किसी ठोस नतीजे के अभाव में विश्व के सात सबसे उन्नत देशों का शिखर सम्मेलन ऐसे महंगे आयोजनों की सूची में एक और की बढ़ोतरी भर बनकर रह गया.
आल्प्स पर्वतों की मनोहारी दृश्यावली. जर्मनी के बवेरिया प्रांत का लोकलुभावन सांस्कृतिक परिवेश. सुरक्षा के लिए 17 हज़ार पुलिसकर्मी. उनकी कृपा से वैश्वीकरण-विरोधी प्रदर्शनकारियों का शोरगुल एल्माउ महल वाले सम्मेलन-होटल से चार किलोमीटर पहले ही गुल. मीडिया कर्मियों की भीड़ 20 किलोमीटर दूर एक प्रेस सेंटर में कैद. तब भी शिखर सम्मेलन की मेज़बान और जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल की मानें तो सुंदर वातावरण, बढ़िया खाने, दिलचस्प वार्ताओं और प्रसन्नचित्त अतिथियों ने सम्मेलन की सफलता में कोई कमी नहीं रहने दी.
लेकिन जानकारों की राय इससे जुदा है. उनके मुताबिक कुल 36 करोड़ यूरो लगा कर जर्मनी ने खोदा तो था पहाड़, लेकिन परिणाम के नाम निकली सिर्फ़ चुहिया. चांसलर मेर्कल अपने लिए उसे वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता मान सकती हैं, पर दुनिया के लिए वह अपने ढंग के अनेक महंगे शिखर सम्मेलनों की पांत में केवल एक और की बढ़ोतरी ही कहलाएगा.
जर्मनी और फ्रांस के दबदबे वाले यूरोपीय संघ में अंततः होता वही है, जो 'बिग ब्रदर' अमेरिका चाहता है. सुनने में आया है कि सबसे अधिक अमेरिका ही चाहता है कि रूस को जी-7 से परे रखा जाये.
जी-7 शिखर सम्मेलन मूल रूप से अमेरिका और उसके घनिष्ठ मित्र देशों कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और जापान का गुट है. यह उन समस्याओं और संकटों पर विचार करने के लिए साल में एक बार बैठक करता है जिनका इन देशों की नजर में भारी अंतरराष्ट्रीय महत्व है. सम्मेलन के निर्णय न तो किसी संधि-समझौते जैसे बाध्यकारी होते हैं और न ही वैसा कोई औपचारिक महत्व रखते हैं. हर शिखर सम्मेलन इन देशों के मुखियाओं के स्तर पर ऐसे अनौपचारिक विचार-विमर्श का काम करता है, जो विभिन्न मुद्दों पर एक जैसी नीति अपनाने या किन्हीं भावी संधियों-समझौतों पर पहुंचने का मार्ग प्रशस्त कर सके.
तेल-संकट के बीच पड़ी थी शिखर सम्मेलन की नींव
इस परंपरा का जन्म 1970 वाले दशक के भारी तेल-संकट के बीच 1975 में पेरिस से 50 किलोमीटर दूर राम्बुये प्रासाद में हुआ था. जन्मदाता थे तत्कालीन जर्मन चांसलर हेल्मुट श्मिट और फ्रांसीसी राष्ट्रपति वालेरी जिस्कार दएस्तां. 1976 में कनाडा और 1998 में रूस को भी इस गुट में शामिल कर लिया गया. लेकिन, 2014 में रूस को यह कह कर इससे निकाल बाहर कर दिया गया कि वह पूर्वी यूक्रेन के रूसी भाषी इलाकों में अलगाववाद को हवा दे रहा है और क्रीमिया का अपने भीतर विलय कर अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की अनदेखी कर रहा है. जबकि मूल समस्या यह थी कि यूरोपीय संघ के देश यूक्रेन को जल्द से जल्द अपने संघ में, और अमेरिका उसे अपने सैन्य गठबंधन नाटो में घसीटना चाहता था, ताकि वहां रूस की नाक के नीचे परमाणु रॉकेट तैनात किये जा सकें.
कुल मिलाकर मेर्कल ने इस बात में कोई संदेह नहीं रहने दिया कि यूक्रेन जी-7 के देशों का लाड़ला है और रूस के साथ विवाद में वे पूरी तरह यूक्रेन के साथ हैं.
