लगभग पांच वर्ष पहले जाति से बाभन कहे जानेवाले दो युवा लेखकों ने एक सुंदर प्रयोग किया था. उन्होंने उस समय के एक बहुत ही लोकप्रिय पोर्टल पर दलित समुदायों के प्रति एक सार्वजनिक माफीनामा लिखा था. इन लेखकों ने बाद में पाया कि माफी मांगने के बाद अपने निजी जीवन में भी वे इस अपराधबोध के भार से बहुत हद तक मुक्त हो गए कि उनके पूर्वजों द्वारा दलितों के प्रति किए गए अन्याय के लिए वे भी जिम्मेदार हैं. इन लेखकों ने कथित सवर्ण समुदायों की आज की पीढ़ी से आह्वान किया था कि वे भी अपने-अपने स्तर पर सार्वजनिक उद्घोषणा करते हुए दलितों से माफी मांगना शुरू करें और एक साझे भविष्य की सुंदर संभावना को संभव बनाएं.

लेकिन क्या यह इतनी आसान बात थी? दरअसल निजी रिश्तों में भी माफी मांगकर एक नई शुरुआत करना आसान नहीं होता. डर लगता है कि कहीं हम दोषी या छोटे न साबित हो जाएं. फिर सामाजिक संबंधों में तो ऐसा कर पाना और भी मुश्किल जान पड़ता है. जबकि मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह प्रमाणित हो चुका है कि माफी मांगकर आगे बढ़ने वाले जीवन में ज्यादा खुशी और शांति का अनुभव करते हैं. इससे घटनाओं को तटस्थ होकर देखने का नज़रिया विकसित होता है. अपनी गलतियों को स्वीकारने का आत्मविश्वास आता है. विरोधियों से भी प्रेम करने की करुणा और समानुभूति विकसित होती है. कई प्रकार की असुरक्षाओं और भय से छुटकारा मिलता है.

देखा तो यह भी गया है कि जितनी खुशी और शांति क्षमा मांगने वाले को मिलती है, उससे कहीं अधिक खुशी और शांति क्षमा करने वाले को भी मिलती है. क्षमा मांगने और क्षमा करने के बारे में एक आश्चर्यजनक सच्चाई यह भी है कि यदि सच्चे और शुद्ध हृदय से क्षमा मांगी गई हो, तो ऐसा शायद ही होता है कि वह न मिले. वह मिलती ही है. लेकिन यदि क्षमा करने वाला क्षमा करने के फायदे को जान लेता है, तो वह किसी के बिना क्षमा मांगे ही क्षमा करने की पहल करता है. यह एक भ्रम है कि क्षमा भौतिक रूप से ‘शक्तिशाली’ व्यक्ति को ही शोभा देता है, बल्कि इसे दूसरी तरह से समझने की जरूरत होती है. यानी क्षमा कायर, डरपोक या अनावश्यक असुरक्षाओं से ग्रस्त व्यक्ति कर ही नहीं पाता, वह तो विशालहृदयी और निर्भीक व्यक्ति ही कर सकता है.

इसे एक सच्चे उदाहरण से समझ सकते हैं. 1970 के दशक में एक आदमी न्यूयॉर्क में एक प्रसिद्ध मनोविश्लेषक के पास गया. उसने कहा कि उसके पास सबकुछ है फिर भी वह दुखी और बेचैन है. वह शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है, लेकिन उसे अच्छी तरह नींद नहीं आती. उसे समझ में नहीं आता कि क्या करे. मनोविश्लेषक ने उस व्यक्ति से उसका अतीत जानने की कोशिश की, तो पता चला कि वह एक यहूदी था जिसने 30 साल पहले नाजी यातना शिविर में घनघोर यातना भोगी थी. आज भी जब वह सुबह सोकर उठता तो वह यातना शिविर के गार्ड के प्रति क्रोध, घृणा और प्रतिशोध की भावना से भरा हुआ उठता था. यातना शिविर में उसके परिजनों और दोस्तों के साथ क्या कुछ किया गया वह सब आज भी उसकी आंखों के सामने नाचता रहता था. उसने पूछा- ‘क्या कोई ऐसा रास्ता है जिससे मैं अब भी उस नाजी यातना शिविर से आज़ाद हो सकूं.’

मनोविश्लेषक ने कहा- ‘आप उससे निकल तो सकते हैं, लेकिन जो रास्ता मैं आपको बताने जा रहा हूं वह शायद आपको अच्छा न लगे.’ बहुत पूछने पर उन्होंने बताया कि इसका एक ही रास्ता है और वह है कि आप नाजियों को और हिटलर को पूरे दिल से माफ कर दें.

