सुप्रीम कोर्ट समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 पर अपने पुराने फैसले की समीक्षा करने के लिए राजी हो गया है. द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सोमवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करेगा. बेंच ने यह भी कहा, ‘अपनी पसंद का इस्तेमाल करने वाले कुछ लोगों या व्यक्तियों को डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिए. लोगों का चुनाव कानूनी सीमा से बाहर नहीं होना चाहिए, लेकिन कानून की सीमाएं भी संविधान में अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों में कटौती करने वाली नहीं होनी चाहिए.’

इससे पहले 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का फैसला सुनाया था. लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया था. हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को ज्यादा बड़ी बेंच को सौंपने की बात कही है.

सोमवार को समलैंगिक समुदाय के पांच लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को भी नोटिस जारी किया है. इसमें याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यौनिकता संबंधी अपनी पसंद की वजह से उन्हें हमेशा पुलिस कार्रवाई का डर सताता रहता है. आईपीसी की धारा 377 ‘अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों’ को परिभाषित करती है और ऐसे संबंध बनाने वालों को आजीवन कारावास तक की सजा देने की बात कहती है.