भुवनेश्वर में दो दिनों के साहित्य-समारोह में भाग लेने का अवसर मिला जिसका शीर्षक था: ‘कलिंग मिस्टिक’. केकी दारूवाला के साथ मैंने इस आयोजन का उद्घाटन किया. साहित्य की ज़रूरत पर हमने कुछ कहा. मुख्य आकर्षण था उसके बाद हुआ सत्र जिसमें सद्गुरु के साथ अंग्रेज़ी कवयित्री अरुन्धती सुब्रमण्यम की खुली बातचीत थी. आम तौर पर आज के आध्यात्मिक नेताओं में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि उनमें से अधिकांश बहुत पीछे ले जाने वाली राजनीति, अपराधकर्म और सस्ते बाज़ारूपन से जुड़े दीखते हैं. सद्गुरु से बातचीत के दौरान हम औपचारिकतावश बैठे रहे. वे एक ज़िन्दादिल मुखर व्यक्ति लगे जो खुलेपन से बातचीत करते हैं: आधुनिक जीवन की कई व्याधियों (कष्ट) की उनकी शिनाख़्त अचूक है और वे कोई समाधान सुझाने के बजाय हरेक को समाधान ख़ुद खोजने-पाने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्होंने पते की एक बात यह भी कही कि तथाकथित स्वर्ग एक कपोलकल्पना है और जो कुछ होना है इसी इहलोक में होना है. बाद के फल की प्रत्याशा निराधार होती है. उनकी बातचीत सुनने जो भीड़ आई थी उसने पूरा बड़ा सभागार भर दिया. उसके बाद वह साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म आदि के सत्रों में एक तिहाई भर पाया. इसमें सन्देह नहीं कि साहित्य और ज्ञान से अध्यात्म अधिक लोकप्रिय है.

जैसे कई बार लगता है कि साहित्य अपने आप में विचार, अपने आप में राजनीति, अपने आप में सामाजिक कर्म है वैसे ही वह अपने आप में अध्यात्म भी है. उसे अलग से आध्यात्मिक होने की ज़रूरत नहीं है. साहित्य का एक ज़रूरी काम हमें बृहत्तर सचाई से जोड़ना है: उसका हिस्सा होने का एहसास कराना और उस सचाई में सभी के एक-दूसरे से जुड़े होने का एहसास कराना होता है. साहित्य हमें यह बोध भी देता है कि हम सभी, फिर स्त्री-पुरुष, प्रकृति, नदी-पर्वत अन्य प्राणी और पशुपक्षी आदि सभी एक दूसरे के लिए ज़िम्मेदार हैं. इस ज़िम्मेदारी में जो कमी-कटौती आजकल हर रोज़ हो रही है साहित्य उसकी चेतावनी भी हमें देता है. साहित्य की बुनियादी नैतिकता इस बृहत्तर (विशाल) बोध से उपजती और आकार लेती है. यह नैतिकता अपने चरित्र और संरचना में आध्यात्मिक कही जा सकती है. वह विराग का नहीं राग का अध्यात्म है. वह संसार को अस्वीकार करने का नहीं उसे स्वीकार कर, उसे बदलने और उसके विकल्प की संभावना को सजीव रखने का अध्यात्म होता है. जैसे अध्यात्म में कल्पना और स्वप्नशीलता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वैसे ही वे साहित्य में भी निभाती है. संसार को बदलने और दिए हुए के बरक्स विकल्प की तलाश अपने मूल में आध्यात्मिक ही हैं. सच्चे अध्यात्म की तरह साहित्य भी अस्तित्व के मौलिक प्रश्नों, मानवीय नियति की चिन्ता, परिवर्तन की संभावना से सरोकार रखता है.

साहित्य का सौभाग्य यह है कि उसका आंगन इतना कचरे से नहीं भर गया है जितना हमारे समय में अध्यात्म का. उस कचरे को साफ़ करने की कोशिश कम ही नज़र आती है.

