विधि आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएस चौहान की मंशा पर ग़ौर कीजिए. उनका कहना है, ‘समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मसले पर हम गंभीरता से विचार कर रहे हैं. विस्तृत सलाह-मशविरे के बाद अगर हमें लगा कि अभी इस बाबत अनुशंसा करने का सही वक़्त नहीं है. या फिर यह देश की एकता के हित में नहीं है तो हम सभी धर्मों के पर्सनल लॉ की समीक्षा की अनुशंसा करेंगे.’

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में जस्टिस चौहान ने कहा, ‘हमें उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट यूसीसी पर बात करेगा. उस पर चर्चा करेगा. इससे पहले कई मामलों की सुनवाई के दौरान बीच-बीच में शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर भी अपनी बात रखी है. शीर्ष अदालत के पांच जजों वाली संविधान में तीन तलाक़ के मुद्दे पर सुनवाई पूरी होने तक हमने इंतज़ार किया. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. इसलिए अब हम अपना काम शुरू कर रहे हैं.’

चौहान ने बताया कि आयोग जल्दी ही इस बाबत धर्मगुरुओं, राजनीतिक दलों और अन्य वर्गों से बातचीत शुरू करेगा. इसमें विभिन्न धर्मों के पर्सनल लॉ में शामिल विवाह, तलाक़, संरक्षा (कस्टडी), उत्तराधिकार आदि से जुड़े नियम-क़ायदों पर चर्चा की जाएगी. सभी धर्मों के परिवार कानूनों (फैमिली लॉ) पर भी फिर विचार किया जाएगा.साथ ही अनुसूचित जनजातियों में प्रचलित परंपरागत कानूनों पर भी ग़ौर किया जाएगा.

यहां फ़िर याद दिलाते चलें कि मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत या एक झटके में तीन बार तलाक़ बोलकर शादी तोड़ देना) की परंपरा को अपराध घोषित करने की केंद्र की पहल पर अब तक सर्वसम्मति नहीं बनी है. इससे संबंधित विधेयक राज्य सभा में अटका है. मुस्लिम समुदाय इसे अपने मज़हबी मामलों में दख़ल बता रहा है. इस माहौल में विधि आयोग की तैयारी एक नए विवाद को हवा दे सकती है.