जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के असर से दुनिया के मौसम में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, लगता है उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने उसके हिसाब से काम करना शुरू कर दिया है. इसीलिए उत्तर प्रदेश के स्कूलों में बच्चों को सर्दी से बचाने के लिए ऊनी स्वेटर अब फरवरी या उसके बाद बांटे जाएंगे. उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष मार्च में जब नई भाजपा सरकार ने सत्ता संभाली थी तभी नवनियुक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी स्कूलों में आठवीं तक के बच्चों को नई स्कूल ड्रेस के साथ-साथ जूते-मोजे और ऊनी स्वेटर बांटने की घोषणा भी की थी. बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री अनुपमा जायसवाल ने भी इसे लेकर दावा किया था कि हर हाल में नवंबर के अंत तक स्कूली बच्चों को ऊनी स्वेटर दे दिए जाएंगे. लेकिन अब 2018 भी आ गया है मगर स्वेटर बंटना तो दूर, स्वेटर बांटने का तरीका क्या हो अभी तक यही तय नहीं किया जा सका है.

बचपन में एक लोक कथा सुनी थी. लकड़ी के एक तीन मंजिले घर में आग लगने पर पड़ोसी ने घर का दरवाजा खटखटा कर परिवार को सचेत करने का प्रयास किया. घर के मुखिया ने आवाज सुनी तो उन्होने अपनी पत्नी को देखने के लिए कहा. पत्नी ने यह काम अपनी बहू को सौंप दिया, बहू ने किसी अन्य से कह दिया जिसने अपने कुत्ते से कहा जरा देखो तो कौन है जो रात में दरवाजा खटखटा रहा है. कुत्ते ने यही बात बिल्ली से कही. बिल्ली ने सुन कर अपनी पूंछ हिला दी और बात खत्म हो गई. कुछ ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को ऊनी स्वेटर बांटने की योजना का भी है.

मुख्यमंत्री के स्वेटर बाॅटने की घोषणा के कुछ महीने बाद राज्य का बेसिक शिक्षा विभाग जागा. फिर ऊनी स्वेटरों के लिए अनुमानित बजट तय किया गया. इसके बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने इस बाबत एक प्रस्ताव अगस्त में सरकार को भेज दिया. लेकिन खरीद प्रक्रिया तय करने में ही दो-तीन महीने लग गए. तब तक नवंबर आ गया. इसके बाद सरकार ने योजना में किसी तरह का भ्रष्टाचार न हो इसके लिए स्वेटरों की खरीद केंद्र सरकार के ई-खरीद पोर्टल यानी जेम पोर्टल से ही करना तय किया. लेकिन इस पोर्टल पर अलग-अलग जिलों से अलग-अलग प्रस्ताव आए. अंत में कोई केंद्रीय वितरक न मिलने से सरकार ने फिर से इसके लिए खुले टेंडर जारी किये. दिसंबर में लाए अनुपूरक बजट में 390 करोड़ की बजट स्वीकृति के बाद 21 दिसम्बर को पुनः टेंडर मांगे गए. मगर इसमें से भी सिर्फ दो ही टेंडर अंतिम रूप से विचार योग्य पाए गए. इनमें से एक टेंडर, जो सबसे कम दर यानी 247.75 रूपए प्रति स्वेटर का था, वह इस दर पर सिर्फ लखनऊ में ही वितरण के लिए था. दूसरा 248.13 रूपए की दर वाला टेंडर भी इसलिए मंजूर नहीं हो सका क्योंकि विभाग की शर्तों पर उसे देने वाली कंपनी के साथ सहमति नहीं बन सकी.

योजना लगातार टलते जाने और इसको लेकर हो रही किरकिरी के बाद सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ते हुए अपनी आफत राज्य के सरकारी प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों के सर पर डाल दी. सूबे के स्कूलों में ठंड के कारण छुट्टी की घोषणा करने के साथ-साथ प्रदेश सरकार ने तीन जनवरी 2018 को एक शासनादेश भी जारी किया. इसके जरिये उसने सभी स्कूलों पर प्रदेश के डेढ़ लाख स्कूलों के करीब डेढ़ करोड़ बच्चों को 200 रूपए प्रति स्वेटर की दर से 30 दिन में स्वेटर देने की जिम्मेदारी डाल दी.

