भारत और इज़रायल के बीच 2015 में जल प्रबंधन को लेकर एक समझौता हुआ था. इसके तहत पानी की कमी को दूर करने के लिए तकनीकी स्तर पर जल प्रबंधन का काम होना है. इसमें उपलब्ध पानी का कुशलता से उपयोग, सूक्ष्म सिंचाई और बेकार पानी का इस्तेमाल जैसी गतिविधियां शामिल हैं. इस संदर्भ में इन दिनों एक तकनीक की काफी चर्चा हो रही है. डिसैलिनेशन (विलवणीकरण) नाम की तकनीक से समुद्र के खारे पानी को सामान्य जल में बदला जाता है. सोशल मीडिया पर आजकल दावा किया जा रहा है कि इस तकनीक से भारत में पानी का संकट कुछ सालों में पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा. यह भी दावा है कि यह तकनीक बहुत महंगी नहीं है. साथ ही पर्यावरण और लोगों की सेहत के लिहाज़ से भी सुरक्षित है. लेकिन क्या वाक़ई ऐसा है?

यह मानने में कोई समस्या नहीं कि डिसैलिनेशन पानी की कमी को दूर करने का एक विकल्प है, ख़ास तौर पर पीने के पानी के लिहाज से. लेकिन जानकार मानते हैं कि यह विकल्प पानी के संकट को ख़त्म करने के लिए नाकाफ़ी है और इसके कई दुष्प्रभाव भी हैं.

वैसे भारत में डिसैलिनेशन की तकनीक कोई नई चीज़ नहीं है. यहां तमिलनाडु और गुजरात में पहले से जल उपचार संयंत्र काम कर रहे हैं. लेकिन शुरुआत इज़रायल से करते हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर हो-हल्ला उसके और भारत सरकार के बीच हुए समझौते को लेकर हो रहा है.

कुछ साल पीछे चलते हैं. इज़रायल के जल प्राधिकरण ने एक सर्वे कराया था. इस सर्वे में पाया गया कि डिसैलिनेशन तकनीक से सामान्य पानी तो उपलब्ध हुआ, लेकिन इसके लिए बने संयंत्रों पर लगने वाली लागत काफ़ी ज़्यादा थी. यह भी कहा गया कि भविष्य में यह लागत दोगुनी हो जाएगी और बढ़ती जाएगी. वहीं, मौसम में आए बदलावों पर काम कर रही वहां की एक समिति ने डिसैलिनेशन तकनीक को लेकर एक और नकारात्मक पक्ष रखा. समिति के एक सदस्य प्रोफेसर न्युरिट किलोट के मुताबिक़ समिति ने डिसैलिनेशन प्रक्रिया को कारगर नहीं पाया. उनके मुताबिक़ इस तकनीक के लाभ इस पर लगने वाली भारी लागत को तर्कसंगत साबित नहीं करते थे. किलोट ने पर्यावरण को होने वाले नुक़सान का भी ज़िक्र किया था जिस पर अधिकारियों ने विचार नहीं किया.

इन आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं के अलावा सर्वे के अध्ययन में यह भी पाया गया कि डिसैलिनेशन प्रक्रिया के बाद पानी में नमक की मात्रा 25 प्रतिशत तक कम हो गई, और भविष्य में इसके 30 से 40 प्रतिशत तक कम होने की उम्मीद जताई गई. सामान्य पानी में मैग्नीशियम भी होता है जिसे सेहत के लिहाज़ से काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है. 2012 के आसपास इज़रायल की सरकार ने डिसैलिनेशन तकनीक से तैयार हुए पानी में मैग्नीशियम नहीं डालने का फ़ैसला किया. उसका कहना था कि इसके चलते इस पूरी प्रक्रिया की लागत और बढ़ जाती है.

यानी इज़रायल के लोगों को साफ़ पानी तो मिला, लेकिन सामान्य जल में सेहत से जुड़े जो आवश्यक तत्व पाए जाते हैं वे इस पानी में नहीं थे. इसके चलते अब इज़रायल में एक राष्ट्रीय संकट खड़ा हो गया है.

इस तकनीक की शुरुआत के वक्त जो चिंताएं जताई गई थीं उनमें से कई 2017 आते-आते सही साबित हुईं. इसके लिए मार्च 2017 में इज़रायल के पहले आयोडीन सर्वे के परिणाम देखे जा सकते हैं. हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ़ यरुशलम में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट बताती है कि इज़रायल के ज़्यादातर बच्चों और गर्भवती महिलाओं में आयोडीन और मैग्नीशियम की भारी कमी है. आयोडीन की कमी (आईडी) को बच्चों के विकास में एक अहम बाधा माना जता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी सभी देशों को सलाह देता है कि उन्हें हर पांच साल में अपने नागरिकों में आयोडीन की मात्रा की जांच करनी चाहिए.

