के उलट शहरों की तस्वीर सामने लाता है. इसके मुताबिक स्वच्छ सर्वेक्षण में शीर्ष शहरों में शामिल भोपाल, पुणे (13वां स्थान), जबलपुर (21वां) और भुवनेश्वर (94वां) में शौचालय जैसी सुविधाओं का अभाव है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा (43वां) और असम के गुवाहाटी (134वां) में ड्रेनेज कनेक्टिविटी सुविधा की कमी बताई गई है.

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले जानकारों का बीते साल के स्वच्छ सर्वेक्षण पर कहना है कि इसमें शहरों की उन कमियों के बारे में नहीं बताया गया है जिनके चते इनकी रैंकिंग में गिरावट आई है. इसके अलावा अव्वल आने वाले शहरों की ऐसी उपलब्धियों को दर्ज किया गया है, जिन पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इनमें शहर के सारे वार्डों में स्वच्छता संबंधी होर्डिंग्स लगाना और दीवारों पर पेन्टिंग्स बनाना जैसे कदम शामिल हैं. जानकार इन्हें जरुरी मुद्दों पर ध्यान देने की वजह गैरजरुरी मदों पर फिजूलखर्जी बताते हैं.

सरकारी आंकड़े भी जानकारों की इस बात की पुष्टि करते हैं. जुलाई, 2016 में सरकार द्वारा संसद में जानकारी दी गई कि वित्तीय वर्ष 2015-16 में स्वच्छ भारत अभियान के तहत कुल 2,560 करोड़ रुपए इसके विज्ञापनों पर खर्च किए गए. इसके अलावा सेस के रूप जनता से उगाही जा रही रकम को भी स्वच्छ भारत कोष में डाले जाने को लेकर सरकार की लापरवाही सामने आई है. महालेखा और नियंत्रक परीक्षक (सीएजी) के मुताबिक बीते दो वर्षों से वसूल किए गए 16,401 करोड़ रुपये में से 4,001 करोड़ रुपये रकम इस कोष में नहीं डाले गए हैं.