हमें यहां आए बामुश्किल आधा घंटा गुजरा है, लेकिन इतनी ही देर में हमें अहसास हो चुका है कि बाहर से आने वाले किसी व्यक्ति के लिए यहां इससे ज्यादा देर तक ठहरना मुश्किल है. यह अहमदाबाद का सिटिजन नगर है. इस जगह को मुस्लिम संगठनों ने समुदाय के उन लोगों के लिए बसाया था जिनके घर-बार 2002 के गुजरात दंगों के दौरान छिन गए थे. लेकिन अपनी बिखरी जिंदगी को समेटने की कवायद में यहां रहने आए करीब सवा सौ परिवार नहीं जानते थे कि समाज के मन के बाद घरों का मैल उनकी बची जिंदगी को एक अभिशाप बना छोड़ेगा.

सिटिजन नगर अहमदाबाद के जिस इलाके में पड़ता है उसे बहरामपुरा या पिराना भी कहा जाता है. इस इलाके में एक लाख के करीब आबादी रहती है. पिराना में 1980 के बाद से अहमदाबाद शहर और उसके आस-पास के इलाकों का कचरा इकठ्ठा किया जाता रहा है. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 के मुताबिक ऐसा कोई भी डंपिंग लैंडफिल यानी कचरा इकट्ठा करने की जगह आवासीय स्थलों से कम से कम 200 मीटर दूर होनी चाहिए. लेकिन पिराना लैंडफिल अपनी क्षमता से तीन से चार गुना ज्यादा बढ़कर सिटिजन नगर के घरों तक आ पहुंचा है.

इस डंपिंग क्षेत्र के आकार की बात करें तो यहां करीब 75 फीट ऊंचे कचरे के तीन बड़े टीले हैं जो लगभग 200 एकड़ क्षेत्र में फैले हैं. इनमें से हर टीले का वजन करीब 69 लाख मीट्रिक टन है. अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (एएमसी) आज भी तकरीबन 4700 मीट्रिक टन कचरा यहां रोज छोड़ता है. दूर से पहाड़ों के किसी समूह जैसे दिखते ये टीले आकार में रोज बढ़ रहे हैं. यहां लाए जाने वाले कचरे में सड़ चुके खाने, जानवरों के शव, गटर की गंदगी, प्लास्टिक, सिथेंटिक, खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और मेडिकल सामग्री के अलावा फैक्ट्रियों के रासायनिक कचरे तक शामिल होते हैं.

इन टीलों पर यहां-वहां कचरे के जलते ढेर आपको हमेशा दिख जाएंगे. इनकी वजह से इलाके में हरदम धुआं रहता है. छोटे ढेरों में लगी यह आग कई बार इतनी बढ़ जाती है कि इस पर काबू पाने में प्रशासन को कुछ घंटों से लेकर कई दिन भी लग जाते हैं. बीते साल अप्रैल में यहां लगी ऐसी ही आग को बुझाने में लगभग तीन दिन लगे थे. जानकार बताते हैं कि इस तरह के कचरे में आग लगने से कई जहरीली गैसें हवा में फैलती हैं जिनमें मीथेन, सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन डाई ऑक्साइड प्रमुख हैं.

इन गैसों से शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को आप इससे समझ सकते हैं कि यहां पहुंचने के कुछ ही देर में हमारे गले और सीने में जलन और सिर में दर्द होने लगा. जब कुछ मिनट में हमारा यह हाल है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले पंद्रह साल से सिटिजन नगर में रह रहे लोगों की हालत क्या होगी जिनमें नवजात शिशुओं और बच्चों के साथ बुजुर्ग भी शामिल हैं.

जब हमने यहां के लोगों से इस बारे में बातचीत करने की कोशिश की तो उनमें से कई चाहकर भी अपनी समस्याएं सिर्फ इसलिए विस्तार से साझा नहीं कर पाए कि बोलते समय उनकी सांस हद से ज्यादा फूल रही थी. बुजुर्ग महिला सायरा बी हांफती आवाज में कहती हैं, ‘धमाल (दंगों) के बाद से यहां रहना पड़ रहा है. तभी से खांसी, दमा, बुखार जैसी बीमारियां घेरे हुए हैं. तकलीफ इतनी है कि अक्सर पूरी रात जागकर ही काटनी पड़ती है.’

यहां रहने वाले हनीफ शेख बताते हैं कि इलाके में सबसे ज्यादा मरीज अस्थमा, टीबी, खराब गुर्दे और कैंसर के हैं. हनीफ की अम्मी को अस्थमा है. करीब दो साल पहले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से आए कुछ छात्रों ने इस क्षेत्र का सर्वे किया था जिसमें उन्होंने हर घर से कम से कम एक शख्स को किसी गंभीर बीमारी की चपेट में पाया. यहां के 40 घरों पर आधारित एक अन्य सर्वे रिपोर्ट की मानें तो अभी तक इन परिवारों के 19 लोग गुर्दे (किडनी) खराब होने की वजह से असमय मौत के मुंह में जा चुके हैं.

