पांच गीतों वाले ‘पैडमैन’ के एलबम का सबसे खूबसूरत गीत आखिर में आता है. उससे पहले आने वाले गीतों में सबसे पहले ध्यान खींचने वाला गीत टाइटल ट्रैक ‘द पैडमैन सांग’ है. ‘सुपरहीरो हाय हाय हाय’ जैसी दिलचस्प हुक लाइन के साथ शुरू होने वाले इस गीत को देखने में मजा आता है, क्योंकि दिखाई गईं सिचुएशन के साथ इसका बखूबी मेल होता है. लेकिन सुनने में गीत फीका है और न इसका अरेंजमेंट दिलचस्प है न ही मीका की गायकी. एलबम के सारे गीतों की लेखिका कौसर मुनीर की लेखनी भी शुरुआत में ही समां बांध पाती है और जल्द ही इसके पास अपने नायक की प्रशंसा करने के नायाब तरीके खत्म हो जाते हैं.

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ये जरूर है कि शुरुआती अंतरे में जब कौसर मुनीर अपने हीरो के जमीनी काम की तारीफ करने के लिए सुपरहीरोज की टांग खींचते हुए लिखती हैं, ‘बिल्डिंग से हाई जंप न मारे, नीचे से डायलॉग न मारे, हाई स्पीड में नाचे गाए ना’ तो सीधे याद उन अक्षय कुमार की आती है जो एक जमाने में ये सारे ही बेसिरपैर के काम खूब किया करते थे! लेकिन आज वे इतने तप चुके हैं कि परिपक्व किरदार सरलता से कर रहे हैं और उनकी यह खूबी अनजाने ही यह गीत हमारी नजर कर देता है.

रोमांटिक गीत ‘हूबहू’ अमित त्रिवेदी के घर का गीत है. ‘एक मैं और एक तू’ के पहले से लेकर ‘क्वीन’, ‘शानदार’ जैसी अनेक फिल्मों में हमारी ऐसे गीतों से मुलाकात हो चुकी है और अमित त्रिवेदी अपने सबसे ज्यादा जाने-पहचाने अंदाज में इसे गाते भी हैं. इसलिए ‘हूबहू’ कोई असर नहीं छोड़ता, और फिल्म में भी शर्तिया ही अक्षय व सोनम कपूर के अनकहे प्यार की सिचुएशन को भरने मात्र के लिए उपयोग किया जाएगा. फिल्मी प्रेम-गीतों के सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले टेम्पलेट का एक बेहद आलसी गीत.

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निर्देशक आर बाल्की ने अपने करियर में पहली बार इलैयाराजा की जगह ‘पैडमैन’ के लिए उस कंटेम्पररी युवा संगीतकार का हाथ पकड़ा है जिसे उनकी पत्नी गौरी शिंदे बेहद पसंद करती हैं (‘इंग्लिश विंग्लिश’ और ‘डियर जिंदगी’) और जो बेसुरा सुनने की आदी वर्तमान पीढ़ी को सुर-साज-संगीत के मायने समझाने में सबसे सफल रहा है. लेकिन बदकिस्मती से अमित त्रिवेदी और बाल्की दोनों ने ही हाथ कम कस के पकड़े हैं. ‘पैडमैन’ में दो जहीन गीतों के अलावा इसीलिए बुझा-बुझा संगीत ज्यादा सुनाई देता है.

इन दो में से दूसरा बेहद कर्णप्रिय और तमीज से लिखा गया गीत ‘आज से तेरी’ है. ओंकार धूमल की शहनाई से शुरू हुए इस गीत को अरिजीत सिंह ने हाई पिच पर जाने से पहले बातचीत करने वाली पिच में भी अति सुंदर गाया है और वे न जाने किस पानी के गरारे करते हैं कि हद से ज्यादा गीत गाने के बाद भी उनकी गायकी इस कदर ताजा बनी हुई है. उनकी आवाज की मिठास बिना नागा दिल पिघलाती है और यह बात पक्की है कि उनपर किसी का तो करम है. वरना इस घोर बाजारू समय में हर दूसरा-तीसरा गीत गाने के बावजूद अपनी आवाज की पवित्रता को सहेज पाना आसान नहीं!

‘आज से तेरी’ की दूसरी खासियत कौसर मुनीर का लेखन है. संकेत नाइक की बढ़िया बजाई ढोलक के बावजूद प्रेम-गीतों के स्पेस की अमित त्रिवेदी रचित इस जैनेरिक कम्पोजीशन पर उन्होंने इतने बढ़िया शब्द और इमेजरी जड़ी है कि आनंद आ जाता है. खासकर वो अंतरा जिसमें नायक कहता है, ‘तू बारिश में अगर कह दे जा मेरे लिए धूप खिला, तो मैं सूरज को झटक दूंगा’ सुनकर रूमानियत से रोम-रोम पुलकित हो जाता है! कौसर ने ‘बिजली का बिल’ व ‘पिन कोड का नम्बर’ जैसे सस्ते एक्सप्रेशन से जल्दबाजी में गीत सुनने वालों को भी कूल लिरिक्स देकर साधने की कोशिश की है और प्रेम में निवेदन करने वाले नायक से भोलेपन में यह कहलवाकर - ‘बस मेरे लिए तू मालपुए कभी-कभी बना देना’, हम जैसे पोएट्री के पुराने कद्रदानों को भी साध लिया है!

एलबम का चौथा गीत ‘सयानी’ है जो ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के लिए अमित त्रिवेदी रचित बेइंतहा ही खूबसूरत ‘नवराई माझी’ जैसा हो जाने की ख्वाहिश रखता है. लेकिन नायिका के सयाने हो जाने की बात करने वाले इस शादी-गीत को दूसरी बार भी सुनने का मन नहीं करता क्योंकि ये खुद को नया बनाने के लिए कुछ नहीं करता.

अंतिम गीत मोहित चौहान की गायकी पर एक बार फिर मोहित होने का मौका देने वाला गीत है. रॉक गीतों का बेसिक टेम्पलेट लेकर रचा गया ‘साले सपने’ सिर्फ नायक की उसके सपनों से एक-तरफा गुफ्तगू है, और कौसर मुनीर ने इस संवाद को बेहद ही दिलचस्प बना दिया है. कितनी खूब बात को कविता बनाया है, जिसमें नायक कहता है कि चांद को चुरा के, लोरियां सुना के, मैंने खुद को था सुलाया, पर तूने (सपनों ने) बत्तियां जला दीं, धज्जियां उड़ा दीं! तुरंत बाद ही आक्रोशित नायक सपनों से बदला लेने की भी बात करता है और कहता है कि अब तो जागूंगा मैं रात-दिन, होश उड़ा दूंगा मैं तेरा, पीछा न छोड़ूंगा मैं तेरा, ओ साले सपने. वाह!

फिल्म में तेज रफ्तार भागते विजुअल्स पर शर्तिया व्यर्थ होने वाले इस सर्वश्रेष्ठ गीत को मोहित चौहान के लिए भी बार-बार सुनिएगा. उन गीतों की तरफ भी वापस लौटने की कोशिश कीजिएगा जो उन्होंने तब बनाए थे जब वे ‘फितूर’(2009) जैसी स्वतंत्र एलबमों में खुद को झोंक दिया करते थे. ‘दुनिया की इस भीड़ में, सबसे पीछे हम खड़े’ सुनकर जिंदगी बेहतर महसूस होगी.

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