समान्तर साहित्य उत्सव

27-29 जनवरी 2018 को, जब जयपुर साहित्य उत्सव चल रहा होगा तब जयपुर में ही भारतीय भाषाओं के साहित्य पर केंद्रित समान्तर साहित्य उत्सव का आयोजन होगा जो राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ की देखरेख में सम्पन्न होगा. यह एक अच्छी और समयानुकूल पहल है. यह सही है कि इन दिनों भारत के अनेक शहरों जो लिटफ़ेस्ट आयोजित होते हैं वे ‘साहित्य और कलाओं को मनोरंजन में बदल’ रहे हैं और वहां ऐसे लोग भी प्रस्तुत किए जाते हैं जिन्हें किसी भी तरह से लेखक या बुद्धिजीवी नहीं माना-कहा जा सकता. अक्सर ऐसे लोग लोकप्रिय अभिनेता, मसखरे, कारोबारी आदि ही होते हैं जिनकी साहित्य की दुनिया में कोई जगह न है और न ही उनकी चकाचौंध-भरी प्रस्तुतियों से बन पाती है. इसके बचाव में यह कहा जा सकता है कि उन्हें देखने, अक्सर देखने अधिक सुनने कम, जो भीड़ आती है वह साहित्‍य के सत्रों में भी रमती रहती है. पर यह संदिग्ध ही है कि इस युक्ति से साहित्य और कलाओं के व्‍यापक रसास्वादन में कोई बढ़ोतरी होती है. बल्कि इस तर्क में बल होगा कि इस कारण साहित्य और कलाओं को गंभीरता से लेने के बजाय अधिकांश दर्शक-श्रोता उनसे सनसनी, उत्तेजना आदि की अपेक्षा करने लगते हैं.

साहित्य, ऐसे में, अक्सर रायशुमारी जैसा हो जाता है. सभी जानते हैं कि हम साहित्य के पास उसके रचयिता की राय या विचार के लिए नहीं उसके द्वारा चरितार्थ सचाई का एहसास करने जाते हैं. यह तर्क भी दिया जा सकता है कि सचाई या सच सिर्फ़ साहित्य तक महदूद (सीमित) नहीं होता: उस पर राजनीति, मीडिया, सिनेमा, दर्शन आदि में भी अन्वेषण होता है और उनके लिए जगह बनाना ग़लत नहीं है. यह साहित्य और कलाओं के दायरों को इतना फैलाना है कि वे दायरे ही न रह जाएं. अगर भाषा में जो कुछ होता-लिखा जाता है वह सभी साहित्य है तो फिर साहित्य की अपनी इयत्ता (हद) समाप्त ही हो जाएगी. ऐसा कोई इरादा लिटफ़ेस्ट के उत्साही आयोजक निश्चय ही न रखते होंगे पर उनके किए का यह एक दुखद प्रतिफल ज़रूर हो सकता है और इससे बेख़बर रहना अबोधता नहीं मूर्खता होगी.

यह भी सोचने की ज़रूरत है कि साहित्य किसी शून्य या सीमित परिधि में जन्मता-सांस लेता-बढ़ता-फैलता नहीं है: उस पर समाज में और स्वयं व्यक्ति के भीतर सक्रिय अनेक शक्तियों और तत्वों का प्रभाव-दबाव पड़ता है. इसलिए साहित्य के समारोह में उनको भी जगह देने का कुछ औचित्य ज़रूर बनता है. पर वह जगह ऐसी-इतनी तो नहीं हो सकती कि साहित्य की जगह पर वे बेजा क़ब्ज़ा कर बैठें जैसा कि अक्सर लिटफ़ेस्टों में होता आया है.

बजाय कोई सत्ता संगठन या कारोबारी समूह ऐसा साहित्य समारोह आयोजित करे, बहुत अच्छा है कि यह ज़रूरी पहल लेखक मिलकर कर रहे हैं- उनका एक संगठन कर रहा है. उन्हें साहित्य-समाज का भरपूर भौतिक और नैतिक समर्थन मिलना चाहिए. उन्हें भी इसका ध्यान रखना होगा कि यह प्रगतिशील वफ़ादारों का सम्मेलन बनकर न रह जाए- उसमें वैचारिक असहमति और सच्ची बहुलता की जगह और सम्मान होना चाहिए. यह आसान नहीं है पर जिस मुक़ाम पर आज हम हैं उसमें यह नैतिक और रणनीतिक दोनों एक साथ होगा.