यूक्रेन और रूस सदियों से एक-दूसरे के साथ इस तरह जुड़े रहे हैं कि रूस पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन के लगभग अपहरण का मूक दर्शक बना नहीं रह सका और उसने लगे हाथ क्रीमिया को यूक्रेन से छीन लिया. तब से अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से खार खाये बैठे हैं. चांसलर मेर्कल कुछ भी कहें, एल्माउ शिखर सम्मेलन का काफी बड़ा समय रूस को कोसने-धिक्कारने की ही बलि चढ़ा.
नाम लिये बिना रूस को लताड़ा
रूस का नाम लिये बिना, जिसे यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप को हथिया लेने की सज़ा के तौर पर 2014 में तब तक की जी-8 वाली अभिजात बिरादरी से बहिष्कृत कर दिया गया, चांसलर मेर्कल ने इस पत्रकार सम्मेलन में कहा, 'निश्चय ही क़ानून के राज, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और क्षेत्रीय अखंडता के आदर जैसी बातें भी वे चीज़ें हैं, जो हमें जोड़ती हैं.'
उनके इन शुरुआती वाक्यों से ही संकेत मिल गया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एल्माउ में भले ही नहीं थे, लेकिन उनका भूत वहां सबके सिर पर फिर भी सवार था. 'यूक्रेन के प्रश्न पर भारी सहमति थी,' जर्मन चांसलर ने बल देकर स्पष्ट किया. 'अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को तोड़ते हुए क्रीमिया के (रूस में) विलय की हम एकस्वर से निन्दा करते हैं.' उन्होंने यह भी संकेत दिए कि जरूरत पड़ने पर रूस के खिलाफ लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधो को और भी कड़ा किया जा सकता है. कुल मिलाकर मेर्कल ने इस बात में कोई संदेह नहीं रहने दिया कि यूक्रेन जी-7 के देशों का लाड़ला है और रूस के साथ विवाद में वे पूरी तरह यूक्रेन के साथ हैं.
'इस शिखर सम्मेलन में रूसियों ही नहीं, चीनियों और भारतीयों को भी होना चाहिये. ये दोनों राष्ट्र भी इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि यदि हम दुनिया को व्यवस्थित करना चाहते हैं, तो उन्हें बहुत देर तक बाहर नहीं रख सकते.'
उल्लेखनीय है कि जर्मनी के इस समय जीवित पिछले तीनों चांसलर – हेल्मुट श्मिट, हेल्मुट कोल और गेरहार्ड श्रौएडर – किसी न किसी बहाने, कई बार कह चुके हैं कि यूक्रेन को 2014 के आरंभ में यूरोपीय संघ और नाटो में घसीटने का जो 'नौसिखुआपन' दिखाया गया, उसका वही परिणाम होना था जो आज सबके सामने है. तीनों का मत है कि रूस को अलग-थलग करके यूक्रेन तो क्या, यूरोप की किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं निकल सकता. लेकिन यूरोपीय मीडिया और राजनेता इन तीनों वयोवद्ध पूर्व चांसलरों को सठिया गया मान कर उनकी बातों पर कान नहीं देना चाहते. मीडिया तो उनका मखौल ही उड़ाता है. इसलिए तटस्थ किस्म के प्रबुद्ध लोगों में यह धारणा बल पकड़ रही है कि जर्मनी और फ्रांस के दबदबे वाले यूरोपीय संघ में अंततः होता वही है, जो 'बिग ब्रदर' अमेरिका चाहता है. सुनने में आया है कि सबसे अधिक अमेरिका ही चाहता है कि रूस को जी-7 से परे रखा जाये.
पूर्व चांसलर श्मिट ने भारत की वकालत की
पूर्व चांसलर 96 वर्षीय हेल्मुट श्मिट ने एल्माउ शिखर सम्मेलन के पहले ही दिन सात जून को, जर्मनी के सर्वाधिक बिक्री वाले दैनिक 'बिल्ड त्साइटुंग' के साथ एक भेंटवार्ता में कहा, 'हम अनदेखी कर जाते हैं कि रूस और पश्चिमी यूरोप के बीच मौजूदा तनाव के लिए पुतिन अकेले ही ज़िम्मेदार नहीं हैं. ...इस शिखर सम्मेलन में रूसियों ही नहीं, चीनियों और भारतीयों को भी होना चाहिये. ये दोनों राष्ट्र भी इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि यदि हम दुनिया को व्यवस्थित करना चाहते हैं, तो उन्हें बहुत देर तक बाहर नहीं रख सकते.'  इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि बीते अप्रैल में जर्मनी के सार्वजनिक टेलीविज़न नेटवर्क 'एआरडी' के एक कार्यक्रम में हेल्मुट श्मिट ने शायद पहली बार खुल कर माना कि 1974 से 1982 तक जब वे जर्मनी के चांसलर थे, तो उन्हें भी कई बार अपने मन के विरुद्ध अमेरिका की ठकुरसुहाती करनी पड़ी थी.
