लैंगिक समानता की दिशा में यूरोप के छोटे से देश आइसलैंड ने एक बड़ा कदम उठाया है. उसने एक ही काम के लिए किसी महिला को कम और पुरुष को ज्यादा वेतन देने को अवैध घोषित कर दिया है. वहां के नए कानून के मुताबिक 25 से ऊपर स्टाफ रखने वाली किसी भी कंपनी को सरकार से इसका सर्टिफिकेट लेना होगा कि वह महिलाओं और पुरुषों के वेतन में भेदभाव नहीं कर रही.

आइसलैंड की योजना है कि 2022 तक वह वेतन में होने वाला इस तरह का भेदभाव पूरी तरह से खत्म कर दे. वैसे महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर यह देश पहले ही काफी आगे है. वहां की संसद में करीब 38 फीसदी महिलाएं हैं जिनमें प्रधानमंत्री कैट्रिन जैकब्सडॉटिर भी शामिल हैं. यह आंकड़ा इस लिहाज से वैश्विक औसत से ज्यादा है.

बीते साल विश्व आर्थिक मंच ने कहा था कि कमाई के मामले में महिलाओं और पुरुषों के बीच 58 फीसदी की आर्थिक खाई है. उसके मुताबिक जिस रफ्तार से इस दिशा में काम हो रहा है उसके हिसाब से इस अंतर को पाटने और कार्यस्थल पर बराबर प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए उन्हें 217 साल लगेंगे. माना जा रहा है कि आइसलैंड की पहल बाकी देशों को भी प्रेरित कर सकती है.