सोमवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक ‘सेंसेक्स’ अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 34,352 पर जाकर बंद हुआ है. बंद होने से पहले एक समय यह 34,386 के रिकॉर्ड स्तर तक चला गया था. अब इसे संयोग ही कहेंगे कि इससे ठीक 10 साल पहले यानी आठ जनवरी, 2008 को भी इसने अपने इतिहास का सर्वोच्च स्तर छुआ था. उस दिन 30 शेयरों वाला यह सूचकांक पहली बार 21,000 अंकों के शिखर पर गया था. उसके दो दिन बाद 10 जनवरी को यह उस समय के सर्वोच्च स्तर 21,206 तक चला गया था.

इसके बाद दुनिया में आर्थिक मंदी आने की आशंका में भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ. इसके चलते अगले कई महीने देश और दुनिया के कारोबारी जगत के लिए काफी बुरे साबित हुए. परिणाम यह हुआ कि अगले केवल नौ माह में सेंसेक्स 63 फीसदी से भी ज्यादा गिर चुका था. अमेरिका और यूरोप सहित तमाम देशों के शेयर बाजार ढह गए थे. इससे दुनिया के निवेशकों में गहरी निराशा फैल गई थी. हालांकि भारत में मंदी का असर उतना व्यापक नहीं था फिर भी यहां के शेयर बाजार लगभग तीन साल बाद जाकर सामान्य हो पाए थे.

सेंसेक्स का शुरुआती सफर

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक ‘सेंसेक्स’ का सफर एक अप्रैल, 1979 से शुरू हुआ था. उसकी यह यात्रा 100 अंकों से शुरू हुई थी जिसने 11 साल बाद 25 जुलाई, 1990 को 1,000 का पड़ाव तय किया था. लेकिन इसके बाद केवल 20 माह में ही इसने 4,000 का शिखर छू लिया था. यह वह दौर था जब पीवी नरसिम्हा राव ने देश में उदारीकरण की शुरुआत की थी. इससे बाजार में काफी सकारात्मक माहौल बन गया था. लेकिन हर्षद मेहता कांड के बाद यह सिर के बल गिर गया. इसके बाद इसे संभलने में लंबा समय लग गया था. इस चलते 4,000 से 5,000 तक पहुंचने में सेंसेक्स को साढ़े सात साल लग गए थे. 11 अक्टूबर, 1999 को इसने 5,000 का आंकड़ा छुआ था.

सेंसेक्स की अगली कठिन चुनौती 7,000 का पड़ाव थी जहां वह करीब पौने छह साल बाद पहुंच सका था. हालांकि 7,000 के बाद शेयर बाजार को मानो पंख ही लग गए थे. जिस सेंसेक्स को शुरू से 7,000 तक पहुंचने में 26 साल से ज्यादा वक्त लगा लगा था, वह केवल ढाई साल में सात से 21 हजार तक का सफर तय कर चुका था. 21 जून, 2005 से आठ जनवरी, 2008 की यह यात्रा आ​र्थिक तौर पर काफी सुखद मानी जाती है. आर्थिक सुधारों का एजेंडा मजबूती से बढ़ाने से देश का माहौल तो अच्छा था ही, देश के बाहर भी अच्छे हालात थे. लेकिन तभी अमेरिका की सब-प्राइम संकट से पैदा हुई मंदी ने शेयर बाजार को फिर से जमीन पर ला दिया.

मंदी के बाद पिछले एक दशक की यात्रा

जनवरी 2008 में रिकॉर्ड स्तर तक चले जाने के बाद सेंसेक्स लगातार गिरता ही चला गया. हाल यह हुआ कि उसी साल 27 अक्टूबर को यह 63 फीसदी गिरकर 7,697 तक चला गया था. अमेरिका के ‘सब-प्राइम कर्ज संकट’ से उपजी मंदी से भारत भी अछूता नहीं रहा था. असमर्थ कर्जदारों को दिए गए अंधाधुंध कर्ज से पैदा हुए इस संकट से अमेरिका के कई बैंक बर्बाद हो गए थे. उसी साल सितंबर में अमेरिका की वित्तीय फर्म ‘लेमन ब्रदर्स’ के दिवालिया होने की खबर आई. इसके बाद तो दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं में निराशा और बैचैनी पैदा हो गई थी.