कहने की जरूरत नहीं कि वर्तमान चांसलर अंगेला मेर्कल भी, जिनका मोबाइल फोन तक अमेरिका की गुप्तचर एजेंसियां सुनती रही हैं, अमेरिका की ठकुरसुहाती करने से मुक्त नहीं मानी जा सकतीं.
कहने की जरूरत नहीं कि वर्तमान चांसलर अंगेला मेर्कल भी, जिनका मोबाइल फोन तक अमेरिका की गुप्तचर एजेंसियां सुनती रही हैं, अमेरिका की ठकुरसुहाती करने से मुक्त नहीं मानी जा सकतीं. एल्माऊ में जब एक पत्रकार ने उनसे मोबाइल फ़ोन वाली बात पूछी, तो वे टका-सा जवाब देकर बात टाल गयीं. उनसे यह भी सवाल किया गया कि क्या चीन, ऑस्ट्रलिया और भारत जैसे देशों को मिला कर जी-7 का विस्तार करने का समय आ नहीं गया है. इस पर उन्होंने जो कहा उसका मजमून यह था कि उनके लिए जी-20 के रूप में एक दूसरी व्यवस्था है ही. मेर्कल का कहना था, 'हम जी-7 की कार्यप्रणाली से बहुत संतुष्ट हैं और उस के माध्यम से बहुत सारे काम करने की सोच रखे हैं. वे तब शायद बहुत अलग दिखाई पड़ते, जब भारत भी साथ होता. लेकिन, भारत के लिए उसका अपना विकास एजेंडा इससे कहीं अधिक प्रधानता रखता है कि हम अफ्रीका के लिए क्या कर सकते हैं.'
निरे विकास की जगह गुणवत्ता को प्रमुखता
जर्मन चांसलर का कहना था कि विभिन्न देश अपने विकास का ढर्रा अब बदल रहे हैं. निरे विकास और विकास की राह के बदले गुणवत्ता का सवाल अहम होता जा रहा है. उनका कहना था कि चीन सहित सभी देश अब पहले की तुलना में धीमी विकास दर के साथ बढ़ रहे हैं. इसलिए, विकास गति ही अब जी-7 की सदस्यता की कसौटी नहीं रही. उन्होंने यह कहा तो नहीं, किंतु हल्का-सा इशारा जरूर किया कि एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते चीन की अपेक्षा भारत जी-7 के देशों को अधिक स्वीकार्य हो सकता है. फ़िलहाल इन देशों का समझना है कि भारत अभी अपनी राह तय करने में ही व्यस्त है. चांसलर के उत्तर से यह पता नहीं चलता कि यह सब उनके अपने विचार हैं या शिखर सम्मेलन में इस विषय पर कोई चर्चा हुई थी.
उन्होंने यह कहा तो नहीं, किंतु हल्का-सा इशारा जरूर किया कि एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते चीन की अपेक्षा भारत जी-7 के देशों को अधिक स्वीकार्य हो सकता है.
शिखर सम्मेलन की 21 पृष्ठों की समापन घोषणा में भारत का नाम कहीं दिखायी नहीं पड़ता. पर, भारतीय उपमहाद्वीप के तीन देशों का उल्लेख अवश्य मिलता है-- बांग्लादेश, नेपाल और अफ़ग़ानिस्तान का. ढाका के पास राणा प्लाज़ा बिल्डिंग के अप्रैल 2013 में ढह जाने से 1100 से अधिक जो लोग मारे गए – मुख्यतः विदेशी कंपनियों के लिए कपड़े सिलने वाली महिलाएं – उनके लिए राहत और क्षतिपूर्ति के वादे अभी तक निभाए नहीं गये हैं. मेर्कल ने शिखर सम्मेलन की समापन घोषणा का उल्लेख करते हुए कहा, 'अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के साथ मिल कर वे तीन करोड़ यूरो अब उपलब्ध करवाए जा सकते हैं, जिन्हें राणा प्लाज़ा दुर्घटना के पीड़ितों और उनके परिजनों को देने का वादा किया गया था. हम इस बात का भी प्रयास कर रहे हैं कि 'विज़न ज़ीरो फंड' नाम से वह कोष भी बन सके जो काम करने की बेहतर परिस्थितियों के निर्माण के लिए होगा.' इस समापन घोषणा में भूकंप से तबाह हुए नेपाल को हर तरह की आपातकालीन व पुनरनिर्माण सहायता देते रहने का आश्वासन दिया गया है.