2017 से पहले इज़रायल ने ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया था जिससे उसके यहां लोगों में आयोडीन की कमी का पता चल सके. हिब्रू यूनिवर्सिटी ने कई दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े इकट्ठा किए. उन्होंने इज़रायल के सभी प्रमुख प्रांतों के एक हज़ार से ज़्यादा स्कूली बच्चों और उतनी ही गर्भवती महिलाओं के यूरीन सैंपल (पेशाब के नमूने) लिए. जांच करने पर जो नतीजे आए उनसे निष्कर्ष निकला कि इज़रायल में 62 प्रतिशत स्कूली बच्चों और 85 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में आयोडीन की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित स्तर से कम है.

थाइरॉइड की बीमारी से बचने और स्वास्थ्य के उचित विकास के लिए शरीर में एक तय मात्रा में आयोडीन होना बहुत ज़रूरी है. इसकी कमी के चलते बच्चों का सही बौद्धिक विकास नहीं हो पाता. बचपन में आयोडीन नहीं मिलने से दिमाग़ी विकास में बाधा आ सकती है. इसकी भारी कमी से इंसान बौना भी रह सकता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि आयोडीन की कमी इज़रायल में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन गई है. उनके मुताबिक़ अन्य देशों की तुलना में इज़रायल में गर्भावस्था व भ्रूण संबंधी समस्याएं और कमज़ोर तंत्रिका विकास की संभावनाएं ज़्यादा हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि इज़रायल में आयोडीन की कमी एक राष्ट्रीय समस्या है जिसे दूर करने के लिए जल्द से जल्द कुछ किया जाना चाहिए. रिपोर्ट में आगे लिखा है कि इज़रायली बच्चों व महिलाओं में आयोडीन की समस्या का एक बड़ा कारण पानी के लिए डिसैलिनेशन तकनीक पर देश की निर्भरता है. इज़रायल के ज़्यादातर लोग इसी तकनीक के ज़रिए साफ़ किए गए पानी को पीते हैं.

ये हालात इज़रायल में हैं जहां की आबादी भारत के एक फीसदी से भी कम है. एक वर्ग का मानना है कि भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन आदि जैसे कारक डिसैलिनेशन तकनीक पर निर्भरता के दुष्प्रभावों को और बड़ा कर सकते हैं.

डिसैलिनेशन तकनीक का भारत में अब तक क्या अनुभव रहा है?

भारत में तमिलनाडु में कुछ साल पहले दो डिसैलिनेशन प्लांट लगाए गए थे. एक 2010 में मिंजर में और दूसरा 2013 में नेमेली में. इन्हें चेन्नई में पानी के संकट को ख़त्म करने के उद्देश्य से लगाया गया था. अभी तक ऐसी कोई रिपोर्ट या दावा सामने नहीं आया है जिसके आधार पर यह कहा जा सके डिसेलिनेशन ने चेन्नई के लोगों के लिए पानी की समस्या को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है. हां, इससे पर्यावरण और संबंधित क्षेत्र के लोगों की आजीविका को हुए नुक़सान की रिपोर्टें ज़रूर हैं.

दिसंबर 2016 की ऐसी ही एक रिपोर्ट के मुताबिक़ नेमेली स्थित जल उपचार संयंत्र से न केवल समुद्री क्षेत्रों को पर्यावरणीय नुक़सान पहुंचा है बल्कि वहां के लोगों की आजीविका भी प्रभावित हुई है. समुद्र के पानी को सामान्य जल में बदलने के लिए जिन रसायनों या कैमिकल्स का इस्तेमाल होता है वे ज़हर के रूप में रोज़ाना प्लांट से निष्कासित होते हैं और समुद्र के पानी में मिलते हैं. नेमेली स्थित प्लांट में दस करोड़ लीटर पानी प्रति दिन (एमएलडी) तैयार किया जाता है. इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले कैमिकल्स प्रक्रिया पूरे होने के बाद पाइपों के ज़रिए प्लांट के बाहर निकाल दिए जाते हैं. ये समुद्र के पानी में मिलकर उसे दूषित बनाते हैं.