रियाना बानो बार-बार उस घड़ी को कोसती हैं जब वे दंगों की वजह से बेघर हुई थीं. वे कहती हैं, ‘हम नहीं जानते थे कि यहां रहने की कीमत हमें हमारे बेटे की जान से चुकानी होगी.’ वे आगे बताती हैं, ‘यहां बसने के कुछ ही महीनों के भीतर मेरे बेटे के हाथ-पैरों में टेढ़ापन आ गया. इससे उसका चलना-फिरना बंद हो गया. सालभर खाट में पड़े रहने के बाद उसकी किडनी खराब हो गई और वह चल बसा.’ वे आगे जोड़ती हैं, ‘ जैसे-तैसे उस सदमे से उभरे तो कुछ ही दिन पहले पता चला कि मेरे पति के गुर्दे भी जवाब दे चुके हैं. पैसे नहीं होने की वजह से इस जगह को भी नहीं छोड़ सकते, अब तो कोई मौत के मुंह में छोड़ आए तो बेहतर होगा.’

शहरी कचरे के अलावा यहां फैक्ट्रियों की तरफ से बेखौफ फेंके जा रहे तैलीय रासायनिक अवशिष्ट और उनके जलने से उठने वाला धुआं भी यहां के लोगों को परेशान करता है. पास ही बैठी अफसरा बानो कहती हैं, ‘मेरे शौहर ड्राइवर हैं, लेकिन धुएं की वजह से उनकी आंखें खराब हो गईं. घर में वे इकलौते कमाने वाले थे. अब न तो बच्चों की पढ़ाई करवा पा रहे हैं और न ही उनकी बीमारी का इलाज.’

गुजरात की एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्था की तरफ से कुछ समय पहले पिराना में करवाए गए अध्ययन पता चला था कि हवा और पानी के अत्यधिक प्रदूषित होने की वजह से यहां की अधिकतर महिलाओं को गर्भपात और समय से पहले प्रसूति (प्रीमैच्योर डिलिवरी) जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इस समस्या से पीड़ित परिवारों के मुताबिक अव्वल तो इस तरह के नवजात ज्यादा जी नहीं पाते और यदि बच जाएं तो कमजोर या अपंग रह जाते हैं.

इस विषैले वातावरण के बच्चों पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर स्थानीय निवासी मेमन फिरोज बताते हैं कि प्रदूषित मिट्टी में खेलने की वजह से यहां के अधिकतर बच्चों के पैरों में छाले पड़े हुए हैं. जलते ऑयल के नजदीक पतंग उड़ा रहे अपने बेटे की तरफ इशारा करते हुए फिरोज कहते हैं, ‘चाहे जितना मना करो, बच्चे नहीं मानते और वहां खेलने की वजह से आए दिन बीमार रहते हैं. स्कूल से कई-कई दिन नदारद रहने के कारण वे अपने साथियों से पिछड़ जाते हैं और उनके मन में हीन भावना घर करने लगती है.’

यहां के लोगों की समस्याएं देखते हुए इंसाफ फाउंडेशन नामक सामाजिक संगठन चला रहे कलीम सिद्दीकी ने पिछले साल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. सिद्दीकी का कहना है, ‘सरकार ने 1989 में कचरा प्रबंधन को लेकर एक गाइडलाइन बनाई थी. इसके तहत किसी भी लैंडफिल के बनने के 20 साल गुजर जाने के बाद अगले पांच सालों में या तो उस कचरे को नष्ट किया जाएगा या फिर उस लैंडफिल को शिफ्ट किया जाएगा. इस तरह पिराना की समस्या का हल 2000 से 2005 के बीच हो जाना चाहिए था, लेकिन अगले दो साल में पिराना लैंडफिल को दूसरे 20 साल होने वाले हैं और प्रशासन ने इसकी सुध नहीं ली है.’

लैंडफिल से जुड़े अन्य नियमों की बात करते हुए सिद्दीकी आगे कहते हैं, ‘प्रावधान है कि लैंडफिल में 10 सेंटीमीटर कचरा डालने के बाद उस पर इतनी ही मिट्टी डाली जाए, पानी के निकास के लिए नालियां बनवाईं जाएं, डंपिंग क्षेत्र के चारों तरफ बाड़ाबंदी की जाए ताकि कोई अनाधिकृत जानवर या इंसान यहां दाखिल न हो सके आदि. यदि प्रशासन इन नियमों को लेकर थोड़ी भी संजीदगी दिखाए तो भी लोगों की परेशानियां काफी हद तक कम हो सकती हैं. लेकिन यहां सालों से नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और कोई पूछने वाला नहीं है.’