अंगेला मेर्कल की निजी सफलता
विश्लेषकों, विशेषकर पर्यावरण से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस सम्मेलन में हुए एक ही फैसले को किसी हद तक ठोस कहा जा सकता है. वह है इस बात पर सहमति कि वैश्विक औसत तापमान को औद्योगीकरण के जन्मकाल यानी 18वीं सदी के उत्तरार्ध के समय के तापमान की तुलना में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने दिया जा सकता. जापान और कनाडा अंतिम क्षण तक इसका विरोध करते रहे, पर आखिरकार मान गए. इसे और इस सहमति को भी कि 2050 तक कोयले और तेल जैसे कार्बनडाई ऑक्साइड उत्सर्जक ईंधनों का उपयोग लगभग पूरी तरह बंद हो जाना चाहिये, जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल की निजी सफलता बताया जा रहा है. यह भी तय हुआ है कि चालू सदी के दौरान ही विश्वव्यापी स्तर पर जीवाश्म ईंधन (यानी गैस, तेल, कोयला)  मुक्त अर्थव्यवस्था संभव बनायी जानी चाहिये.
जानकारों, खासकर पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस सम्मेलन में हुए एक ही फैसले को किसी हद तक ठोस कहा जा सकता है.
अपने पत्रकार सम्मेलन में चांसलर मेर्कल ने बताया कि जलवायु-परिवर्तन से पीड़ित होने वाले विकासशील व ग़रीब देशों की सहायता के लिए जी-7 देश '2020 से हर साल 100 अरब डॉलर सरकारी या निजी तौर पर उपलब्ध करवाएंगे.'  उनका कहना था कि दिसंबर 2015 में पेरिस में जो अगला संयुक्त राष्ट्र जलवायुरक्षा सम्मेलन होने वाला है, उसके लिए बहुत से विकासशील और द्वीप-देश तभी पेरिस जायेंगे, जब उन्हें विश्वास हो जायेगा कि जी-7 जैसे उन्नत देश उनकी सहायता हेतु भावी कोष के लिए यह धन देंगे. 2020 तक इन देशों के 40 करोड़ लोगों को एक ऐसी बीमा-योजना के अधीन लाने का भी लक्ष्य है, जिन्हें मौसम की मार से क्षतिपूर्ति की जरूरत पड़ेगी.
लुभावनी घोषणाएं, आधे मन से काम
पर्यावरण संबंधी इन कुछ निर्णयों को छोड़ कर प्रेक्षक बाकी सारी बातों को दृढ़ निश्चय से ज्यादा जी-7 देशों की सदेच्छा ही मानते हैं. हालांकि पर्यावरण की रक्षा से जुड़े वे लक्ष्य भी, जो आज डंके की चोट घोषित किये जा रहे हैं, 2020, 2050 या इस सदी के अंत तक अटल रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. अतीत में इस इस तरह की बहुत-सी घोषणाएं अब व्यतीत हो चुकी हैं. जी-7/जी-8 शिखर सम्मेलनों के 40 वर्षों का इतिहास बताता है कि विकासशील देशों में ग़रीबी और भुखमरी और उन्नत देशों में ऊर्जा संकट, मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी जैसी समस्याएं, अरब-इसराइली युद्ध और आतंकवाद और इस बीच पर्यावरण और जलवायु जैसी समस्याएं ही बार-बार विचार-विमर्श का विषय होती रही हैं. हर बार लगभग एक जैसी समापन घोषणाएं सुना दी जाती हैं, जिन पर बाद में एक जैसे ही आधेमन से काम होता है. हर कुछ वर्षों पर सरकारें बदल जाती हैं और नयी सरकारें पिछली सरकारों के वादों से अक्सर मुकर जाती हैं. इस बार भी 2020 या 2050 तक न जाने कितनी सरकारें बदलेंगी और वादे भुला दिये जायेंगे.