इसकी एक बड़ी वजह नेमेली प्लांट का ख़राब डिज़ाइन बताया जाता है. यह प्लांट पर्यावरण व वन मंत्रालय के नियमों के मुताबिक़ नहीं बना है. नियम कहता है कि जिन पाइपों के ज़रिए प्लांट की गंदगी निकलती है वे समुद्र तट से 600 मीटर दूर और आठ मीटर नीचे बने होने चाहिए. लेकिन प्लांट की ख़राब डिज़ाइनिंग के चलते मई 2013 से ही इस नियम का उल्लंघन हो रहा है. पास के गांव सुलेरीकुट्टूकुप्पम के मछुआरों ने प्लांट के निर्माण के समय ही इस बारे में शिकायत की थी. हालांकि प्लांट के अधिकारी इससे इनकार करते हैं.

2011 का सुलेरीकट्टूकुप्पम
2011 का सुलेरीकट्टूकुप्पम
2013 का सुलेरीकट्टूकुप्पम (कोस्टल रीसोर्स सेंटर)
2013 का सुलेरीकट्टूकुप्पम (कोस्टल रीसोर्स सेंटर)

उधर, मछुआरों की शिकायत पर सरकार ने तुरंत कार्रवाई की. उसने मछुआरों को ही जेल में डाल दिया जहां उन्हें एक महीने तक रखा गया. मछलियां पकड़ने के लिए उन्हें जिस जगह की ज़रूरत थी वह पहले ही प्लांट की वजह से नहीं रही थी, सरकारी कार्रवाई के बाद शिकायत करने की उम्मीद भी उन्होंने खो दी. उनके जैसे अन्य मछुआरों के लिए बुरी ख़बर यह है कि सरकार वहां और ज़्यादा क्षमता वाले इस तरह के प्लांट शुरू करने जा रही है.

चिंता केवल मछुआरों की नहीं समुद्री जीवों को लेकर भी है. नेमेली प्लांट में प्रतिदिन समुद्र से 20 करोड़ 37 लाख लीटर पानी लिया जाता है. इसमें से 10 करोड़ लीटर सामान्य जल तैयार किया जाता है. बाक़ी पानी पाइप के ज़रिए बाहर निकाल दिया जाता है. डिसेलिनेशन के दौरान पानी में से निकाले गए खनिज और अन्य कैमिकल्स इसी पानी में मिले होते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस पानी को समुद्र के नज़दीक डिस्चार्ज करने से मछलियों की कई प्रजातियों को ख़तरा है. ये मछलियां न सिर्फ़ यहां खाने और प्रजनन के लिए आती हैं बल्कि अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भी यहां बिताती हैं. जानकारों के मुताबिक समुद्र से पानी लिए जाने की प्रक्रिया के दौरान भी समुद्री जीव मारे जाते हैं. ज़्यादा दबाव वाली मोटरों के ज़रिए पानी खींचा जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान मछलियां, केकड़े और अन्य जीव मारे जाते हैं.

समुद्र के पास इस तरह के निर्माण से तटों का भी क्षरण होता है. इससे तूफ़ान व चक्रवात में ज़्यादा नुक़सान होने की संभावना बढ़ जाती है. प्लांट बनाने के लिए समुद्र के आसपास रेत के टीलों को हटाकर ज़मीन सपाट कर दी जाती है और बुनियाद तैयार करने के लिए पंपों के ज़रिए भू जल को निकाल दिया जाता है. नतीजा, भूजल खारा हो जाता है. उधर, गांव वालों में प्रदूषण और आजीविका का डर तो है ही, साथ ही इस बात की भी चिंता है कि किनारों के कटने से समुद्र उनके और नज़दीक आ जाएगा.

डिसैलिनेशन तकनीक के लिए कहा जाता है कि यह उन देशों के लिए ज़्यादा कारगर है जहां पानी के प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी है. इज़रायल को इसमें महारत हासिल है, लेकिन वह भी अब दूसरे विकल्पों पर काम कर रहा है. वह पानी के संसाधनों के संरक्षण और इसकी रीसाइकलिंग (प्रयोग की गयी वस्तु का पुनः प्रयोग) पर काफ़ी निवेश कर रहा है. मिसाल के लिए इज़रायल अपने कुल बेकार पानी का 85 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में लगाता है. अब तो वहां के जल अधिकारी भी डिसैलिनेशन की अपेक्षा दूसरे विकल्पों पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि 85 लाख से भी कम की आबादी और मात्र 20,770 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाला इज़रायल हमें यह तकनीक क्या इसलिए दे रहा है ताकि वह ख़ुद इस पर लगने वाली भारी-भरकम लागत निकाल सके?