सोनम कपूर पेंटर बनने के लिए इतनी बेचैनी क्यों दिखा रही हैं!

सोनम कपूर शादी कर रहीं हैं जैसी अफवाहों के बीच पुख्ता खबर यह सामने आई है कि श्रीदेवी द्वारा बनाई गई सोनम कपूर की एक पेंटिंग दुबई में नीलाम होने वाली है! इसकी कीमत आठ से दस लाख रुपये मिलने की उम्मीद है और ‘सांवरिया’ वाले वक्त की सोनम को याद करके श्रीदेवी ने यह पेंटिंग अपने खाली वक्त में कभी बनाई थी.

यहां पेंटर और पेंटिंग की विचित्र-सी इस जोड़ी का जिक्र करने की एकमात्र वजह यह है कि सोनम कपूर भी एक जमाने में पेंटर बनने का ख्वाब सजाए बैठी थीं. वे परदे पर अमृता शेरगिल बनना चाहती थीं. इसके लिए बाकायदा उन्होंने एक प्रोजेक्ट को हां कहा था और दिल से अमृता शेरगिल बनने की तैयारियां शुरू कर दी थीं. शेरगिल के परिवार वालों तक से मुलाकात की थी और खाली कैनवास पर ब्रश चलाना भी सीख लिया था. लेकिन अब वे यह बायोपिक नहीं कर रहीं और सिर्फ इतना कहकर कि ‘मैं अब इसका हिस्सा नहीं हूं’ इसकी असल वजह भी नहीं बता रहीं.

जब यही वजह जानने के लिए उनसे घुमाकर हाल ही में पूछा गया कि ‘भाग मिल्खा भाग’ व ‘नीरजा’ के बाद वे कोई बायोपिक करना चाहती हैं तो उन्होंने भी सफाई से बात उल्टी घुमा दी. ‘क्यों नहीं? ऐसी ढेरों कमाल की कहानियां हैं जो सुनाई जा सकती हैं और कई किरदार हैं जो निभाए जा सकते हैं...अगर मौका मिला तो मैं मैक्सिको मूल की पेंटर फ्रीडा काहलो का किरदार करना चाहूंगी क्योंकि वे मुझे काफी मोटीवेट करती हैं और उनकी कहानी बयां करना बनता है!’

ठीक यही तो उन्होंने कभी अमृता शेरगिल के लिए भी कहा था! और अब अपने ऐसे जवाब से जाहिर कर दिया है कि अमृता हो या फ्रीडा, पेंटर तो वे एक दिन बनकर ही रहेंगी!

बीते पूरे साल परेशान रहीं श्रद्धा कपूर के लिए नए साल का आगाज डराने वाला क्यों है?

साल 2017 श्रद्धा कपूर के लिए खासा खराब रहा. खालिस कमर्शियल फिल्म करने से लेकर एक्सपेरिमेंटल रोल तक करना उनके काम न आया और ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ से लेकर ‘हसीना पारकर’ तक ने दर्शकों को खूब हंसाया, उनके खराब अभिनय के चलते.

बदकिस्मती से 2018 भी अपनी शुरुआत में उनके लिए निराशा ही लेकर आया है. भले ही इस साल उनके पास प्रभास के साथ वाली ‘साहो’ है लेकिन जिस फिल्म से इस साल उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं, वो होल्ड पर चली गई है. साइना नेहवाल की बायोपिक की तैयारी श्रद्धा काफी समय से कर रही थीं और इसके लिए बैडमिंटन सीखने से लेकर वजन कम करके साइना की तरह छरहरी होना तक उन्होंने शुरू कर दिया था. यह भी कहा जा रहा था कि साइना के कोच पुलेला गोपीचंद तक से श्रद्धा ने डेढ़ महीने तक बैडमिंटन सीखा है. लेकिन अब खबर है कि अमोल गुप्ते निर्देशित यह फिल्म कुछ वक्त के लिए रोक दी गई है. इंडस्ट्री के अंदर सुगबुगाहट है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि श्रद्धा, साइना नेहवाल की तरह बनने और बैडमिंटन खेलना सीखने में वक्त ले रही हैं और अमोल गुप्ते नहीं चाहते कि वे सौ फीसदी नहीं देने वाली श्रद्धा के साथ फिल्म बनाना जारी रखें. इसलिए अब फिल्म होल्ड पर है और इससे जुड़े लोग इंतजार कर रहे हैं उस दिन का जब श्रद्धा कपूर सौ फीसदी देने के लिए पूरी तरह तैयार होंगी!


