बीते हफ्ते महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को लेकर सड़क से संसद तक में हंगामा देखने को मिला. बताया जाता है कि बीती एक जनवरी को पुणे स्थित भीमा कोरेगांव में इकट्ठा हुए दलित समुदाय के लोगों पर भगवा झंडे लिए कुछ लोगों ने हमला कर दिया था. झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और छह लोग घायल हो गए थे. दलित भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जमा हुए थे. यह युद्ध एक जनवरी, 1818 को हुआ था. इसमें अंग्रेजी सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को हरा दिया था. इस सेना में ज्यादातर सैनिक दलित (महार) समुदाय के थे.

उधर, मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने इस मामले की न्यायिक जांच का आदेश दिया है. उन्होंने एक मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद देने का ऐलान भी किया. दूसरी ओर, डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर ने न्यायिक जांच की घोषणा को खारिज किया है. इसके अलावा लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कट्टर हिंदू कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हिंसा कराने का आरोप लगाया. साथ ही, उन्होंने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री ‘मौनी बाबा’ बन जाते हैं.

इन घटनाक्रमों पर देश के प्रमुख अखबारों ने भी संपादकीय के जरिए अपनी राय रखी है. अखबारों ने इसे भाजपा की विस्तारवादी राजनीति को चुनौती देने वाला मामला बताया है. इस सबके पीछे की वजह उन्होंने इतिहास की अलग-अलग व्याख्या को लेकर असहनशीलता, कानून-व्यवस्था की कमी और रोजगार के घटते मौकों को माना है. भाजपा के करीब माने जाने वाले एक अखबार का कहना है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले विभाजनकारी तत्वों के साथ शामिल हैं.

दैनिक भास्कर के मुताबिक भीमा कोरेगांव मामले ने यह साबित किया है कि देश के राष्ट्रीय आख्यान में कई परतें और धाराएं हैं. साथ ही, किसी एक आख्यान से सभी तबकों का सहमत होना न तो संभव है और न ही जरूरी. अखबार ने आगे भीमा कोरेगांव की चर्चा करते हुए कहा है कि इसके भी दो आयाम हैं. इसका पहला आयाम- ब्राह्मणवाद और अछूतों के साथ होने वाले अत्याचार का विरोध है, तो दूसरा पेशवा शासक से जुड़े भारतीयता और देशभक्ति के आख्यान हैं. दैनिक भास्कर का मानना है कि इन दोनों आयामों में खामियां हैं और इन्हें शौर्य और देशभक्ति के काल्पनिक किस्सों पर खड़ा किया गया है. साथ ही, अखबार का आखिर में कहना है कि भारतीय राष्ट्रीयता तभी सहज रह सकती है, जब वह विभिन्न जातियों-संप्रदायों की सुने और इसे लेकर एक सहनशीलता विकसित करे.

द इंडियन एक्सप्रेस का इस मामले पर कहना है कि भीमा कोरेगांव की घटना के बाद भाजपा द्वारा दलितों को अपने साथ लाने की कोशिशों पर पानी फिर सकता है. अखबार का मानना है कि पार्टी द्वारा अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिशों के बीच उसके पुराने वोट बैंक और लक्षित तबके के बीच अपने-अपने हितों को लेकर टकराव की स्थितियां बन रही हैं. दूसरी ओर, पार्टी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और इससे जुड़े संगठन राजनीतिक फायदे के लिए अपने मूल वैचारिक मुद्दों पर कोई समझौता करना नहीं चाहते. अखबार का आगे मानना है कि ताजा मामला भाजपा के लिए यह संकेत करता है कि व्यापक जनाधार हासिल करने के लिए उसे अपनी रणनीतियों की समीक्षा कर उनमें जरूरी बदलाव करने होंगे.

उधर, दैनिक जागरण ने भीमा कोरेगांव हिंसा के जवाब में महाराष्ट्र बंद को लेकर प्रदर्शनकारियों की आलोचना की है. अखबार का कहना है कि इस बंद के दौरान हिंसक गतिविधियों के जरिए जिस तरह लोगों को परेशान किया गया, उससे साफ होता है कि इसका मकसद विरोध से अधिक बाहुबल दिखाना था. साथ ही, इन घटनाक्रमों को लेकर उसने एक खास तबके को भी निशाने पर लिया है. अखबार ने आगे कहा कि समाज में बैर फैलाने वाले तत्वों में खुद को सेक्युलर-समाजवादी करार देने वाले भी शामिल हैं.

द टाइम्स ऑफ इंडिया ने दलितों और दक्षिणपंथी संगठनों के बीच हिंसा को लेकर राज्य की खुफिया एजेंसी और पुलिस को जिम्मेदार ठहराया है. अखबार का कहना है कि भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के मौके पर करीब 10 लाख दलित जमा हुए थे. इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए राज्य सरकार को पुख्ता कानून व्यवस्था सुनिश्चित करनी थी. इस अंग्रेजी अखबार ने देश में पर्याप्त संख्या में रोजगार उपलब्ध न होने को भी इस तरह की घटनाओं की वजह माना है. साथ ही, यह भी कहा है कि आरक्षण रोजगार की समस्या के समाधान और समाज में बराबरी स्थापित करने में अब तक विफल रहा है. इसके अलावा उसने विकास पर जोर देने और इतिहास की अलग-अलग धारणाओं के प्रति सहनशील होने की पैरवी की है.

देश में समुदायों के बीच टकराव पर द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित कार्टून
देश में समुदायों के बीच टकराव पर द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित कार्टून