सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का गाया एक बेहद लोकप्रिय भजन है - ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला, राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला...’ इसे सुनते हुए बहुत सारे लोगों को श्रीकृष्ण की यह शिकायत बेजा लग सकती है. वैसे अगर आप ध्यान से देखें तो जिन देवी-देवताओं को हमारे यहां सांवले या काले रंग का बताया गया है, वे हमेशा इसके बजाय नीले रंग के ही नजर दिखाए जाते हैं. चाहे वे राम हों, शिव हों या श्याम-कृष्ण जैसे नाम रखने वाले मोहन. इनके अलावा जो देवी-देवता बचते हैं, वे झक्क उजले रंग के नजर आते हैं. यह बात विरोधाभासी सी ही लगती है कि वह देश जहां ज्यादातर लोगों की त्वचा का रंग गहरा या गेहुंआ था, उनके भगवान हमेशा गोरे-चिट्टे नजर आए. जबकि यह माना जाता रहा है कि लोग जैसे दिखते हैं, भगवान भी वैसे गढ़ते हैं. हो सकता है कि गोरेपन को श्रेष्ठ और सुंदर समझने की हमारी मानसिकता के चलते ही ऐसा हुआ होगा. लेकिन बीते कुछ सालों में यह धारणा टूटती सी दिख रही है और सांवलेपन को सहज और सामान्य बनाए जाने की कोशिशों में इजाफा हुआ है. फेसबुक पर हुई ऐसी ही एक कोशिश बीते कुछ दिनों से चर्चा में है और यह कोशिश अंजाम दी है चेन्नई के एक फिल्म प्रोड्यूसर भारद्वाज सुंदर और प्रोफेशनल फोटोग्राफर नरेश नील ने.

सुंदर ने नील के साथ मिलकर बेहद सीमित संसाधनों में एक फोटोशूट किया है. इसमें कई भारतीय देवी-देवताओं को सांवले रंग का दिखाया गया है. हालांकि उनके फीचर्स और बाकी भाव-भंगिमाएं जस की तस रखी गई हैं, लेकिन रंग बदल दिया गया. इस तरह हमें डार्क लक्ष्मी, सीता, दुर्गा, शिव जैसे कई और भगवान देखने को मिलते हैं. नरेश नील की एक फेसबुक पोस्ट के मुताबिक वे देवी-देवताओं को इस तरह दिखाकर पहले से चली आ रही धारणाओं से इतर जाकर उनकी सुंदरता को उभारना चाहते थे.

लक्ष्मी
लक्ष्मी
दुर्गा
दुर्गा

सुंदर और नील मानते हैं कि इस अभियान के जरिए त्वचा के रंग से जुड़े स्टीरियोटाइप तोड़ने में मदद मिलेगी. अपने इस प्रोजेक्ट को उन्होंने ‘डार्क इज डिवाइन’ नाम दिया है. इसके जरिए वे बताना चाहते हैं कि गहरा रंग सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, बल्कि दैवीय भी है.

सरस्वती
सरस्वती
बाल गोपाल कन्हैया
बाल गोपाल कन्हैया
बाला मुरुगन
बाला मुरुगन
शिव
शिव