माचवे शती

प्रभाकर माचवे की जन्मशती हुई है और उन्हें याद करने के कई कारण हैं. एक तो यह कि वे अपनी पीढ़ी के सबसे विचित्र लेखक थे. उनमें व्यंगबोध, विडम्बना की पकड़, अथक प्रयोगशीलता आदि सब थे. उन दिनों यह प्रवाद (बात जो लोगों में फैली हो पर जिसके ठीक होने का निश्चय न हो) चलता था कि वे हिन्दी में मराठीभाषी हैं और मराठी में हिन्दीभाषी. उनका विवाह गांधीजी ने कराया था और नेहरू आदि उनको जानते थे. उनके पास प्रायः हर विषय की सूचनाओं का अपार भण्डार था- उन्हें मज़ाक़ में सूचना-मार्तण्ड भी कहा जाता था. कविता के अलावा उन्होंने उपन्यास, कहानी, आलोचना, व्यंग्य आदि अनेक क्षेत्रों में काम किया. उनके एक उपन्यास ‘परन्तु’ में एक चरित्र किसी पार्क में अख़बार पढ़ने बैठ जाता है तो पूरा अख़बार ही कम से कम उसका एक पृष्ठ उपन्यास में पूरा उद्धृत हुआ था. वे एक हिन्दी अख़बार के संपादक भी हुए: उसमें पुरानी परम्परा को छोड़कर, जिसके अन्तर्गत संपादकीय में हमेशा ‘हम’ का प्रयोग होता था, वे एक वचन ‘मैं’ का प्रयोग करते थे. वे धाराप्रवाह बोलते थे जिसमें ‘फ्री असोसिएशन’ से काम लेते थे और विषय से विषायान्तर में जाना उनके लिए आसान और आम बात थी.

माचवे जी ने अपने मित्र शमशेर के उकसाये सानेट भी लिखे. एक, थोड़ा सा याद है, जिसका शीर्षक था ‘अ-मानते’. उसमें यह कहा गया था कि बहुत सारे बौद्धों को कई बौद्ध, बौद्ध नहीं मानते, कई कम्युनिस्टों को दूसरे कम्युनिस्ट, कम्युनिस्ट नहीं मानते. उसी रौ (गति) में समापन कुछ ऐसे होता है कि ‘मानता हूं तो निज को कवि बहुत सारे मित्र नहीं मानते.’ अपना मज़ाक़ भी जब-तब बना लेते थे. उन्होंने कई लेखकों की मदद भी की जिनमें शमशेर, मलयज आदि शामिल थे. कई संस्थाओं से उनका संबंध था जिनमें साहित्य अकादेमी, भारतीय भाषा परिषद् शामिल हैं. उन्होंने विदेश में अतिथि अध्यापन भी कुछ अरसे किया था. उनका कई पीढ़ियों और कई भाषाओं के मूर्धन्यों से घनिष्ठ संवाद था. हम कुछ युवा लेखकों ने जब सागर से ‘समवेत’ नाम से एक पुस्तक-पत्रिका निकाली थी तो माचवे जी ने उसके लिए एक कविता दी थी.

उन दिनों एक प्रलाप यह भी चलता था: मैथिली शरण गुप्त राष्ट्रकवि, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उपराष्ट्र कवि, हरिवंशराय ‘बच्‍चन’ परराष्‍ट्रकवि, प्रभाकर माचवे महाराष्ट्र कवि, भवानी प्रसाद मिश्र, सौराष्ट्र कवि, धर्मवीर भारती धृतराष्ट्र कवि! माचवे जी की षष्ठिपूर्ति पर शमशेर ने उन पर एक कविता लिखी थी जिसके कुछ अंश याद किए जा सकते हैं. इसमें स्वयं माचवे जी की एक पंक्ति ‘तुम सम शेर लिखे को, जट्टा’ पर ही बन्द बांधे गए हैं:

जट्टे! बहुत गुनी मह्रहट्टा!!

लाय सहस पद एक झपट्टा!!!

प्रतिभा में गुरु!... प्रथम आधुनिक

कवि होना भी है क्या ठट्ठा?

एक-एक पद में देखे हैं

सौ-सौ छन्द-प्रकार इकट्ठा.