शासनादेश के अनुसार विद्यालय की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के अधीन एक क्रय समिति बनाई जाएगी. इसमें प्रधानाचार्य, एक अभिभावक और एक स्थानीय प्राधिकारी सदस्य होंगे. 20 हजार से एक लाख तक की खरीद कोटेशन के जरिए और एक लाख से ऊपर टेंडर के जरिए की जाएगी. नगद खरीद या किसी अन्य भ्रष्टाचार के लिए प्रधानाचार्य को जिम्मेदार माना जाएगा. वैसे जिला स्तर पर भी जिलाधिकारी के अधीन एक निगरानी समिति रहेगी.

सरकार का यह आदेश भी परवान चढ़ पाएगा इस बात की संभावना बहुत कम है. सबसे पहली बात तो यह कि इतनी बड़ी संख्या में इतनी जल्दी स्वेटर मिल पाना संभव नहीं दिखता. जब केन्द्रीयकृत व्यवस्था में एक करोड़ चौवन लाख स्वेटर उपलब्ध नहीं हो पा रहे थे तो जिले के स्तर पर ये कैसे मिल पाएंगे. दूसरी समस्या रंग और साइज की है - ये ऊनी स्वेटर सिर्फ मैरून रंग के होंगे और इनके साइज भी स्माल से लेकर लार्ज तक होने हैं. ऊपर से 1.54 करोड़ स्वेटर भी जब 247 रुपये से कम उपलब्ध नहीं थे तो जिलों में 200 रूपए या इससे कम दर पर ये स्वेटर कैसे मिल सकते हैं?

जिन शिक्षकों पर स्वेटर वितरण की जिम्मेदारी डाली जा रही है उनका कहना है कि 30 दिन में इन्हें बांटने का आदेश ही बेमानी है. इनका कहना है कि स्कूलों के स्तर पर धन उपलब्ध होने में ही इससे ज्यादा वक्त लग सकता है. इसलिए यदि सारी समस्याओं का हल निकल भी जाए तब भी बच्चों तक ये स्वेटर फरवरी की शुरुआत तक भी पहुच पाना कतई मुमकिन नहीं है. और इसके बाद इन्हें बांटने की कोई जरूरत ही नहीं है.

इन वजहों से शिक्षक इसे बिन-बुलाई आफत मान रहे हैं और अनेक जिलों में शिक्षक संगठन इसके विरोध में खड़े भी होने लगे हैं. उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष दिनेश शर्मा कहते हैं कि यह अव्यवहारिक फैसला है. यह शिक्षकों का काम नहीं है. सभी जिलों की इकाइयों से विचार विमर्श करने के बाद इसके खिलाफ आवाज उठाई जाएगी.

उत्तर प्रदेश विधान परिषद में स्नातक एवं शिक्षक क्षेत्र से विधायक व वरिष्ठ शिक्षक नेता ओम प्रकाश शर्मा पूछते है, ‘जो काम सरकार छह महीने में शुरू भी नहीं कर पाई उसे शिक्षक 30 दिन में कैसे पूरा करेंगे.’

विपक्षी राजनीतिक दल भी इस मामले में योगी सरकार को कठघरे में घेर रहे हैं. समाजवादी पार्टी का कहना है कि योगी सरकार की प्राथमिकताएं स्कूली बच्चे नहीं हैं. बीजेपी का काम या तो सिर्फ पिछली सरकार को कोसना है. या भगवा एजेंडे को थोपना है. कांग्रेस इस मामले को भ्रष्टाचार से जोड़ कर देख रही है और मानती है कि अगर सरकार इस योजना को इसी रूप मे लागू करना चाहती है तो यह सीधे सीधे बच्चों की स्वेटरों की मद की आधी रकम की बंदरबांट साबित होगी.

फिलहाल पशमीना शालों से ढंकी बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनुपमा जायसवाल दावा कर रही हैं कि बच्चों को स्वेटर समय पर मिल जाएंगे और जब तक बच्चों को स्वेटर नहीं मिलेंगे तब तक वे खुद भी स्वेटर नहीं पहनेंगीं. लेकिन पिछले आठ महीने में जो काम शुरू नही हो सका वह अगले तीस दिन में पूरा हो जाए यह चमत्कार किस हाल में इसका कोई ठोस जवाब किसी के पास नहीं है. कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के स्कूली बच्चों के लिए इस ठंड में ऊनी स्वेटर एक गर्मागर्म राजनीतिक झुनझुना ही रहने वाला है.