भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को त्रिपुरा में ‘विजय संकल्प’ रैली आयोजित करते हुए यहां पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी है. त्रिपुरा में 1993 से लगातार वाम मोर्चे की सरकार है और 1998 से यहां सरकार की कमान माणिक सरकार के हाथ में है. इस बात में कोई दोराय नहीं कि अगर इतने सालों से मोर्चा यहां अपराजेय बना है तो इसके पीछे मुख्यमंत्री माणिक सरकार का सबसे अहम योगदान है.

पाक-साफ छवि और विनम्र व्यवहार माणिक सरकार का एक बड़ा आकर्षण है. वहीं वे बड़ी चतुरई से त्रिपुरा के मूल निवासियों (जनजातियों) और बंगाली समुदाय के बीच संतुलन साधते रहे हैं. इन सालों के दौरान उनकी अगुवाई में त्रिपुरा में विद्रोही गतिविधियां काबू में आ चुकी हैं और यहां से सशस्त्र सुरक्षा बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) हटा लिया गया है.

हालांकि यहां दो ऐसे मुद्दे हैं जिनके चलते वाम मोर्चे की सरकार के लिए मुश्किल पेश आ सकती है. पहली बात तो यही है कि अब यहां के लोगों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ी-चढ़ी हैं और दूसरी बात यह कि इस समय भाजपा अपनी उत्तर-पूर्व की रणनीति के तहत काफी आक्रामक रुख अपनाए हुए है. त्रिपुरा देश के उन राज्यों में शामिल है जहां बेरोजगारी की सबसे ऊंची दर है. इसके साथ ही यहां बुनियादी ढांचे का हाल भी बुरा है जिससे पर्याप्त औद्योगिक विकास नहीं हो पाया है. भाजपा की पूरी कोशिश होगी कि वह लोगों के रोजी-रोजगार के मुद्दे को चुनाव में भुनाए.

भाजपा ने भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस बनाया है. यह गठबंधन दावा करता है कि अगर उसकी सरकार बनती है तो वह इन राज्यों में केंद्र की ज्यादा से ज्यादा मदद लेकर आएगा. इसी दावे-वादे के बूते यह मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में सरकार बना चुका है. वाम मोर्चे के लिए इसका मुकाबला करना भी आसान नहीं होगा.

भाजपा त्रिपुरा के आदिवासियों को अपने पाले में करने के लिए भी जोर लगाए हुए है. पार्टी त्रिपुरा के मूल निवासियों के मोर्चे (आईपीएफटी) के साथ भी गठबंधन करने की कोशिश कर रही है. यहां मूल निवासियों पर बंगालीभाषियों का दबदबा है. भाजपा अपनी इस साझेदारी को आदिवासियों की समर्थक के तौर पर पेश करने की कोशिश करेगी.

हालांकि आईपीएफटी यह मांग उठाता रहा है कि त्रिपुरा के आदिवासी बहुल इलाकों को मिलाकर गठित हुई स्वायत्तशासी परिषद को अलग राज्य का दर्जा दिया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मांग से कैसे निपटती है. इस बीच 2016 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने वाले एक हजार कार्यकर्ता एक महीने पहले ही वापस अपनी मूल पार्टी में लौट चुके हैं. यानी कांग्रेस भी यहां इतनी कमजोर नहीं कही जा सकती. कुल मिलाकर इन हालात में भाजपा के लिए सत्ताधारी वाम मोर्चे को हराना इतना आसान नहीं है. (स्रोत)