देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल छह राज्यों ने ही दिव्यांगों (निशक्तजनों) के लिए अलग से विभाग बनाए हैं. इसके अलावा जिलास्तर पर इनकी समस्याएं सुनने के लिए समाज कल्याण अधिकारी नियुक्त किए हैं. इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार यह बात एक संसदीय समिति ने दिव्यांगों के सशक्तिकरण के विभाग पर अपनी रिपोर्ट में कही है. इसमें समिति ने यह भी कहा है कि केंद्र द्वारा याद दिलाने के बावजूद बाकी राज्यों ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है.

अपनी रिपोर्ट में संसदीय समिति ने दिव्यांगों के लिए अलग से विभाग न बनाने या जिलास्तर पर अधिकारी नियुक्त न करने को राज्य सरकारों की इनके प्रति असंवेदनशीलता बताया है. समिति ने यह भी कहा है कि दिव्यांगों के आसपास नामित अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के न होने की वजह से उन्हें विकलांगता प्रमाणपत्र लेने के लिए दूसरे जिलों में जाना पड़ता है.

रिपोर्ट के मुताबिक संसदीय समिति ने शारीरिक चुनौती का सामना करने वालों के प्रति अधिकारियों कठोर व्यवहार की निंदा की है. समिति ने यह भी कहा है कि सांसदों की सिफारिश के बावजूद दिव्यांगों को ट्राईसाइकल, अन्य मदद और उपकरण मिलने में आठ से दस महीने लग जाते हैं. संसदीय समिति ने सारी प्रक्रियाओं को इस तरह से व्यवस्थित करने की जरूरत बताई है, ताकि दिव्यांगों को परेशानियों से बचाया जा सके.