उस आदमी को बहुत बुरा लगा. उसने चिल्ला कर कहा- ‘नहीं, यह कभी नहीं हो सकता. उन्होंने मेरी आंखों के सामने मेरे परिवारवालों को दरिंदगी के साथ मारा और आप कहते हैं मैं उन्हें माफ कर दूं.’ मनोविश्लेषक को उस आदमी के प्रति पूरी करुणा और समानुभूति थी, लेकिन उसे उसका उपचार भी तो करना था. इसलिए उन्होंने कहा- ‘मैंने तो कहा ही था कि मैं जो रास्ता बताऊंगा वह आपको पसंद नहीं आएगा. लेकिन एक बार सोचकर देखिए कि जो क्रोध और आक्रोश आप अपने भीतर भरकर जी रहे हैं, उसकी कीमत तो आप ही चुका रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि आपको क्या करना चाहिए. मैं तो केवल आपके सवाल का जवाब दे रहा हूं कि उस नाजी शिविर से निकलने का रास्ता क्या है.’

उस आदमी ने कहा- ‘तो क्या मैं उन अत्याचारों की अनदेखी कर दूं? क्या उसे यूं ही छोड़ दूं, भूल जाऊं, जाने दूं?’

मनोविश्लेषक ने कहा- ‘नहीं, मैंने नजरंदाज करने या अन्याय को स्वीकार करने या भूलने के लिए नहीं कहा, मैंने क्षमा करने के लिए कहा. क्षमा करने का मतलब उस ऐतिहासिक आक्रोश और खुद को जलानेवाले क्रोध से बाहर निकलना है, खुद को उससे आज़ाद और मुक्त करना है.’

और आखिरकार बहुत प्रयासों के बाद नाजी यातना शिविर में अकल्पनीय अत्याचार का शिकार होकर किसी तरह जीवित बचे उस व्यक्ति ने 30 साल बाद नाजियों और हिटलर को क्षमादान देने की सार्वजनिक घोषणा की. उसने यातना शिविर में बंधक बनाकर रखनेवाले नाजी सैनिकों का चेहरा याद किया और कहा- ‘जिन लोगों ने यातना शिविर में मुझे भयंकर यातनाएं दीं, वे भी तो उतने ही भयभीत और डरे हुए लोग थे. फर्क केवल इतना था कि उनके पास बंदूकें थीं. और यह भी कि वे अपनी दरिंदगी को ही अपना सुरक्षा कवच या जीने का साधन मान बैठे थे. आज अगर कहीं वे सैनिक जीवित होंगे तो शायद वह दरिंदगी या उससे उपजा शर्म और पश्चाताप उन्हें शांति से जीने नहीं दे रहा होगा. उस शर्म और पश्चाताप से वे स्वयं निपटें, मुझे तो अपने आक्रोश और प्रतिशोध की भावना से निपटना है, और उससे निपटने के एकमात्र तरीके ‘क्षमादान’ को मैंने चुन लिया है. मैं उन्हें क्षमा करता हूं.’

ठीक यही प्रश्न महात्मा गांधी से भी पूछा गया था कि वे जनरल डायर द्वारा किए गए अत्याचार की याद बार-बार क्यों दिलाते हैं? इसपर गांधी ने 16 मार्च, 1921 को यंग इंडिया में लिखा था- ‘इस प्रश्न का उत्तर सीधा है. क्षमा करना भूल जाना नहीं है. यदि आप किसी शत्रु की शत्रुता भूलकर उसे मित्र मानकर प्यार करें तो उसमें कोई खूबी नहीं है. खूबी तो इसमें है कि आप भली-भांति यह जानते हुए भी कि वह आपका मित्र नहीं है, उसे प्यार करें.’ 30 अप्रैल, 1926 को गांधी किसी को एक पत्र में लिखते हैं- ‘“माफी मांगना” और “माफी मिलना” ये दोनों सुंदर वाक्य हैं. मैं इन दोनों का उपयोग करता हूं. लेकिन माफी का सामान्यतः जो अर्थ कर लिया जाता है वैसा नहीं है, ऐसा मैं हमेशा मानता आया हूं. माफी मांगने की हार्दिक स्थिति में हममें नम्रता बढ़ाती है. हम अपने दोष देख सकते हैं और उसमें से अच्छे बनने का बल प्राप्त करते हैं.’

क्षमाशीलता को और स्पष्ट करते हुए, 12 जनवरी, 1928 को ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा- ‘क्षमाशीलता आत्मा का एक गुण है, इसलिए वह एक सकारात्मक गुण है. यह नकारात्मक गुण नहीं है. भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘क्रोध को अक्रोध से जीतो’, लेकिन यह अक्रोध क्या है, यह एक सकारात्मक गुण है. इसका अर्थ है उदारता अथवा प्रेम का सर्वोच्च गुण....यह अवश्य है कि जिस व्यक्ति में प्रेम है वही इसका प्रयोग करेगा. इस प्रेम को अनवरत प्रयत्न द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है.’