यहां से चुने गए नुमाइंदे भी लोगों की परेशानी से किस हद तक बेपरवाह हैं यह बताते हुए सिद्दीकी कहते हैं, ‘क्षेत्र से 16 काउंसलर चुनकर एएमसी में भेजे जाते हैं. लेकिन 2015 में एक आरटीआई के जरिए हमें पता चला कि साल 2000 के बाद से किसी भी काउंसलर ने पिराना मुद्दे को बोर्ड मीटिंग में नहीं उठाया है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘जब पिराना को लेकर दबाव बढ़ने लगा तो एएमसी ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि यह बस्ती गैरकानूनी है. लेकिन वे लोग भूल गए कि कॉर्पोरेशन शुरुआत से ही यहां के निवासियों से रिहायशी कर वसूल करता आ रहा है जो इसके वैध होने का सबूत है.’

गुजरात की राजनीति में फ़िरक़ापरस्ती के प्रभाव का ज़िक्र कर सिद्दीकी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘यहां रहने वाले लोग दबे-पिछड़े दलित और मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं इसलिए सरकार का ध्यान इनकी तरफ नहीं जाता है. यदि यही समस्या प्रभावशाली पाटीदारों के किसी गांव के नजदीक होती तो क्या सरकार अब तक चुप रहती? ’

सिद्दीकी के मुताबिक उनकी याचिका के बाद जब अदालत ने एएमसी और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांगा तो म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का कहना था कि पिराना लैंडफिल के निदान के लिए उसे 374 करोड़ रुपए की जरूरत है.’ वे सवाल करते हैं, ‘जो सरकार एक फैक्ट्री के लिए 33 हजार करोड़ रुपए दे सकती है क्या उसके पास सिटिजन नगर सहित बहरामपुरा के सवा लाख लोगों के लिए इतने रुपए भी नहीं हैं? लेकिन सवाल नीयत का है.’ उनका इशारा गुजरात सरकार की तरफ से प्रदेश में टाटा मोटर्स के (नैनो प्लांट के) लिए उपलब्ध करवाई गई सब्सिडी की तरफ है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि पिराना के बाद इस डंपिंग एरिया के दुष्प्रभाव शहर के दूसरे हिस्सों को भी अपनी जद में लेने लगे हैं. इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूर्व विधानसभा क्षेत्र मणिनगर भी शामिल है. पर्यावरण विभाग द्वारा 2015 में गठित एक कमेटी की रिपोर्ट के हवाले से स्थानीय लोगों का कहना है, ‘इस कचरे के पहाड़ की वजह से भूमिगत जल तेजी से प्रदूषित हो रहा है. धीरे-धीरे इसका असर अब साबरमती नदी पर भी पड़ने लगा है.’ मिली जानकारी के अनुसार इस रिपोर्ट को 16 मार्च 2017 को गुजरात विधानसभा में रखा जा चुका है.

हैरत इस बात की है कि हम उस राज्य के एक प्रमुख शहर में खड़े हैं जिसके विकास मॉडल की दुहाई पिछले कई सालों से पूरे देशभर में दी जा रही है. हैरत इसलिए भी है कि ताउम्र दबे-पिछड़ों की पैरवी करने वाले महात्मा गांधी ने जिस अहमदाबाद में एक लंबा समय गुजारा था वहां का प्रशासन और सरकार ऐसे हजारों लोगों के जीने के अधिकार को पूरा करने में कई वर्षों से लगातार नाकाम रहे हैं. अचरज इस बात का भी है कि जोर-शोर से स्वच्छता अभियान की शुरुआत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महामारी को न्यौता दे रहे कचरे के इन पहाड़ों की भनक कैसे नहीं पड़ी, जबकि पास ही की मणिनगर सीट से जीतकर वे तीन बार विधानसभा पहुंचे थे. आलोचकों के मुताबिक दसियों हजार लोगों की जिंदगी को बजट की दुहाई देकर उसी अहमदाबाद में नारकीय बना दिया गया है जहां कुछ ही महिने पहले बुलेट ट्रेन जैसी महंगी परियोजना शुरू करने के साथ सी-प्लेन जैसा गैरजरूरी चुनावी स्टंट किया गया था.

सिटिजन नगर के लोग तो दोहरी त्रासदी झेलने को मजबूर हैं. 2002 में हुए दंगों के इन पीड़ितों के लिए वर्तमान अतीत से कम बड़ी त्रासदी नहीं है.