इस संकट का गहरा असर यूरोपीय देशों पर भी हुआ था. विश्व व्यापार के प्रभावित होने से दुनिया के कई कारखाने बंद हो गए थे. उस समय कच्चे तेल के दाम भी ऐतिहासिक स्तर तक चले गए थे. अपनी 70 फीसदी तेल जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर रहने वाले भारत की आर्थिक सेहत इस वजह से नाजुक हो गई थी. हाल यह हुआ कि मंदी से निबटने के लिए 2009 के बजट में केंद्र सरकार को अपने खर्च में भारी बढ़ोतरी करनी पड़ी थी. बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मांग बढ़ाने के लिए अपना वित्तीय घाटा 6.5 फीसदी तक बढ़ाने का ऐलान किया था.

इस उपायों से कारोबारी माहौल धीरे-धीरे सुधरा. इसका शेयर बाजार पर भी असर हुआ. पांच नवंबर, 2010 आते-आते बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने फिर से 21,000 का स्तर पा लिया. यानी 2008 जनवरी में शुरू हुई दुर्दशा से पार पाने में सेंसेक्स को लगभग तीन साल लग गए थे. हालांकि उस माहौल की स्थिरता को लेकर कई तरह की आशंकाएं कायम थीं. लेकिन इस बार वजह ज्यादा राजनीतिक थी. कॉमनवेल्थ घोटाले से लेकर अन्ना आंदोलन के चलते केंद्र की यूपीए सरकार ठोस आर्थिक फैसले नहीं ले पा रही थी. इन वजहों से 2011 में बाजार फिर से नीचे गिरने लगा. हाल यह हुआ कि 20 दिसंबर, 2011 आते-आते सेंसेक्स 15,136 तक पहुंच गया. इसके बाद 2012 और 2013 में बाजार फिर से पटरी पर लौटने लगा.

विपक्षी भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं प्रबल हो जाने के बाद बाजार ने मार्च 2014 में पहली बार 22,000 का आंकड़ा छू लिया. उसके बाद हाल यह हुआ कि महज एक साल में सेंसेक्स 8,000 अंक उछलकर 30,000 अंकों के पार चला गया. नोटबंदी के बाद बाजार में एक बार फिर गिरावट देखी. लेकिन पिछले एक साल में फिर से पुरानी रवानी हासिल करते हुए यह 34,000 के पार जा चुका है.

भविष्य का हाल

देश की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार दोनों ने पिछले तीन साल में काफी सुधार किया है. फिर भी इसे सभी चिंताओं से मुक्त नहीं कहा जा सकता. आरबीआई के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी ने पिछले महीने एक साक्षात्कार में कहा कि इसे सामान्य होने में कम से कम दो साल और लगेंगे. अन्य जानकारों का भी मानना है कि सरकार को अभी वित्तीय सुदृीकरण के मोर्चे पर काफी कुछ करना है. बात चाहे वित्तीय घाटा कम करने की हो या महंगाई नियंत्रित करने की या विकास दर बढ़ाने की मोदी सरकार को अभी काफी प्रयास करने होंगे. जानकारों के अनुसार ​देश को विकास की पटरी पर तेजी से दौड़ते-दौड़ते वित्त वर्ष 2019-20 गुजर ही जाएगा.

दूसरी ओर अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही है. वहां के केंद्रीय बैंक ​फेडरल रिजर्व ने पिछले महीने कहा था कि वह 2020 तक तीन फीसदी की विकास दर हासिल कर लेगी. वहां की बेरोजगारी और महंगाई के आंकड़े भी संकेत दे रहे हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था निकट एक-दो साल बाद पूरी तरह से सामान्य हो जाएगी. जानकारों के अनुसार ऐसे में भारतीय शेयर बाजार मध्यम गति से ही आगे बढ़ेंगे.

बिजनेस स्टैंडर्ड का एक सर्वेक्षण बताता है कि 2018 में सेंसेक्स में उतनी तेजी नहीं होगी जितनी 2017 में हुई थी. इसके अनुसार पिछले साल के 28 फीसदी के बजाय इस साल इसमें केवल 10 फीसदी की ही वृद्धि होने का अनुमान है. ऐसा इसलिए कि अभी भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. जानकार मानते हैं कि इन समस्याओं को दूर किए बिना कारोबार या शेयर बाजार को और ज्यादा बुलंद करना संभव नहीं है. हालांकि कइयों का मानना है कि अब 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ही बड़े आ​​र्थिक सुधार होंगे. क्योंकि इस साल अगला चुनाव जीतने के लिए केंद्र सरकार अपना ध्यान लोक-लुभावन फैसलों की ओर रखेगी.