हमारे पूर्वजों ने उसको हराया, उसके पूर्वजों ने इसको पछाड़ा, इस तरह की कहानियों का हासिल सामाजिक वैमनस्यता का बढ़ना ही होता है. हमारे सैनिकों ने उस तरफ के इतने सैनिकों को मारा, इसका जश्न मनानेवाले भी आखिरकार इंसानियत के बजाय बर्बरता की ओर ही एक कदम आगे बढ़ रहे होते हैं. हम कस्बों में मनाए जाने वाले कारगिल विजय जुलूस में देखते हैं कि किस तरह वहां के सारे छंटे हुए बदमाश, बेरोजगार और दिशाहीन किशोरों और युवकों की फौज बेमतलब का हुड़दंग मचाते हैं. रामनवमी के जुलूस में तो ऐसे ही लोग लाठी, तलवार, फरसा, भाला और हॉकी-स्टिक तक हास्यास्पद रूप से हवा में भांजते हुए मिल जाएंगे. आजकल मुहर्रम और रामलीला में भी वही सब होने लगा है. इसलिए परमाणु युद्धों के कगार पर खड़ी दुनिया में लोगों को युद्धोत्सवों और विजयोत्सवों को मनाने से परहेज ही करना होगा, भले ही उसका इतिहास कुछ भी रहा हो. आज बड़े और छोटे परमाणु बटन के हवाला देकर राष्ट्राध्यक्ष लोग एक-दूसरे को ऐसी धमकियां दे रहे हैं, मानो वह गली-मोहल्ले में गुल्ली-डंडे का खेल हो.

लेकिन माफी मांगने या प्रायश्चित करने की शुरुआत करेगा कौन? इसकी शुरुआत आक्रांताओं और प्रभुत्वशाली वर्गों-वर्णों और राष्ट्रों की नई पीढ़ियों को ही करनी होगी. पहल करने से कोई छोटा या बड़ा नहीं साबित हो जाएगा. बल्कि सबके हृदय का बोझ हल्का होगा. एक नई शुरुआत के लिए रास्ता खुलेगा. अमरीका वियतनामियों, इराकियों और उन सभी से माफी मांगने की पहल करे जिन पर उन्होंने जबरन युद्ध लादा और तबाही मचाई. ऐसा ही अतीत की अन्य सभी औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी ताकतें भी करें. ऐसे ही श्वेत प्रजाति की नवपीढ़ियां अपने अश्वेत भाई-बहनों से माफी मांगें. इसी प्रकार कथित सवर्णों की मौजूदा पीढ़ियां अपने दलित भाई-बहनों से माफी मांगें और उन्हें सभी प्रकार के दुखों से बाहर निकालने और बराबर का मानाधिकार देने के लिए जो बन सके वह दिल खोलकर करें. अगर लोग आपस में इस उदारता पर उतर आएंगे, तो राजनेताओं और राष्ट्राध्यक्षों को भी रास्ते पर आना ही होगा.

नई पीढ़ियां अपने पूर्वजों के कुकृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन जैसे ही वे अपने पूर्वजों की हार-जीत से खुद को जोड़कर देखने लगते हैं, वैसे ही वे उसमें भागीदार हो जाती हैं. क्या हम चाहते हैं कि अतीत की हार-जीत का हिसाब आज की हमारी पीढ़ियां आपस में लड़-मर कर बराबर करें? हमारे समाज का शोषित और दलित वर्ग नैतिक रूप से एक बहुत ऊंचे धरातल पर खड़ा है, क्योंकि उसने आगे बढ़कर किसी के साथ अन्याय नहीं किया. लेकिन जैसे ही वह अपनी वीरगाथा वाले प्रसंगों को उभारने की कोशिश करेगा, और उसके आधार पर आज की राजनीतिक मिलिटेंसी को बढ़ावा देगा, तो वह भी उसी जाल में फंस जाएगा जिसमें अतीत में और बहुत हद तक वर्तमान में भी उसके ऊपर अत्याचार करने वाले आततायी लोग फंसे थे और हैं.

भारत में, विशेषकर दलितों में, बुद्ध के प्रति बहुद आदर है. बुद्धवाणी में क्षमा मांगने और क्षमा करने पर बहुत जोर दिया गया है. बाबासाहेब डॉ अंबेडकर की पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में जब जीवन की परिपूर्णता प्राप्त करने की पारमिताओं का प्रसंग आता है, तो सुभूति नाम का भिक्षु बुद्ध से पूछता है- ‘बोधिसत्व की शान्ति-पारमिता क्या है?’ इसके उत्तर में तथागत बुद्ध कहते हैं- ‘वह स्वयं क्षमाशील हो जाता है, तथा दूसरों को भी क्षमाशील रहने की प्रेरणा देता है.’ क्या हमारी नई पीढ़ियां ज्यादा वैज्ञानिकता और उदारता का परिचय देते हुए बुद्ध की इस अद्भुत वाणी को अपने व्यवहार से साबित करके दिखाएंगी!