‘महिला-प्रधान फिल्मों के मामले में हम आज भी हॉलीवुड से 20 साल पीछे हैं. जब 1980-90 के दशक में वहां कई सारी महिला प्रधान फिल्में बन रहीं थी और जूलिया रॉबर्ट्स छाई हुई थीं, हमारे यहां मेरे डैड अनिल कपूर और खान त्रयी ही बस लाइमलाइट में रहते थे.’

— सोनम कपूर, अभिनेत्री

फ्लैशबैक | जब जगजीत सिंह ने अपनी जिद के चलते एक नज़्म को अमरता के प्रवेश द्वार तक पहुंचाया

‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ शायद जगजीत सिंह की सबसे मकबूल नज्मों में से एक है. इसके श्रोताओं तक पहुंचने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं, जिसे जानने के बाद यह भी बेहतर समझ आता है कि अपने समकालीन गजल गायकों की तुलना में जगजीत सिंह के पास उन गीतों का खजाना क्यों ज्यादा था, जो आम और खास दोनों की जुबान पर तुरंत चढ़ जाया करते थे.

वजह थी कि जगजीत सिंह खुद साहित्यिक पत्रिकाओं में से नज्में और गजलें ढूंढ़ा करते थे और खुद को पसंद आने पर उन्हें संगीतबद्ध किया करते. कभी खुद गाते कभी किसी दूसरे गायक से गवाते. कफील आजर अमरोहवी की लिखी उनकी सबसे मकबूल नज्म ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ ऐसे ही उनके हाथ लगी थी. उर्दू पत्रिका शमां में इसे पढ़ते ही वे इसके दीवाने हो गए थे (कोई भी हो जाएगा!) और चूंकि उस वक्त वे एक प्राइवेट एलबम का संगीत दे रहे थे इसलिए उन्होंने इसे संगीतबद्ध कर ‘एक अकेला इस शहर में’ वाले गायक भूपिंदर सिंह से गवाया था. लेकिन यह एलबम कभी पूरा नहीं बन पाया जिस वजह से इस नज्म के भूपिंदर सिंह की आवाज में श्रोताओं तक पहुंचने की गुंजाइश खत्म हो गई.

इसके बाद इस नज्म को एक फिल्म के लिए रिकॉर्ड किया गया. राज कपूर के साथ काम कर चुके और ‘नया दौर’ जैसी फिल्मों के संवाद लिखने वाले मशहूर लेखक अर्जुन देव अश्क ने इसे अपनी फिल्म ‘शाशा’ के लिए रिकॉर्ड करवाया. लेकिन यह फिल्म भी पूरी बन न सकी और नज्म एक बार फिर सुनने वालों के पास नहीं पहुंच पाई.

लेकिन फिर, जब कुछ वक्त बाद एचएमवी म्यूजिक कंपनी ने पहली बार जगजीत सिंह को एलपी (उस दौर में चलने वाले रिकॉर्ड) तैयार करने की हरी झंडी दी तो उन्होंने उसके लिए सबसे पहले इसी नज्म को रिकॉर्ड किया. इस बार अपनी ही आवाज में. 1977 में आए जगजीत और चित्रा सिंह के इस एलबम ‘द अनफॉर्गेटेबल्स’ को न सिर्फ आशातीत सफलता मिली और इसे जगजीत सिंह के करियर में माइलस्टोन की तरह पूजा गया बल्कि सिर्फ अपनी जिद के चलते उन्होंने अपने करियर के सबसे बड़े ब्रेक में ‘बात निकलेगी तो फिर...’ को शामिल कर उसे अमरता के प्रवेश द्वार तक पहुंचा दिया. जहां से आगे का रास्ता इस खूबसूरत नज्म ने खुद अकेले तय किया!

बताते चलें कि यह किस्सा खुद जगजीत सिंह ने अपनी ही एक महफिल में श्रोताओं से साझा किया था.

दो साल बाद इस नज्म को एक फिल्म ‘गृह प्रवेश’ में भी शामिल किया गया, जिसमें संजीव कुमार व शर्मिला टैगोर को ताकते हुए आज सुनने का लुत्फ ही कुछ और है!

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